…वो पूरा पूरा हिंदुस्थान मैं उसको ढूंढ़ रहा हूं! बंटवारे के वक्त २० फीसदी मुस्लिमों ने किया था पाक का रुख

पार्टीशन को देश का दुर्भाग्य मानते हैं
देश के बंटवारे से टूट गए थे कुनबे 
अखंड भारत दिवस पर खास खबर
यूपी के सुल्तानपुर जिले में १४ अगस्त १९४७..ये वो तारीख है, जिस दिन देश के बंटवारे पर लगी थी आखिरी मुहर। सिर्फ देश ही नहीं बंटा, बंट गया कुनबा, समाज और परिवार। यूपी के सुल्तानपुर जिले में ही करीब मुस्लिम समुदाय की बीस फीसदी आबादी इस पैâसले से प्रभावित हुई। परिवार तक बंट गया। बड़ा भाई पाकिस्तान गया तो छोटा हिंदुस्थान में रह गया। यहां तक कि मां, बहनों, चाचा-भतीजों के स्नेह से भी लोग महरूम हो उठे। तमाम ऐसे परिवार आज भी इस शहर में मौजूद हैं जो बंटवारे की  चर्चा शुरू होते ही फफक पड़ते हैं। ये लोग मुल्क के बंटवारे को इस देश के तत्कालीन नेताओं की बदनीयती और काला अध्याय मानते हैं।
सुल्तानपुर शहर के खैराबाद इलाके के जमींदार रहे मरहूम हाजी सैफुद्दीन के दो बेटे थे वकीलुद्दीन, जमालुद्दीन। बड़े बेटे जमालुद्दीन अपनी मां जाफरी बेगम व दो बहनों को लेकर सन् १९४७ में कराची चले गए जबकि छोटे बेटे जलालुद्दीन यहीं रह गए। वे तो गुजर चुके हैं पर उनके बेटे आरिफ जलाल कहते हैं कि हमें बंटवारे का मलाल है। इसने घर परिवार बांट दिया। मानिंद वकील व सिविल लाइन, लाल डिग्गी इलाके के जमीदार  वयोवृद्ध माजिद अली अंसारी बताते हैं कि उस वक्त बंटवारा हुआ तो मेरे बड़े भाई वाजिद अली पाकिस्तान के कराची शहर चले गए। उनके बच्चे आज भी वहां रह रहे हैं। पर परिवार के लिए उनके मन में भी तड़पन है। ऐसे ही मरहूम वकील महमूद अली के दो बड़े भाई मोहम्मद अली व अहमद अली ने छोटे भाई व उनके परिवार को यहां छोड़ पाकिस्तान में रहना स्वीकार कर लिया। महमूद साहब अपने इंतकाल तक देश विभाजन के पैâसले को लेकर सियासतदानों पर बिफरते रहे। उनके बेटे बताते हैं नेताओं ने अच्छा नहीं किया। जमालगेट निवासी मशहूर शायर ८५ वर्षीय अजमल सुल्तानपुरी इस वक्त बीमार हैं। बंटवारे की बात शुरू होते ही भावुक हो उठते हैं और ये नज्म उनकी जुबां पर आ जाती है… मुसलमां और हिंदू की जान, कहां है मेरा हिंदुस्थान? मैं उसको ढूंढ़ रहा हूं, मेरे बचपन का हिंदुस्थान, न बांग्लादेश न पाकिस्तान, मेरी आशा मेरे अरमान, वो पूरा पूरा हिंदुस्थान मैं उसको ढूढ़ रहा हूं।