स्वर्ग बदलने की स्पर्धा!

महाराष्ट्र और देश में पार्टी बदलने की लहर हिलोरे मार रही है। विपक्ष बचेगा क्या? यह सवाल उठता है। कांग्रेस और राष्ट्रवादी कल तक जिनके लिए स्वर्ग थी वे सभी नए स्वर्ग के दरवाजे पर कतार लगाए खड़े हैं। स्वर्ग बदलने की स्पर्धा लोकतंत्र को नर्क बना देगी!

फिलहाल जो उठ रहा है वह भारतीय जनता पार्टी अथवा शिवसेना में जा रहा है, यह खुशी की बात है। कुछ वर्षों पहले तक ये पार्टियां राजनीति में अछूत मानी जाती थीं। आज इन्हीं दोनों पार्टियों के बाहर लोग कतार में खड़े हैं, जो कतार में खड़े हैं उनमें से कुछ लोग कई बार पार्टी छोड़ चुके हैं। इसलिए आज के आयाराम कल गयाराम नहीं होंगे, इसका विश्वास कोई नहीं दे सकता है। कांग्रेस अथवा राष्ट्रवादी छोड़नेवाले जो वजह बता रहे हैं उसे राजनैतिक मजाक माना जाना चाहिए। विचारों का यहां तिल मात्र भी संबंध नहीं। यह हर स्तर पर शुरू है। नीरज चंद्रशेखर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के पुत्र हैं। राज्यसभा में समाजवादी पार्टी के सांसद थे। विगत ५ वर्षों में मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ सबसे ज्यादा हंगामा इन्हीं महाशय ने मचाया था। राज्यसभा में मोदी सरकार के समक्ष मुश्किल खड़ी करनेवाले के रूप में नीरज चंद्रशेखर सबसे आगे रहते थे। एक बार मुलायम सिंह भाजपा में जाएंगे परंतु नीरज नीतियों से दगाबाजी नहीं करेंगे, ऐसा उनका बर्ताव था। एक दिन पहले तक वह उसी भूमिका में थे। अगले ही दिन उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और स्वर्ग का मार्ग पकड़ने के लिए भाजपावासी हो गए। अमित शाह ‘कल’ कश्मीर से अनुच्छेद ३७० हटाएंगे यह निश्चित हुआ तब रात में कांग्रेस संसदीय दल की आपातकालीन बैठक हुई। राज्यसभा में पार्टी के प्रतोद भुवनेश्वर कलिता ने ताव में आकर बोलना शुरू किया। सरकार ने ऐसा किया तो संविधान से विश्वासघात सिद्ध होगा, ऐसा उन्होंने बैठक में कहा। काम-काज चलने नहीं देना है और इसके लिए ‘प्रतोद’ के रूप में राज्यसभा में स्थगन प्रस्ताव व्यक्त करनेवाली सूचना उन्होंने राज्यसभा के चेयरमैन को भेज दी। दूसरे दिन सुबह में राज्यसभा में चेयरमैन नायडू ने घोषणा की कि भुवनेश्वर कलिता ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। कलिता ने उसी दिन कांग्रेस का भी त्याग कर दिया। वे चौबीस घंटे में भाजपा में चले गए। समाजवादी पार्टी के ही नरेश अग्रवाल संसद में सबसे ज्यादा मोदी सरकार पर प्रहार करते थे। एक रात में उनका मत परिवर्तन हो गया। वे भाजपा में चले गए। मुझे सबसे ज्यादा हैरानी होती है मुंबई कांग्रेस के नेता कृपाशंकर सिंह पर। कृपाशंकर मुंबई में उत्तर भारतीयों के बड़े नेता हैं। भ्रष्टाचार और आय से ज्यादा संपति मामले में उन पर ‘ईडी’ तथा एंटी करप्शन ब्यूरो ने मामला दर्ज किया है। जांच में काफी गड़बड़ियों का खुलासा हुआ है। ये तमाम जांच कांग्रेस के शासन में शुरू हुई परंतु भाजपा के शासन में उनकी सभी फाइलें ‘वॉशिंग मशीन’ में धोकर स्वच्छ किए जाने से उनके खिलाफ गुनाह दाखिल करने के लिए नए शासन में अनुमति नहीं दी गई। मुंबई के एक तत्कालीन पुलिस आयुक्त ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई। उसी समय कृपाशंकर सिंह भाजपा में जाएंगे, ये तय हो गया फिर भी वे लंबे समय तक रुके रहे। अब उन्होंने पार्टी त्याग दी है। अभी तक तो उनके लिए स्वर्ग के दरवाजे खोले नहीं गए हैं परंतु आनेवाले भविष्य में क्या होगा? यह दिखेगा ही। मंगलवार को कृपाशंकर दिल्ली में थे। मुंबई में कांग्रेस के उम्मीदवारों का नाम तय करने के लिए पार्टी की चयन समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया की उपस्थिति में हुई बैठक में कृपाशंकर ने भाग लिया। उन्होंने भी कुछ सुझाव दिए। कालीना विधानसभा क्षेत्र से बेटे को उम्मीदवारी देने की मांग कृपाशंकर ने की। बेटे को लड़ाने की बजाय आप खुद लड़ो, ऐसी शर्त पार्टी ने रखी। इस पर कृपाशंकर ने अलग ही रुख अख्तियार कर लिया और वह अनुच्छेद ३७० पर बोलने लगे। संविधान के अनुच्छेद ३७० के तहत जम्मू-कश्मीर को दिया गया विशेष दर्जा वापस लेने के मोदी सरकार के निर्णय का विरोध करने की पार्टी की भूमिका गलत है, ऐसा विचार कृपाशंकर ने व्यक्त किया। उस समय मुंबई के उम्मीदवारों का नाम बताएं, ऐसा बैठक में कांग्रेसी नेताओं ने उनसे कहा। तब उम्मीदवारों की सूची बाहर है लेकर आता हूं, ऐसा कहकर कृपाशंकर जो बैठक से बाहर निकले तो वापस लौटे ही नहीं। इतना ही नहीं बल्कि कुछ देर बाद उन्होंने मल्लिकार्जुन खरगे को अपना इस्तीफा भेज दिया। नीरज चंद्रशेखर से भुवनेश्वर कलिता और हर्षवर्धन पाटील से गणेश नाईक तक सभी ने भाजपा तथा कुछ ने शिवसेना में प्रवेश किया है। नारायण राणे अभी चौखट पर हैं और छगन भुजबल अपने हाथों की रेखा खुद ही देखते बैठे हैं।
विपक्ष नहीं?
दिल्ली में अर्थात लोकसभा में विपक्ष का नेता नहीं तथा महाराष्ट्र में भी उसे नहीं रखना है, ऐसा कुछ लोगों ने तय किया होगा तो देश के अस्तित्व और लोकतंत्र के लिए यह घातक सिद्ध होगा। महाराष्ट्र में कई निर्वाचन क्षेत्र ऐसे हैं कि वहां चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस को उम्मीदवार मिलेंगे क्या? यह सवाल है। कांग्रेस पार्टी में रहकर जो कमाया वो सब खजाना लेकर लोग दलबदल कर रहे हैं। दल बदलनेवालों की विशेषता यह है कि वे पुराने देवता का स्मरण करते हुए पार्टी छोड़ते हैं। शिवसेना से भुजबल, राणे, कोलंबकर आदि ने पार्टी छोड़ी तब बालासाहेब ठाकरे ही हमारे देवता हैं, ऐसा वे कहते रहे। अब पद्मसिंह पाटील, अकोला के पिचड़, सोलापुर के दीपक सालुंखे, बारसी के सोपल आदि मंडलियों ने शरद पवार ही हमारे देवता हैं, ऐसा कहकर पार्टी बदली है। उनमें से सभी ने शिवसेना-भाजपा की आलोचना की थी। कोकण से भास्कर जाधव भी शिवसेना में लौट आए। यहां एक बात ध्यान रखनी चाहिए कि अपने कर्तृत्व पर ५ फीसदी भी जीतकर आने का भी विश्वास रहा होता तो इनमें से कोई भी भाजपा-शिवसेना में सरके नहीं होते तथा अनुच्छेद ३७० का बहाना बनाकर दल नहीं बदले होते। कांग्रेस में रहते हुए इनमें से किसी ने अनुच्छेद-३७० के बारे में बोला नहीं था। एक बार खिड़की खुली तो हवा के साथ कीट-पतंगे भी आते हैं। यहां तो स्वर्ग के तमाम दरवाजे खोल रखे हैं। पानी की सही समय पर निकासी नहीं होती है तो क्या होता है, यह सांगली-कोल्हापुर की बाढ़ ने दिखा दिया। निकासी का पानी जिनके घर में भरा है, वे सावधान रहें!
कौन कहां?
छगन भुजबल भी शिवसेना में आएं, ऐसी इच्छा संबंधित खबरें प्रकाशित हुईं। भुजबल ने यह सब झूठ है, ऐसा कहा और पुणे में राष्ट्रवादी की बैठक में जाकर बैठ गए। ३० साल पहले शिवसेना नहीं छोड़ूंगा, ऐसा ही वे अंत तक कहते रहे। आज की राजनीति में चरित्र नाम की बात शेष नहीं रही है और चरित्र हनन बड़ा हथियार बन गया है। इसके लिए पूरे सरकारी तंत्र का सभी स्तरों पर इस्तेमाल किया जाता है। लोकप्रिय अंग्रेजी लेखक मैकाले ने कवि मिल्टन का चरित्र वर्णन करते समय तत्कालीन परिस्थितियों का जो वर्णन किया है, उसका अनुभव आज देखने को मिल रहा है। उन परिस्थितियों का वर्णन करते हुए मैकाले लिखते हैं, ‘…और फिर ऐसे दिन आ गए कि उन दिनों को याद करते ही सिर लज्जा से झुक जाता था! स्वामी भक्ति खत्म हो गई! सिर्फ स्वार्थी लोगों की जहां-तहां भरमार हो गई। झाड़ियों की ऊंचाई की तरह समाज से सद्गुण नदारद हो गए और दुर्गुणों की ऊंचाई पहाड़ों जैसी ऊंची हो गई। समाज में चरित्र का अस्तित्व ही शेष नहीं रहा।’ चरित्र के लिए अत्यावश्यक मानी जानेवाली इंसानियत, श्रद्धा, सत्य, ज्ञान और विश्वास ऐसे सद्गुणों का अकाल पड़ गया है। जब अतिवृष्टि होती है अथवा अनावृष्टि होती है तब अकाल पड़ता है। महाराष्ट्र में दोनों हुआ है। अतिवृष्टि है ही परंतु लातूर जैसी जगहों पर गणेश प्रतिमा विसर्जन करने लायक पानी भी शेष नहीं बचा है इसलिए विसर्जन न करें मूर्ति दान करें, ऐसा कहना पड़ा। ३७० जितना ही लातूर सहित मराठवाड़ा का जलसंकट भी महत्वपूर्ण है। इस पर कोई इस्तीफा नहीं देता और पार्टी नहीं बदलता है।
अकाल की ओर देखें
सर्वत्र अकाल पड़ा है फिर भी भाजपा-शिवसेना की झोली में भरभराकर लोग गिर रहे हैं। राजनीति एक मुश्किल कला थी लेकिन अब कुछ लोगों ने इसे आसान बना दिया है। संसदीय परंपरा तोड़कर राजनैतिक कला को अधिक आसान बनाने का प्रयास किया तो लोकतंत्र धराशायी हो जाएगा। पंडित नेहरू व कांग्रेस को लेकर मतभेद हो सकता है परंतु संसदीय लोकतंत्र की परंपरा का उन्हें मान रखना चाहिए। स्वतंत्रता के बाद की संसद के कुछ संकेत परंपरा और प्रथा मुख्य रूप से कांग्रेस ने निर्माण की। संसद और विधानसभा में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव की परंपरा कांग्रेस की देन है। कामकाज सलाहकार समिति (बिजनेस एडवाइजरी कमेटी) कांग्रेस के कारण ही बनी। अन्य किसी भी देश में ये दो बातें नहीं हैं। विपक्ष का महत्व पंडित नेहरू ने बढ़ाया। प्रारंभ में विपक्ष कमजोर था इसलिए वे एक बार बोले थे कि ‘मुझे दोनों भूमिकाएं निभानी पड़ती हैं प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता की।’ अटल बिहारी वाजपेयी नेहरू के मार्ग से ही आगे बढ़े। विपक्ष नहीं होगा तो देश कमजोर और लोकतंत्र खोखला हो जाएगा। राजनीति में एकतंत्री बन जाती है। आज जिन्हें स्वर्ग के चौखट पर खड़े रहकर अंदर घुसना है, उनसे सावधान रहना चाहिए। नंदनवन के फूलों के बाग के वे माली बन गए तो स्वर्ग को नर्क में बदलने में देर नहीं लगेगी। अपने-अपने देवताओं की सौगंध खाते हुए लोगों ने ‘स्वर्ग’ बदला है। कभी कांग्रेस तो कभी राष्ट्रवादी स्वर्ग थी। समाजवादी पार्टी, तेलुगुदेशम, तृणमूल कांग्रेस भी सभी के लिए स्वर्ग थी। स्वर्ग बदलने की स्पर्धा में नंदनवन ‘नर्क’ न बन जाए।