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रंग शहर का

न जाना था न पहचाना, मैं था इन सबसे अंजाना।
तलब उसको थी रोटी की, इन्हें चहिए था मयखाना।।
जहां से मैं चला था, अलग ही दुनिया में जा पहुंचा।
अजनवी शहर ने क्या-क्या दिखाया रंग मस्ताना।।
शहर में रात को निकला, ठिठुरती जिंदगी देखी।
मैं बचपन से अभी तक, ऐसी हालत से था बेगाना।।
सुना था, आज देखा भी, विविध रंगों भरा भारत।
किसी के होंठ सूखे हैं, कोई होंठों का दीवाना।।
कोई अस्मत छुपाता है कोई अस्मत दिखाता है।
बड़ा होने का, छोटा होने का, है ऐसा पैमाना।।
– शिब्बू `गाजीपुरी’