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अब `वापसी’ की चुनौती

फिलहाल पूरी दुनिया में कोरोना संकट छाया हुआ है। हमारा देश भी इस संकट से जूझ रहा है। केंद्र और राज्य सरकारें कोरोना संकट को दूर करके धीरे-धीरे देश के आर्थिक चक्र को पटरी पर लाने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे प्रयासों के बीच नई चुनौतियां और खतरे भी उभर ही रहे हैं। लॉकडाउन के कारण घरेलू रोजगार पहले ही खत्म हो चुका है। ऐसे में अगर विदेश में काम करनेवाले लाखों हिंदुस्थानियों की ‘वापसी’ होनी होगी तो इसे नई चुनौती कहना होगा। कोरोना के कारण कुशल-अकुशल हर तरह का रोजगार खत्म हो गया है। लाखों लोगों को बेरोजगारी की खाई में धकेल दिया है। इन दिक्कतों के बीच विदेश से हिंदुस्थानियों की ‘वापसी’ सरकार के लिए सिरदर्द बन सकती है। तस्वीर यह है कि मुख्यत: ‘खाड़ी देशों’ से बड़ी संख्या में हिंदुस्थानियों को स्वदेश लौटना पड़ेगा। कुवैत जैसे देश ने अपने देश की जनसंख्या के अनुपात में ‘अनिवासी’ नागरिकों की संख्या ३० प्रतिशत ही रखने का फैसला किया है। वहां की संसद ने इस संबंध में एक विधेयक भी पारित किया है। इस नीति परिवर्तन से कुवैत में रहनेवाले आठ लाख से अधिक हिंदुस्थानी कर्मचारी प्रभावित होंगे। उन्हें घर लौटना होगा। हालांकि यह ‘वापसी’ अचानक नहीं होगी लेकिन इसका हिंदुस्थानी अर्थव्यवस्था पर प्रभाव तो पड़ेगा ही। कुवैत में लगभग ३० लाख विदेशी नागरिक मतलब ‘अनिवासी’ हैं। उनमें हिंदुस्थान के ही करीब १३-१४ लाख लोग हैं। संभावना ये है कि उनमें से कम-से-कम आठ लाख को वापस लौटना होगा। मध्य पूर्व के कुछ अन्य देशों की ‘माइग्रेशन’ नीतियों में भी इसी तरह के बदलाव होनेवाले हैं। इसलिए वहां काम करनेवाले हिंदुस्थानियों का रोजगार खतरे में है। बदली हुई परिस्थिति के कारण मध्य-पूर्व के तेल उत्पादक देशों की स्थिति विकट है। उद्योग, व्यापार, मुख्य रूप से पर्यटन व्यवसाय ठप है। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से इन देशों की अर्थव्यवस्था पर भी ‘ब्रेक’ लग गया है। हालांकि इसमें से वे रास्ता खोजने के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं। कुवैत की ‘विदेशी अनिवासी’ आबादी को कम करने का निर्णय इसी संघर्ष का एक हिस्सा है। हालांकि यह उस देश के दृष्टिकोण से गलत नहीं है, लेकिन वहां से लगभग आठ लाख हिंदुस्थानियों की ‘वापसी’ हिंदुस्थान के लिए चुनौती बढ़ाने वाली होगी। यह सच है कि मध्य-पूर्व के अन्य देशों ने अभी तक ऐसा निर्णय नहीं लिया है। हालांकि, ऐसा भी नहीं है कि वे कुवैत के नक्शेकदम पर नहीं चलेंगे। अमेरिका ने भी उच्च शिक्षण ले रहे छात्र वीजा वाले विदेशी छात्रों पर शिकंजा कसा है। कोरोना के कारण स्थानीय विश्वविद्यालयों द्वारा शुरू की गई ‘ऑनलाइन’ शिक्षा छात्रों के लिए मुसीबत बन गई है। ऑनलाइन पढ़ रहे छात्रों का वीजा रद्द करने से उनके पास घर लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा। भविष्य में लाखों छात्र हिंदुस्थान लौट आएंगे। ट्रंप प्रशासन का ये निणर्‍य अजीब है। ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था कोरोना संकट से उत्पन्न स्थिति के कारण बनी है। इसमें इन छात्रों का क्या कसूर है? ट्रंप प्रशासन का दावा है कि ऑनलाइन शिक्षा के लिए इन छात्रों को अमेरिका में रहने की आवश्यकता नहीं है, यह दावा हास्यास्पद है। एक ओर अमेरिकी सरकार अपने विश्वविद्यालयों को ऑनलाइन शिक्षा शुरू करने का आदेश देती है और दूसरी ओर विदेशी छात्रों की उपस्थिति को अवैध बताती है। बेशक यह निणर्‍य ट्रंप प्रशासन के अब तक की कार्यशैली के अनुरूप ही है। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि निकट भविष्य में अमेरिका, कुवैत और मध्य-पूर्व के अन्य देशों से लाखों हिंदुस्थानियों की ‘वापसी’ हो जाए। इनमें वे छात्र शामिल हैं जो रोजगार के अवसरों के साथ-साथ उच्च शिक्षा के अवसरों को खो देंगे। देश एक तरफ कोरोना के संकट का सामना कर रहा है, दूसरी तरफ घुटती अर्थव्यवस्था और रोजगार की ‘सांस’ खुली करने का संकट सरकार के समक्ष है। रोजगार और शिक्षा की बदहाली के कारण अब विदेश से लाखों हिंदुस्थानियों की ‘वापसी’ एक बड़ी चुनौती है। केंद्र सरकार को इस तिहरे संकट से निकलने का रास्ता खोजना होगा। आखिरकार, देश के हों या कोरोना के कारण स्वदेश लौटनेवाले हों, सब अपने ही हैं।