सुख किसमें है? अब हिटलर का भूत भी मर गया!

दिल्ली की हवा बिगड़ गई इसलिए महाराष्ट्र की हवा नहीं बिगड़नी चाहिए। दिल्ली में पुलिस ही सड़क पर उतर आई और उन्होंने कानून तोड़ा। यह अराजकता की चिंगारी है। महाराष्ट्र में राजनैतिक अराजकता निर्माण करने का प्रयास करनेवालों के लिए यह सबक है। महाराष्ट्र का निर्णय महाराष्ट्र में ही होने की दिशा में हम सभी निकल पड़े हैं।
देश को एक प्रखर गृहमंत्री मिल गए हैं फिर भी राजधानी दिल्ली में पुलिस ने बगावत की। पुलिस और उनके परिवार सड़क पर उतर आए। पुलिसवालों ने ही न्याय के लिए मोर्चा निकाला। इस वजह से दिल्ली की कानून-व्यवस्था साफतौर पर धराशायी हो गई तथा अराजकता जैसी स्थिति निर्माण हो गई। पहले पुलिस और वकीलों में मारपीट हुई। इस पूरे मामले में पुलिसवालों ने दिल्ली पुलिस आयुक्त का आदेश नहीं माना तथा वकीलों ने उच्च न्यायालय का आदेश नहीं माना। दिल्ली, देश की राजधानी में ही कानून-व्यवस्था ७२ घंटे अस्तित्वहीन रही ये स्थिति ठीक नहीं है। ये सब वैâसे हुआ? देश का गृहमंत्रालय दिल्ली में। दिल्ली आज भी केंद्रशासित प्रदेश है इसलिए दिल्ली में कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी केंद्र की ही है। महाराष्ट्र में बाबासाहेब भोसले के समय इसी तरह पुलिसवालों ने बगावत की थी। पुलिस हाथ में बंदूक लेकर उतर आई। राज्य को बंदी बना लिया। दिल्ली का भी माहौल पुलिस की बगावत के कारण ऐसा ही हो गया।
नैतिकता कैसी?
नैतिकता की गप फिलहाल कौन हांक रहा है? रोज व्यभिचारियों की तरह बर्ताव करनेवाले दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं तब हैरानी होती है। जनता बुद्धिहीन हो गई है, ऐसी उन्हें गलतफहमी है। इसलिए जो चाहे वो निर्णय उन पर लादा जाए, ये मानो तय करके ही किया गया है। जब सम्राट सेवेरस मरने लगा तब उसने आखिरी उद््गार व्यक्त किया, ‘हमें काम चाहिए।’ आज देश के बहुसंख्य मेहनतकश हाथों के लिए काम नहीं है। किसानी करके जीवनयापन करनेवाले बेरोजगार हो गए हैं क्योंकि शासकों के मन से काम करने की और पसीना बहाने की भावना ही नष्ट हो गई है। हमेशा की राजनीति व साजिश ही मानो काम बन गई है। शिवराय के महाराष्ट्र में ऐसा क्यों हो? शिवराय के राज्य में भी सैनिक मुहिम पर जाते थे तथा मुहिम न होने पर घर चलाने के लिए खेती करते थे। रोमन साम्राज्य का विस्तार भी सतत परिश्रम से हुआ। इस श्रम के कारण ही रोमन सेनापति की सत्ता टिकी रही। इटली में पुराने दौर में किसान व अधिकारी वर्ग समाज में समान स्तर पर होते थे। इस बारे में प्लीनी नामक लेखक ने बढ़िया लेख लिखा है। ‘जीतकर आए सेनापति और सेना के अधिकारी युद्ध से वापस लौटने पर खुशी से खेत जोतने जाते थे। जमीन जोतने में उन्हें सम्मान महसूस होता था। बाद में हर व्यवसाय में गुलामों को काम पर लगाने का रिवाज शुरू हो गया। तब मेहनत करना गुलामों का काम है इसमें छोटापन है, ऐसी लोगों की सोच हो गई और शासन चलानेवाले लोगों में जब आलस व आरामपरस्ती घुस गई तब रोमन साम्राज्य अपने आखिरी दिन गिनने लगा।
यहां भी रोमन साम्राज्य
महाराष्ट्र में रोमन साम्राज्य जैसी अवस्था बीच के दौर में उत्पन्न हो गई, इस सत्य से कोई इंकार नहीं करेगा। ‘मैं राजा, बाकी सब गुलाम’ फिर ऐसे समय में जिन्होंने राज्य बढ़ाया उन अजीज साथियों को दुश्मन ठहराकर हाशिए पर डाला जाता है। ये सब राजनीति एक बार खत्म कर दो। इस मानसिकता में फिलहाल महाराष्ट्र है। यक्ष ने युधिष्ठिर से जो विभिन्न प्रश्न पूछे थे उनमें, ‘उत्तम सुख का मतलब क्या है?’ ऐसा एक सवाल पूछा गया था और बहुत ही सावधानी के साथ युधिष्ठिर ने यक्ष के सवाल का जो जवाब दिया, उसमें सुख की उत्कृष्ट व्याख्या समाहित दिखाई देती है। युधिष्ठिर कहते हैं, ‘संतोष में सारे सुख हैं।’ सुख की व्याख्या संतोष में है। राजनीति से विवेक और संतोष खत्म होने पर आज जैसी खत्म न होनेवाली तृष्णा उत्पन्न हो गई है।
हवा बिगड़ी
दिल्ली की हवा बिगड़ी इसलिए महाराष्ट्र को खांसी नहीं आनी चाहिए। महाराष्ट्र की राजनीति महाराष्ट्र में ही हो। महाराष्ट्र दिल्ली का गुलाम नहीं है। यहां के पैâसले यहीं होने चाहिए। चुनाव परिणाम घोषित होने के दूसरे ही दिन प्रधानमंत्री मोदी ने मुख्यमंत्री फडणवीस की सराहना की। फडणवीस ही दोबारा मुख्यमंत्री बनेंगे, ऐसा आशीर्वाद दिया परंतु १५ दिन बाद भी श्री फडणवीस शपथ नहीं ले सके क्योंकि अमित शाह राज्य की घटनाओं से अलिप्त रहे। ‘युति’ की सबसे बड़ी पार्टी शिवसेना ढलते हुए मुख्यमंत्री से बात करने को तैयार नहीं है, ये सबसे बड़ी हार है। इसलिए दिल्ली का आशीर्वाद मिलने के बाद भी घोड़े पर बैठने को नहीं मिला। अवस्था ऐसी है कि इस बार महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री कौन होगा? ये उद्धव ठाकरे तय करेंगे। राज्य के बड़े नेता शरद पवार की भूमिका महत्वपूर्ण सिद्ध होगी तथा कांग्रेस के कई विधायक सोनिया गांधी से मिलकर आए। महाराष्ट्र का निर्णय महाराष्ट्र को सौंपे, ऐसा उन्होंने भी सोनिया गांधी से कहा। कुछ भी हो लेकिन दोबारा भाजपा का मुख्यमंत्री न हो, यह महाराष्ट्र का एकमुखी सुर है। क्योंकि बदले की टांग खींचने की व गुलामी की राजनीति सभी को खत्म करनी है। पांच साल औरों को डर दिखाकर शासन करनेवाली टोली आज खुद खौफजदा है। यह उल्टा हमला हुआ है। डराकर भी मार्ग नहीं मिला और समर्थन नहीं मिलता है, ऐसा जब होता है तब एक बात स्वीकार करनी चाहिए कि हिटलर मर गया है और गुलामी की छाया हट गई है। पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों को इसके आगे तो बेखौफ होकर काम करना चाहिए। इस परिणाम का यही अर्थ है!