प्रजा ने चुना! किंगमेकर्स हारे!!

२०१९ का जनादेश स्पष्ट है। लोगों ने सीधे ‘प्रधानमंत्री’ चुना। किसी को इर्द-गिर्द भी नहीं रखा। इसलिए ‘किंगमेकर्स’ बनकर देखनेवाले धराशायी हो गए। मोदी की विजय निर्विवाद है!

नरेंद्र मोदी विजयी होंगे जिनको ऐसा लग रहा था, उनको भी आश्चर्यचकित लगा कि ऐसी प्रचंड, अभूतपूर्व और अलौकिक सफलता भाजपा सहित ‘एनडीए’ ने प्राप्त की। वर्ष २०१४ में मोदी विजयी हुए थे लेकिन उस विजय में मनमोहन सिंह और राहुल गांधी का ज्यादा योगदान था। कांग्रेस के बदनाम नेतृत्व और मनमोहन सरकार के नकारा साबित होने के बाद लोगों ने मोदी को मौका दिया था। इस बार वैसी स्थिति नहीं थी। मोदी ने पांच वर्ष तक सरकार चलाई इसलिए उनकी अपनी लड़ाई थी लेकिन मोदी को मिली सफलता २०१४ की अपेक्षा ज्यादा बड़ी है। यह सफलता उन्होंने सिर्फ अपने व्यक्तित्व और अथक परिश्रम के बलबूते पर हासिल की है। यह मोदी की व्यक्तित्व की प्रचंड जीत है। ऐसी सफलता इससे पहले सिर्फ इंदिरा गांधी को मिली थी।
उत्तर प्रदेश का आधिपत्य खत्म
सिर्फ उत्तर प्रदेश ही हिंदुस्थान का प्रधानमंत्री निश्चित कर सकता है, यह समझ और अंधश्रद्धा इस चुनाव परिणाम ने ध्वस्त कर दिया। उत्तर प्रदेश ने बड़ी सफलता नहीं दी होती तो भी पूरे देश ने मतदान करके मोदी को प्रधानमंत्री पद पर कायम रखा होता। मुसलमान-यादव और दलित मतों का वोट बैंक अखिलेश और मायावती के गठबंधन के कारण और मजबूत होगा तथा भारतीय जनता पार्टी की हार होगी, ऐसा गणित बताया जा रहा था लेकिन उत्तर में इसका उल्टा हुआ। यादवों के गढ़ कन्नौज में अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव चुनाव हार गर्इं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश में कांग्रेस की बुरी तरह हार हुई। लोगों ने जाति और धर्म के गठबंधन को दरकिनार कर मोदी को मतदान किया। महाराष्ट्र में प्रकाश आंबेडकर हैदराबाद के ओवैसी के साथ वंचित बहुजन आघाड़ी का गठन कर चुनावी मैदान में उतरे। सात-आठ निर्वाचन क्षेत्रों को छोड़कर उन्हें मतदान नहीं हुआ। संभाजीनगर में एमआईएम-बहुजन वंचित आघाड़ी के इम्तियाज जलील की जीत यह हादसा है। हर्षवर्धन जाधव ने इस निर्वाचन क्षेत्र में हिंदू मतों में विभाजन कर लाख भर वोट हथिया लिए। ये हुआ नहीं होता तो संभाजीनगर पर हरा झंडा कभी भी लहराया नहीं होता। महाराष्ट्र से खासकर संभाजीनगर से ‘ओवैसी’ की पार्टी का सांसद चुनकर जाए, यह दुर्भाग्य है। पूरे देश में हिंदुत्व की लहर उमड़ पड़ी है लेकिन महाराष्ट्र में संभाजीनगर हारा और औरंगाबाद जीता। यह झटका है।
‘किंगमेकर्स’ पराजित
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्राबाबू नायडू और तेलंगना के मुख्यमंत्री के. सी. चंद्रशेखर राव ने ‘किंगमेकर’ के रूप में भूमिका निभाई थी लेकिन स्वयं चंद्राबाबू विधानसभा गवां बैठे और लोकसभा में भी उनकी पार्टी हार गई। आंध्र का विधानसभा वाई. एस. आर. कांग्रेस ने जीता। आंध्र में लोकसभा की २५ सीटों में से २४ सीटें जगन की वाई. एस. आर. कांग्रेस ने जीती, वहां भाजपा भी पराजित हुई। तेलंगना में चंद्रशेखर राव की पार्टी को १७ सीटें मिलेंगी और इसके बल पर दिल्ली की सत्ता में ‘किंगमेकर’ बनूं, ऐसा सपना वे देख रहे थे। वहां उन्हें ८ ही सीट मिली। इस चुनाव परिणाम की विशेषता यह है कि मतदाताओं ने ‘सीधे’ राजा चुना। किंगमेकर की भूमिका किसी पर भी नहीं रखी। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के शिवसेना, जनता दल यूनाईटेड और रामविलास पासवान को अच्छी सफलता मिली। भारतीय जनता पार्टी को भी पूर्ण बहुमत का आंकड़ा मिला है। २०१४ के बाद २०१९ में यह दूसरी बार हुआ है। दक्षिण के केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश इन राज्यों में जहां बड़ी सफलता नहीं मिली वहीं उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और कर्नाटक राज्य मजबूती से मोदी के साथ खड़ा रहा। दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड ये छोटे राज्य भी १०० प्रतिशत मोदी को सभी सांसद दिए। मोदी की लहर में एक बार फिर कई लोग तर गए। वर्ष २०१४ की ही ये पुनरावृत्ति है। मतदाताओं ने उम्मीदवार न देखकर मोदी की ओर देखा। कमल पर बटन दबाया। वोट सीधे मुझे ही मिलेगा, मोदी का यह संदेश देश ने स्वीकारा।
जनादेश
लोकसभा चुनाव का परिणाम यह स्पष्ट जनादेश है। इस पर चर्चा करके क्या फायदा? विपक्ष की एकजुटता कितनी खोखली थी, यह दोबारा दिखी। दिल्ली में आप और कांग्रेस एक साथ नहीं आ पाए। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और तृणमूल एक मंच पर नहीं आए। उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश यादव का महागठबंधन हुआ, उसमें कांग्रेस को शामिल करने का मायावती ने विरोध किया। आंध्र में तेलगू देशम और कांग्रेस का नहीं जमा। कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल की सत्ता है, वहां भी लोकसभा में उनके सुर नहीं मिले। मेरा ही विरोधी दल सच्चा, ऐसा अलग झंडा लेकर हर कोई खड़ा रहा। इसके उलट भाजपा की फौज और एनडीए के मित्र दल एक दिल से लड़े। जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार है, वहां अंदरूनी गुटबाजी ने बचा-खुचा अस्तित्व को भी उजाड़ दिया। कांग्रेस पार्टी में आज भी एक ही घराने की राजशाही है लेकिन राहुल या प्रियंका गांधी मतलब पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी नहीं। ये बच्चे बुरे हैं, ऐसा कहना नहीं है लेकिन देश का नेतृत्व करना और कांग्रेस को आगे ले जाने के लिए सक्षम हैं क्या? यह सवाल है। प्रधानमंत्री को ‘चोर’ कह कर मतदाताओं पर प्रभाव नहीं डाला जा सकता है और जब तक पार्टी में नए कार्यकर्ता बनाए नहीं जोते तब तक सत्ता तो छोड़ो विरोधी दल के रूप में भी खड़े नहीं हो सकते। यह सबक राहुल गांधी को सीखना चाहिए। राहुल गांधी स्वयं अमेठी से पराजित हुए। २० वर्षों से यह निर्वाचन क्षेत्र गांधी घराने के पास है। एकाध उद्योग छा़ेडे तो बहुत ज्यादा होटल भी वहां खड़ा नहीं हो पाया है। बाहर से आए लोगों को बगल के सुल्तानपुर में जाना पड़ता है, ऐसा वहां जाकर आए पत्रकारों ने कहा। इंदिरा गांधी और संजय गांधी का अमेठी की नई पीढ़ी से भावनात्मक रिश्ते बचे नहीं हैं और राहुल गांधी का प्रभाव भी कम होता गया। इसलिए मोदी की लहर का झटका अमेठी में लगा। अब किसी का भी गढ़ और किला नियमित रूप से बरकरार नहीं है यह महाराष्ट्र में और अन्य जगहों में दिख रहा है। मोदी जीत यह उनके स्वयं की है। निर्विवाद है।
विपक्ष को उसे स्वीकारना होगा।