" /> सियासत, साख और सीख

सियासत, साख और सीख

 योगी की बची साख
 कई को मिली सीख
 कांग्रेस की स्थिति में सुधार
 सपा-बसपा के लिए चुनौती

उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल माने जा रहे उपचुनावों में सफलता हासिल कर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी साख बचा ली है। एंटी इनकंबेंसी के दावे भी फेल होते दिखे। मंगलवार को उत्तर प्रदेश में जिन सात विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव के नतीजे आए हैं, उसने सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी की आगे की तैयारियों की बानगी दी है, वहीं विपक्ष को भी आईना दिखाया है। तमाम दावों के बाद भी विपक्ष को इन उपचुनावों में सफलता नहीं मिल सकी। प्रदेश में विकल्प होने का दावा कर रही सपा हो या बसपा सभी को मुंह की खानी पड़ी है।
उपचुनाव में जहां विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं ने प्रचार के लिए समय तक नहीं दिया था, वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित पूरी कैबिनेट ने जमकर पसीना बहाया। खुद मुख्यमंत्री ने सभी चुनाव क्षेत्रों में दो-दो रैलियां कीं और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने जबरदस्त प्रचार किया। भाजपा संगठन ने महीनों से तैयारी की और सत्ता विरोधी किसी भी मुहिम को कामयाब नही होने दिया। भाजपा ने सात विधानसभा सीटों के लिए उपचुनावों में छह सीटें जीतकर अपनी पहले की स्थिति बरकरार रखी है जबकि मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी को एक सीट मिली है। प्रियंका गांधी के प्रदेश का प्रभारी बनने से उत्साहित कांग्रेस ने कोई सीट तो नहीं जीती पर उसने कई जगह मुख्य मुकाबले में आकर अपना दम दिखाया। उपचुनावों में भारी जीत का दावा कर रही सपा को निराशा हाथ लगी है जबकि बहुजन समाज पार्टी की कई सीटों पर बुरी गत हुई है।
उपचुनाव में छह सीटों पर भाजपा का दबदबा रहा तो सपा अपनी इकलौती जौनपुर की मल्हनी सीट बचा पाई। नतीजे आने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि विधानसभा चुनाव और उपचुनाव के रुझानों से एक बार फिर से साबित हो गया कि मोदी है तो मुमकिन है। उन्होंने कहा कि भाजपा पर देश की जनता को भरोसा है और इस बात पर जनता ने एक बार फिर से मुहर लगा दी है।
यूपी में नौगांवा (अमरोहा), बुलंदशहर, टुंडला( फिरोजाबाद), घाटमपुर (कानपुर), बांगरमऊ(उन्नाव), मल्हनी (जौनपुर), देवरिया सीटों पर ३ नवंबर को उपचुनाव के लिए मतदान हुए थे। उपचुनाव प्रदेश के पश्चिमी, पूर्वी, ब्रज, रुहेलखंड से लेकर अवध क्षेत्र की सीटों पर हो रहा था और इसीलिए इसे पूरी तरह से विधानसभा के लिए सेमीफाइनल माना जा रहा था। सात सीटों के लिए उपचुनावों में छह सीटें भाजपा तो एक सीट सपा के पास थी।
जिन सीटों पर चुनाव हुए थे इनमें से नौगावां सादात सीट योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री चेतन चौहान की मृत्यु तो घाटमपुर सीट मंत्री कमलरानी वरुण और बुलंद शहर व देवरिया सदर सीट विधायकों के दिवंगत होने के चलते खाली हुई थी। समाजवादी पार्टी के विधायक पारसनाथ यादव की मृत्यु के चलते जौनपुर जिले की मल्हनी सीट पर उपचुनाव हो रहा था। अयोग्य साबित होने के नाते बांगरमऊ में उपचुनाव हुआ तो अदलाती विवाद में फंसी टूंडला सीट पर भी उपचुनाव संपन्न हुए हैं। इनमें से बुलंदशहर, नौगावां सादात पर ही भाजपा ने दिवंगत विधायकों के परिजनों को टिकट दिया था जबकि बाकी की सीटों पर पुराने कार्यकर्ता या जिताऊ प्रत्याशी को उतारा था।
इन नतीजों से जहां कोरोना संकट के दौरान सरकार व भाजपा संगठन की तरफ से किए गए कामों के दावों का सच सामने आने की बात कही जा रही थी, वहीं विपक्ष की तरफ से सरकार के खिलाफ उठाए गए मुद्दों के ताप का भी पता चला। उपचुनाव के नतीजों से ये संकेत भी मिल गए हैं कि प्रदेश की भविष्य की सियासत और सियासी पार्टियों के रिश्तों तथा उनके संभावित समीकरणों की दिशा व दशा क्या होने वाली है? हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि २०२२ के विधानसभा चुनाव में सपा, बसपा और कांग्रेस सियासी बिसात पर भाजपा के खिलाफ अपने मोहरे अलग-अलग ही चलने वाले हैं या कोई किसी से मिलकर खेल खेलेगा? नतीजों ने यह साफ कर दिया कि भाजपा की मजबूत लीडरशिप और संगठन क्षमता का मुकाबला करने के लिए विपक्ष को एक मंच पर आना पड़ सकता है।
संयोग ही है कि ये उपचुनाव तमाम नए और बनते-बिगड़ते समीकरणों के बीच हुए हैं। इसके चलते इनके नतीजे प्रदेश की आगे की सियासत के सरोकारों से जुड़ गए हैं। कोराना काल के दौरान विपक्षी दलों का सत्तापक्ष पर हमला तथा सरकार का प्रवासी मजदूरों को रोजगार से लेकर लोगों की चिकित्सा के इंतजाम तथा लोगों की सेवा के लिए किए गए कामों के दावे भी इन उपचुनाव के नतीजों की कसौटी पर परखे जाने थे। तो प्रदेश में राहुल-प्रियंका की सक्रियता पर जनता के रुझान का पता चलना था। कुछ घटनाओं को लेकर विपक्ष की तरफ से ब्राह्मणों की उपेक्षा व उत्पीड़न को लेकर सरकार की घेराबंदी तथा हाथरस जैसी घटनाओं के सहारे विपक्ष, खास तौर से कांग्रेस व भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर की पार्टी का सरकार को कठघरे में खड़ा करना तथा कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर उठाए गए सवालों का जनता में असर भी इन नतीजों से ही सामने आना था। यह भी पता चलना था कि कांग्रेस के सड़कों पर संघर्ष तथा राहुल गांधी व प्रियंका गांधी वाड्रा की यूपी में सक्रियता का जनता में कुछ असर हुआ है या नहीं।
उपचुनाव के पहले प्रदेश में कई महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम हुए। मसलन, राज्यसभा चुनाव में नौ सदस्य निर्वाचित कराने की ताकत होते हुए भी भाजपा का सिर्फ आठ उम्मीदवार उतारना। बसपा का आश्चर्यजनक तरीके से एक उम्मीदवार का पर्चा भरवाना तथा सपा का बसपा विधायकों में तोड़फोड़ कराना। मायावती का सपा को हराने के लिए पहले भाजपा के समर्थन का एलान और फिर उस पर सफाई, प्रदेश में नए सियासी रिश्तों तथा समीकरणों के संकेत दे गया। इसका असर उपचुनाव के मतदान में दिखा भी। हालांकि नतीजों ने यह साफ कर दिया कि बसपा उत्तर प्रदेश में न तो अपनी ताकत बढ़ा पाई है और न ही कुछ खास कमजोर ही हुई है। सपा को जरूर इन उपचुनावों से बड़ी आस थी पर वह भी नतीजों से टूट गई है। बसपा का दो स्थानों पर दूसरे स्थान पर आना और कांग्रेस का बांगरमऊ में सपा को पीछे छोड़ देना कम से कम अगले आम चुनावों में कुछ चमत्कार की उम्मीद लगाए बैठी सपा के लिए बड़ा झटका है।
कांग्रेस ने इन उपचुनावों में जरूर अपनी स्थिति में सुधार किया है और कम से कम दो जगहों पर वह मुख्य मुकाबले में रही और मत प्रतिशत में भी सुधार हुआ है। हालांकि प्रदेश की राजनीति में विकल्प के तौर पर उभरने के लिए अभी प्रियंका गांधी को बड़ी मेहनत करनी होगी। उत्तर प्रदेश भाजपा में संगठन की क्षमता और योगी की कार्यकुशलता पर उठ रहे सवालों के बीच उपचुनाव के नतीजे अहम होंगे। हालांकि भाजपा में नए तरह का आत्मविश्वास भरा जरूर है।
(लेखक उत्तर प्रदेश अधिस्वीकृत पत्रकार संघ के अध्यक्ष हैं। उत्तरप्रदेश की राजनीति के जानकार और स्तंभकार हैं।)