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राजस्थान का रण

राजस्थान में पिछले एक सप्ताह से चल रहा सत्ता संघर्ष अब अपने निर्णायक दौर में है। सचिन पायलट की अगुवाई में बागी हुए डेढ़ दर्जन विधायकों को विधानसभा अध्यक्ष द्वारा भेजे गये नोटिस पर राजस्थान हाई कोर्ट में सुनवाई जारी है। अलबत्ता अदालत ने बागी विधायकों पर किसी भी तरह के निर्णय पर मंगलवार तक रोक लगा रखी है। मामले की जांच कर रही राजस्थान पुलिस के विशेष कार्रवाई समूह का दस्ता मानेसर और दिल्ली की परिक्रमा कर चुका है और फोन टैपिंग के मुद्दे पर अब इस विवाद में केंद्र का भी दखल हो चुका है। केंद्रीय गृह मंत्रालय राज्य के मुख्य सचिव राजीव स्वरूप से यह जानना चाहता है कि फोन टैप में किसी कानून का उल्लंघन हुआ है या नहीं। शनिवार को भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने गहलोत सरकार पर निजता के हनन करने का आरोप लगाया था। उसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय हरकत में आया। राज्य के अतिरिक्त गृह मुख्य सचिव रोहित कुमार और मुख्य सचिव राजीव स्वरूप का कहना है कि फोन टैपिंग मामले की उन्हें कोई जानकारी नहीं है। उल्लेखनीय है कि फोन टैपिंग में इस बात का खुलासा हुआ है कि गहलोत सरकार को गिराने के लिए षड्यंत्र रचा जा रहा था। गहलोत सरकार का कहना है कि फोन टैपिंग में सरकार की कोई भूमिका नहीं है।

मुद्दे के कानूनी पहलू का पैâसला अदालत करेगी। लेकिन सत्ताधारी दल के दोनों खेमों के बीच चल रहे शह और मात के खेल के इतर विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी की राजस्थान इकाई के भीतर भी शह और मात का खेल भले अभी समझ न आ रहा हो, लेकिन केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को राज्य के विशेष कार्रवाई बल ने जिस तरह घेरा है, उसे समझना बहुत जरूरी है। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया का रहस्यमय मौन। यहां तक कि मंगलवार को पार्टी के राज्य पदाधिकारियों की जो बैठक जयपुर में होनी थी, वह रानी साहिबा के न आने के कारण रद्द हुई। शनिवार को ट्विटर के जरिये उनका भी बयान आ गया कि , `यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजस्थान की जनता को कांग्रेस की अंदरूनी कलह की कीमत चुकानी पड़ रही है। कांग्रेस अपनी अंदरूनी कलह का ठीकरा भाजपा पर फोड़ने की कोशिश कर रही है।’

बता दें कि राजस्‍थान के सियासी घमासान के बीच वसुंधरा राजे का यह पहला बयान है। दूसरी तरफ राजे के करीबी माने जाने वाले वैâलाश मेघवाल ने अपनी पार्टी को ही नैतिकता की सलाह दी है। एक निजी चैनल से बातचीत में मेघवाल ने कहा कि जनता द्वारा चुनी हुई किसी सरकार को गिराने की साजिश ठीक नहीं है। अपनी पार्टी को नसीहत देते हुए मेघवाल ने कहा कि सरकार गिराने की साजिश न करें, ये नैतिकता के खिलाफ है।

यह अलग बात है कि जाहिर तौर पर सचिन पायलट के यह कहने पर कि वे किसी कीमत पर भाजपा में शामिल नहीं होंगे, भाजपा की बैठक रद्द हो गई। अब सत्ता संघर्ष के इस पूरे प्रहसन के नेपथ्य में झांकें तो यह साफ नजर आएगा कि पक्ष-विपक्ष के कर्णधारों ने बड़ी चालाकी से अपनी भावी पीढ़ी के लिए अपनी-अपनी पार्टी के रंगमंच पर जगह बनाने की कवायद पूरी की है। इसलिए इस सप्ताह भर से चल रहे राजस्थान के इस राजनीतिक प्रहसन की पटकथा को समझना जरूरी है। वर्ष २०१९ के लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राजीव राहुल गांधी ने साफ कहा था कि राजस्थान और महाराष्ट्र में अपने बेटों को जिताने के लिए नेताओं ने पार्टी को हरवा दिया। यह इशारा किसकी तरफ था, यह किसी से छिपा नहीं है। बहरहाल मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने मिशन में लग चुके थे। क्योंकि उन्हें अच्छी तरह पता था/है कि यदि सचिन पायलट राज्य की राजनीति में मजबूत हुए तो उनके बेटे वैभव गहलोत के आगे बढ़ने के सभी रास्ते बंद हो जाएंगे। यह भी ध्यान रहे जोधपुर से वैभव को गजेंद्र सिंह शेखावत ने ही पटखनी दी थी। दूसरे शब्दों में कहें तो जोधपुर में वैभव नहीं खुद अशोक गहलोत हारे थे और राज्य में सचिन पायलट। वही सचिन पायलट जो छह महीने पहले विधानसभा चुनावों में राज्य में कांग्रेस की वापसी के शिल्पकार बनकर उभरे थे, लोकसभा चुनाव परिणामों ने उन्हें फिर से जमीन पर लाकर खड़ा कर दिया। गहलोत की यह पहली बढ़त थी पायलट की राजनीति पर। फिर उसके बाद जो घटनाक्रम हुए उसकी परिणति वर्तमान का सत्ता संकट है।

अभी तक पायलट के साथ भाजपा खुलकर सामने भले न आई हो मगर राजस्थान उच्च न्यायालय में पायलट गुट के वकील हरीश साल्वे और मुकुल रोहतगी का होना बहुत कुछ अनकहा कह रहा है। अदालत में वकीलों की इस जोड़ी के खिलाफ कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी भिड़ रहे हैं। इस सबके बीच राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया अपने गृह क्षेत्र झालावाड़ में हैं और जयपुर आने तक को राजी नहीं हैं। इस सियासी गहमागहमी के बीच गहलोत के करीबियों के यहां आयकर व प्रवर्तन निदेशालय के छापों का समय संयोग मात्र नहीं है।
उधर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की घटक राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के नागौर से सांसद हनुमान बेनीवाल का एक और ट्‌वीट तस्वीर को साफ करता है। बेनीवाल ने ट्वीट के जरिए कहा है कि पूर्व सीएम वसुंधरा राजे ने कांग्रेस में (ध्यान दें कांग्रेस में) उनके करीबी विधायकों से दूरभाष पर बात करके उन्हें अशोक गहलोत का साथ देने की बात कही। सीकर व नागौर जिले के एक-एक जाट विधायक को राजे ने खुद इस मामले में बात करके सचिन पायलट से दूरी बनाने को कहा। यह महज संयोग नहीं है कि भाजपा की तरफ से बैटिंग बेनीवाल कर रहे हैं जिन्हें भाजपा २०१३ में पार्टी से बाहर कर चुकी है। कोई बड़ी बात नहीं टेलीफोन की अगली रिकॉर्डिंग बेनीवाल के माध्यम से हो और निशाने पर रानी साहिबा हों। राजस्थान की राजनीति के जानकारों की राय में गजेंद्र सिंह शेखावत और सचिन पायलट के गठजोड़ ने अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे की राजनीति को एक कर दिया। दोनों को लगा कि उनके रास्ते का एक बड़ा कांटा निकल गया। गहलोत के लिए पायलट और राजे के लिए शेखावत। भाजपा में गुलाबचंद कटारिया, सतीश पुनिया, ओम माथुर, राजवर्धन सिंह राठौर जैसे नेता भी इस पूरे घटनाक्रम से इसलिए खुश हैं कि अब उनके लिए भी रास्ता खुल गया है। इसलिए जिस ढंग से भाजपा को सक्रिय होना चाहिए, वह कहीं दिख नहीं रहा है। रानी की चुप्पी के पीछे जानकारों का यह भी तर्क है कि उन्हें अपने बेटे दुष्यंत के राजनीतिक भविष्य की भी चिंता है। वे दुष्यंत को राजस्थान की राजनीति में स्थापित करना चाहती हैं। ४६ साल के दुष्यंत झालावाड़ से चार बार के सांसद हैं। रानी कतई नहीं चाहेंगी कि इसी उम्र का कोई और नेता खासकर सचिन पायलट भाजपा में आए या राजस्थान की राजनीति में काफी ऊपर तक जाए।
अब सचिन पायलट की स्थिति को समझें कि अब तक उनके लिए भाजपा ने लाल कालीन क्यों नहीं बिछाया? यह साफ हो चुका है कि सचिन पायलट के खेमे में १९ विधायक हैं। फच्चर यह है कि इनमें से अधिकांश विधायक पायलट के तो साथ हैं लेकिन भाजपा के साथ जाने से उन्हें घोर एलर्जी है। अगर पायलट खुद भाजपा में शामिल होते हैं तो १० से ज्यादा विधायक उनसे अलग होकर अशोक गहलोत खेमे में लौट सकते हैं। दूसरा सबसे बड़ा कारण यह है कि अभी तक पायलट की राजनीति भाजपा विरोधी विचारधारा की रही है। खांटी कांग्रेसी पिता की विरासत को आगे बढ़ाते रहे सचिन पायलट अगर भाजपा का दामन थामते है तो राजनीति में उन्हें बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। तीसरा सबसे बड़ा कारण यह है कि पिछले साल भर से अशोक गहलोत इस बात का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं कि सचिन पायलट भाजपा की कठपुतली की तरह काम कर रहे है। ऐसे में सचिन पायलट तत्काल अगर भाजपा का दामन थामते हैं तो उन पर लगा यह इल्जाम सही साबित हो जाएगा, जिससे उनके लंबे करियर को खासा नुकसान पहुंचा सकता है। जिसका परोक्ष असर भाजपा पर ही पड़ेगा। भाजपा के बड़े नेता खुलकर सचिन पायलट का पार्टी में स्वागत करने से डर भी रहे हैं क्योंकि पार्टी उन के महत्वाकांक्षी मिजाज को बेहतर समझती भी है और जानती भी है। पायलट की महत्वाकांक्षा सूबे का मुख्यमंत्री बनने की है जो न तो भाजपा और न राजे को कत्तई मंजूर होगी।
अब खबर यह है कि यदि अदालत का फैसला पायलट खेमे के पक्ष में आता है तो अगले कदम के रूप में पार्टी विधानसभा का सत्र बुलाकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने की तैयारी कर चुके हैं। शनिवार की रात आठ बजे राज्यपाल कलराज मिश्र से मिलकर उन्हें अपने समर्थन में १०२ विधायकों के समर्थन वाला पत्र सौंपना गहलोत के इसी कदम की प्रस्तावना है। मुख्य व्हिप महेश जोशी कांग्रेस के सभी विधायकों को पार्टी के पक्ष में वोट करने के लिए व्हिप जारी करेंगे। यदि पायलट खेमा व्हिप का उल्लंघन करता है या फिर अनुपस्थित रहता है तो इसे व्हिप के विपरीत कार्य माना जाएगा और दसवीं अनुसूची की धारा २(१)(बी) के तहत अयोग्य घोषित किया जाएगा। हालांकि, इसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है। पायलट और उनकी टीम के खिलाफ अभी संविधान की १०वीं अनुसूची की धारा २(१)(ए) के तहत अयोग्य ठहराने की प्रक्रिया चल रही है। जिसे दलबदल विरोधी कानून के नाम से जाना जाता है। यदि बागी विधायकों को अयोग्य ठहराया गया तो २०० सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा कम हो जाएगा और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को अपनी सरकार बचाने का एक आसान मौका मिल जाएगा। माकपा और भारतीय ट्राइबल पार्टी ने सदन में कांग्रेस का साथ देने की हामी भरकर गहलोत को मजबूत किया है। फिलहाल सबकी नजर अदालत पर है।