" /> रामन राघव : एक डरा हुआ मनोरोगी… खुद को मर्द साबित करने के लिए करता था कत्ल!

रामन राघव : एक डरा हुआ मनोरोगी… खुद को मर्द साबित करने के लिए करता था कत्ल!

दुनियाभर में समय-समय पर वैसे तो कई सीरियल किलर सामने आए, जिनकी हैवानियत के किस्से सुनकर आज भी लोगों की रूह कांप उठती है। ७० के दशक में ऐसे ही एक सीरियल किलर का खौफ मुंबई की सड़कों पर फैला था। उक्त सीरियल कीलर का नाम था रामन राघव। सीरियल किलर रामन राघव का खौफ ऐसा कि उसकी गिरफ्तारी के १० साल बाद भी अक्सर अफवाह फैलती थी कि वह जेल से फरार हो गया है और लोग शाम ढलने के बाद घरों से बाहर निकलने से पहले हजार बार सोचने लगे थे। हालांकि रामन राघव की मौत करीब २५ साल पहले ही हो चुकी थी लेकिन आज एक बार फिर वह सुर्खियों में आ गया है। सुर्खियों की वजह मुंबई पुलिस का वह जांबाज अधिकारी है, जिसने रामन राघव का वास्तविक चेहरा दुनिया के सामने लाया था। जी हां, हम बात कर रहे हैं रामन राघव को पकड़ने वाले मुंबई पुलिस के अधिकारी ऐलेक्स फियालोह की। ऐलेक्स फियालोह का शनिवार को निधन हो गया। वे ९२ साल के थे। साल १९६८ में ऐलेक्‍स फियालोह ने रामन राघव को गिरफ्तार किया था। एलेक्स फियालोह तब मुंबई पुलिस में सब इंस्पेक्टर हुआ करते थे। सीरियल किलर रामन राघव पर ४० से ज्यादा लोगों के कत्ल का आरोप था। उसने सभी लोगों को बस अपनी सनक के कारण मौत के घाट उतारा था। मनोचिकित्सकों के अनुसार उसे डर था कि कुछ लोग उसका सेक्स चेंज करने की हर कोशिश कर रहे थे। उसे इस बात का भी डर था कि कि लोग उसे होमोसेक्शुएलिटी का लालच देकर होमोसेक्शुअल बनाना चाहते हैं और यदि वह उनके झांसे में आ गया तो वो औरत बन जाएगा। उसे ऐसा भी लगता था कि होमोसेक्शुअल सेक्स उसे औरत बना देगा। वह पूरी बातचीत के दौरान इस बात पर जोर देता रहा कि वो १००% ‘पुरुष’ है।

रामन राघव की हरकतों की तरह उसकी पूरी जिंदगी भी रहस्यों से भरी थी। गिरफ्तारी से पहले की उसकी जिंदगी की सच्चाई शत-प्रतिशत तो कोई नहीं जान पाया लेकिन ऐसा दावा किया जाता है कि उसका जन्म वर्ष १९२९ में तमिलनाडु के तिन्‍नेवेली जिले में हुआ था। वह ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था। चोरी की आदत के कारण वह पढ़ाई नहीं कर सका था। वर्ष १९४३ में उसने अपनी बहन की बेटी गुरुअम्मा से शादी कर ली। उसी दौरान जब वह जेल गया तो गुरुअम्मा से किसी ने जबरदस्ती शादी कर ली, हालांकि गुरुअम्मा ने अपने दूसरे पति को छोड़ दिया। ऐसा कहा जाता है कि वो लंबे समय तक जिंदा नहीं रह सकी। बच्चे को जन्म देने के दौरान उसकी मौत हो गई थी। दावा यह भी किया जाता है कि १८ वर्ष की उम्र में वह घर छोड़कर भाग निकला था और फिर भटकते हुए मुंबई आ पहुंचा। मुंबई आने के बाद राघव ने नवभारत मिल में डेढ़ साल तक नौकरी की। बाद में वह ज्यादा तनख्वाह के लालच में मिल में चला गया। इसके तीन महीने बाद ही उसे किसी जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया और भायखला जेल भेज दिया गया। इसके बाद पुलिस ने उसे तड़ीपार कर दिया। उसने दो साल पुणे और आसपास स्थित वडगांव, देहू और तलेगांव में रहा। उसी दौरान तलेगांव में एक चाय वाले से उसका झगड़ा हो गया। नाराज राघव ने चाय वाले की हत्या का प्रयास किया लेकिन पब्लिक ने उसे पकड़ लिया और पुलिस को सौंप दिया। उसे डेढ़ साल की सजा हुई।

सजा भुगतने के बाद वह वडगांव जेल से छूटने के बाद कर्जत चला आया। कर्जत स्टेशन से वह कई घंटे पैदल चलते-चलते भांडुप पहुंचा। भांडुप के मंगतराम पेट्रोल पंप के पास स्थित काजू टेकड़ी इलाके में कुछ दिन रहने के बाद वह बोरिवली शिफ्ट हो गया और फिर से चोरी और लूटपाट करने लगा। उसने दहिसर स्थित एक हार्डवेयर की दुकान से एक लोहे की रॉड खरीदी और इसे जोगेश्वरी में एक लोहार के पास ले जाकर उसे हुक जैसा बनवा लिया। ५ जुलाई, १९६८ की रात करीब तीन बजे उसने उसी रॉड से मालाड स्थित एक झोपड़ी में चारपाई पर सो रहे उर्दू टीचर अब्दुल करीम को मार डाला। १९ जुलाई को देर रात के समय रामन ने गोरेगांव में ५४ साल के यादव नामक व्यक्ति का कत्ल कर दिया। करीब चार सप्ताह बाद ११ अगस्त, १९६८ को मालाड में वेस्टर्न एक्सप्रेस हाई-वे के पास रामन ने एक दंपति के साथ उनकी तीन माह की बच्ची पर कातिलाना हमला किया था। वारदात के बाद वह लहूलुहान अवस्था में अचेत पड़ी महिला के साथ रेप की कोशिश कर रहा था तभी पड़ोस की एक वृद्धा वहां आ गई। वृद्धा के सोर मचाने पर रामन वहां से भाग निकला। इस घटना से पूरे शहर में हड़कंप मच गया था। लगातार हत्याओं से मुंबईकरों के साथ-साथ पुलिस भी परेशान हो गई थी। उस दौरान मुंबई की सड़कें शाम ढलने के बाद वीरान हो जाती थीं। रात में गलियों-मुहल्लों में लोग डंडे रॉड लेकर पहरा देने लगे। सड़कों पर ज्यादातर पुलिसकर्मी और पुलिस के वाहन ही घूमते नजर आते थे लेकिन रामन रुका नहीं। १५ अगस्त को उसने कांदिवली के हनुमान नगर में उपाध्याय नामक शिक्षक पर हमला किया।

उसी दौरान पुलिस को एक महत्चपूर्ण जानकारी मिली कि सन १९६५ और ६६ में मुंबई के पूर्वी उपनगर में इसी तरह से रात में १ से ४ बजे के बीच कई कत्ल हुए थे। उस समय भी झोपड़पट्टी में रहने वाले गरीब लोगों को ही निशाना बनाया गया था। सोते हुए लोगों का रॉड या भारी पत्थर से वार करके कत्ल किया गया था। तब मार्च, ६६ में पुलिस ने रामन राघव नामक एक संदिग्ध को पकड़ा भी था लेकिन उसने किसी भी कत्ल में अपना जुर्म नहीं कबूला था, इसलिए बाद में वह छूट गया। बाद में पुलिस ने उसे मुंबई से तड़ीपार कर दिया गया। ईस्टर्न रीजन में हुए कत्ल के उन खुलासों के बाद वेस्टर्न रीजन में अब तक हुई हत्याओं में सारा शक अब रामन राघव की ओर ही घूम गया और पुरानी फाइलों से उस समय के संदिग्ध के फिंगर प्रिंट्स, उसकी फोटो व अन्य रेकॉर्ड निकाल मुंबई के सभी पुलिस स्टेशनों में भी भेज दी गई। फिर पुलिस स्टेशनों के जरिए पूरे शहर में आम लोगों तक जानकारी पहुंचा दी गई। उसी दौरान पोइसर की शर्मा चाल में रहनेवाली मंजूदेवी नामक महिला ने तथाकथित रामन राघव की तस्वीर को पहचान लिया और दावा किया कि वह इस व्यक्ति को अन्ना नाम से जानती है और २४ अगस्त, १९६८ को सुबह साढे़ ग्यारह बजे इसी इलाके में उसकी उससे मुलाकात भी हुई थी। मंजू देवी ने पुलिस को यह भी बताया कि वह खाकी रंग की हॉफ पैंट, नीली शर्ट और कैनवास जूते पहने हुए था। साथ ही उसके पास एक छाता भी था। मंजू देवी से मिली इस सूचना के बाद मुंबई के सभी पुलिस स्टेशनों में इन रंग के कपड़ों, जूते और छाते वाले पर नजर रखने का संदेश वायरलेस पर भेजा गया था लेकिन इस अलर्ट के बाद भी रामन राघव सक्रिय रहा। उसने उसी दौरान बोरिवली हिल्स और पोइसर में एक के बाद कई मर्डर कर दिए। उसने २६ अगस्त को मालाड के चिंचोली में दो लोगों की हत्या कर दी। चिंचोली मर्डर की जांच के दौरान पुलिस को घटना स्थल पर स्टेनलेस स्टील का एक बॉक्स मिला, जो संयोग से बारिश होने के बावजूद अंदर होने की वजह से भीगा नहीं था। उस बॉक्स पर मौजूद फिंगर प्रिंट्स रामन राघव के पुराने फिंगर प्रिंट्स से मिल गया। इसके बाद पूरी मुंबई पुलिस रामन राघव की तलाश में जुट गई। राघव मालाड के २६ अगस्त के इस डबल मर्डर के बाद आरे कॉलोनी के एक जंगल में गया और उसने कत्ल वाली रॉड वहां घास के बीच छिपा दी और वह पोइसर मर्डर के बाद मिला सामान व एक छाता लेकर लोकल ट्रेन में बिना टिकट सवार हो गया। सैंडहर्स्ट रोड उतर कर वह पैदल भिंडी बाजार की तरफ जा रहा था तभी एलेक्स फियालोह की नजर उसके कपड़ों पर पड़ गई। दो दिन पहले खाकी रंग की नेकर, नीली शर्ट और कैनवास के जूते वाले संदिग्ध से संबंधित वायरलेस पर आया संदेश उन्हें याद था और रामन राघव पुलिस के हत्थे चढ़ गया। अगस्त, १९६८ में डोंगरी में फियालोह ने राघव को गिरफ्तार कर लिया। वह अक्सर लोगों को अपना अलग-अलग नाम बताता था। कभी रामन राघव तो कभी सिंधी दलवई आदि। जांच एजेंसियों द्वारा की गई जांच और एक पुलिस सर्जन द्वारा उससे की गई पूछताछ के बाद जो तथ्य सामने आए, उसके मुताबिक, उसने कुल ४१ लोगों के कत्ल किए थे। राघव पर मुकदमा चला और उसे सरकार की तरफ से अपने बचाव के लिए एक वकील भी दिया गया। राघव के वकील ने कोर्ट के समक्ष उसके (राघव) मानसिक रूप से अस्वस्थ होने का दावा किया। कोर्ट को यह भी बताया गया कि राघव एक मनोरोगी है और क्रानिक पैरॅनाइक शिजोप्रâेनिया नामक बीमारी से ग्रस्त है। मनोचिकित्सकों से रामन की जांच कराने के बाद सत्र न्यायालय ने रामन राघव को मौत की सजा दी थी। उच्च न्यायालय में जब यह मामला पहुंचा तो बचाव पक्ष की मांग पर तीन डॉक्टरों से रामन की दुबारा जांच कराई गई और डॉक्टरों की रिपोर्ट के आधार पर उच्च न्यायालय में फांसी की सजा उम्र कैद में तब्दील हो गई। रामन को पुणे की येरवदा जेल में भेज दिया गया। सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की अर्जी को खारिज कर दिया। वर्ष १९९५ में रामन की पुणे के ससून अस्पताल में मौत हो गई। रामन राघव (रमन राघव नहीं)। इसी राघव पर अनुराग कश्यप ने चार साल पहले फिल्म बनाई थी, जिसमें नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने राघव का किरदार निभाया था। यह फिल्म उस दौर में कान फिल्म फेस्टिवल में भी दिखाई गई थी।