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रामायण

अयोध्या में राम मंदिर भूमि पूजन समारोह ५ अगस्त को संपन्न होने जा रहा है। रामायण हिंदुस्थान की जीवन पद्धति का एक अविभाज्य अंग है। जब तक सूर्य-चंद्र हैं तब तक रामायण है। उसी सूर्य-चंद्र की साक्षी में प्रधानमंत्री मोदी राम मंदिर का भूमि पूजन करेंगे। इसी एक क्षण के लिए ही २८ साल पहले लाखों रामभक्त अयोध्या पहुंचे थे। उन्होंने पुलिस की बंदूकों और गोलियों की परवाह नहीं की। उस समय उनके खून, पसीने और आंसुओं से अयोध्या की भूमि भीग गई। सरयू नदी कारसेवकों के रक्त से लाल हो गई। ऐसे कई रामभक्तों के त्याग के कारण राम मंदिर भूमि पूजन का दिन देखने को मिल रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई अब राज्यसभा के सदस्य हैं। लेकिन जब वे मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी पर विराजमान थे तब उन्होंने फैसला सुनाया था, ‘अयोध्या राम की ही है! और मंदिर वहीं बनेगा!’ मंदिर के भूमि पूजन के लिए जिन खास मेहमानों की सूची बनाई जाएगी, उसमें सांसद रंजन गोगोई को महत्वपूर्ण स्थान मिलना ही चाहिए। लाखों कारसेवकों, शिवसेना जैसे हिंदुत्ववादी संगठन और रंजन गोगोई जैसे रामभक्त के कारण अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए पहली कुदाल चलेगी। उस आंदोलन की नींव रखनेवाले अशोक सिंघल तथा शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे आज हमारे बीच नहीं हैं। लालकृष्ण आडवाणी ने राम के नाम से एक रथ यात्रा निकाली थी। उस यात्रा का सारथ्य करने वाले प्रमोद महाजन भी अब नहीं रहे। राम की तरह आडवाणी वनवास में चले गए। बिहार सीमा पर आडवाणी की रथयात्रा लालू यादव ने रुकवा दी और मानो एक विस्फोट हो गया। अयोध्या जल उठी और कारसेवक आक्रामक हो गए। इसका श्रेय लालू यादव को देना पड़ेगा। वे लालू यादव आज जेल में हैं। तब जनमानस यही था कि मंदिर बने। आज भी लोगों की यही इच्छा है लेकिन उस समय अगर बाबरी का गुंबद नहीं टूटा होता तो आज राम जन्मभूमि परिसर मंदिर के लिए रास्ता नहीं खुला होता और भूमि पूजन का दिन भी कभी देखने को नहीं मिलता। यह काम किया कोठारी बंधु जैसे शिवसैनिकों ने। जिस दिन दोपहर को बाबरी ढही, उस दिन कई योद्धाओं के होश फाख्ता हो गए थे। ये दुनिया ने देखा। ‘यह काम हमारा है ही नहीं। बाबरी गिराने का काम शिवसेना ने किया है।’ ऐसा कहकर भाजपा के तत्कालीन उपाध्यक्ष सुंदर सिंह भंडारी ने अपने हाथ खड़े कर लिए। उस समय मुंबई में बिजली की तरह शिवसेनाप्रमुख की वाणी गरजी, ‘हां! बाबरी तोड़ने में मेरे शिवसैनिक शामिल होंगे तो मुझे इस बात का गर्व है।’ इस एक घोषणा से ही समस्त हिंदुओं का सिर ऊंचा हो गया। लोगों ने शिवसेनाप्रमुख को ‘हिंदूहृदयसम्राट’ के रूप में सिर-आंखों पर बैठा लिया। शेर की दहाड़ क्या होती है, यह महाराष्ट्र ने उसी दिन दिखा दिया। इस इतिहास को नकारा नहीं जा सकता। अयोध्या राम की ही है। उज्बेकिस्तान से आए बाबर ने हिंदू मंदिरों को उद्ध्वस्त कर दिया। इससे राम जन्मभूमि भी अछूती नहीं रही। इसलिए बाबर का अयोध्या से केवल आक्रमण तक ही संबंध रहा। उस आक्रमण और बाबरी के अतिक्रमण को लाखों कारसेवकों ने नेस्तनाबूद कर दिया। उसमें शिवसेना शामिल थी। कई लोगों का योगदान था। आज विरोधाभास क्या है, यह देखिए। बाबरी तोड़कर जहां राम मंदिर की आधारशिला रखी जा रही है, उस समारोह में प्रधानमंत्री मोदी आ रहे हैं। लेकिन बाबरी गिराने का मुकदमा आज भी लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे कई लोगों पर चल रहा है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राम जन्मभूमि पर फैसला सुनाने के बाद भी बाबरी विध्वंस का मुकदमा सीबीआई चलाती है और उसमें अयोध्या आंदोलन के प्रमुख नेता आडवाणी आरोपी के रूप में खड़े होते हैं। इसे कानून का कैसा खेल मानें! बाबरी साजिश का मुकदमा राम मंदिर भूमि पूजन के पहले बरखास्त कर दिया गया तो आंदोलन में शहीद लोगों के लिए यह मान-वंदना साबित होगी। बाबर आक्रांता था। इस बात को स्वीकार करने के बाद बाबरी विध्वंस की योजना बनी, यह मुकदमा ही समाप्त हो जाता है। लेकिन राम जन्म भूमि की पेंच में अटके बाबरी विध्वंस मामले का कांटा निकालने को तैयार नहीं। इन सब अड़चनों को खत्म करके ५ अगस्त के दिन राम मंदिर का भूमि पूजन हो रहा है। उस दिन अयोध्या सजेगी। वो श्रीराम राज्याभिषेक जैसा आनंद का क्षण होगा। कोरोना संकट ना होता तो लाखों रामभक्तों से अयोध्या खचाखच भर गई होती। ५ अगस्त को सीमित लोगों की उपस्थिति में राम मंदिर का भूमि पूजन होगा। मंदिर के कलश का मुहूर्त भी ढूंढा ही गया होगा। रामायण का कोई अंत नहीं, वह शुरू ही रहती है।