जंग है ही, नहीं क्यों कहते हो? महाराष्ट्र में कल क्या होगा?

२१ तारीख को महाराष्ट्र चुनाव का सामना करेगा। अगले २४ घंटों में इतिहास बदल सकता है परंतु २४ तारीख के बाद भूगोल बदलना नहीं चाहिए। इसलिए युति में रहकर भी शिवसेना अकेले सेनापति की तरह लड़ रही है। चुनाव में किसी की चुनौती नहीं है, ऐसा मुख्यमंत्री कहते हैं। फिर भी प्रधानमंत्री मोदी एवं गृहमंत्री शाह ने कुल ४० सभाएं महाराष्ट्र में की।

२०१९ के कल होनेवाले चुनाव हमेशा से अलग हैं। अनुच्छेद-३७०, राम मंदिर आदि राष्ट्रीय मुद्दे राज्यों के विधानसभा चुनाव प्रचार में नहीं आए थे। इस बार महाराष्ट्र के प्रचार में वे अग्रक्रम में आ गए। इसका मतलब महाराष्ट्र की सभी समस्याएं विगत ५ वर्षों में हल हो गईं, ऐसा नहीं है परंतु अब चुनाव मुद्दों पर नहीं बल्कि भावनात्मक समस्याओं पर लड़े जा रहे हैं। राम मंदिर, समान नागरिक कानून आदि मुद्दे लोकसभा चुनाव में थे ही। अनुच्छेद-३७० अमित शाह ने हटाया। ये राष्ट्रीय मुद्दा है परंतु महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव प्रचार में अनुच्छेद-३७०, राम मंदिर आया है। पवार जैसे नेताओं को ये विषय राज्य के चुनाव में स्वीकार नहीं हैं। प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री शाह का जोर इन्हीं प्रश्नों पर रहा। दूसरी तरफ शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे १० रुपए में भोजन, एक रुपए में स्वास्थ्य जांच और किसानों के खाते में १० हजार रुपए आदि मुद्दे लेकर खड़े रहे। किसी को तो राज्य और लोगों की समस्याओं पर बोलना ही चाहिए। मुख्यमंत्री फडणवीस ने ५ वर्ष शासन किया। उनकी सरकार स्थिर रही। राज किया परंतु राज्य को क्या दिया? इसका जवाब कल के मतदान में मिलेगा।
भार पवार पर ही!
कांग्रेस पार्टी में नेतृत्व शेष रहा ही नहीं। यशवंतराव चव्हाण से वसंतदादा पाटील, विलासराव देशमुख द्वारा नेतृत्व की गई कांग्रेस पार्टी यही है क्या? इसलिए कांग्रेस और राष्ट्रवादी ऐसी दोनों पार्टियों के प्रचार का भार ८० वर्षीय शरद पवार संभाल रहे हैं। फडणवीस, मोदी और शाह के विरोध में दमदार बैटिंग करते हुए श्री पवार ने महाराष्ट्र को छान डाला। महाराष्ट्र में दो नेताओं की सभाओं में इस बार सर्वाधिक भीड़ हुई। पहले श्री उद्धव ठाकरे व दूसरे श्री शरद पवार। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री की सभा तो होगी ही और उनके लिए पूरा सरकारी तंत्र तैयारी में जुट जाता है। इस बारे में विचार करना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को ऐन चुनाव के समय तोड़ दिया। इसलिए पार्टी को एक बार फिर खड़ा करने के लिए ८० वर्षीय नेता खड़े हो गए। राजनीति में एक बात ध्यान रखनी चाहिए आयाराम-गयाराम प्रवृत्ति लोग सहज स्वीकार नहीं करते। पार्टी बदलनेवाले आसानी से चुनाव नहीं जीत पाते। वे अवसरवादी होते ही हैं। शिवसेना अथवा भाजपा से बाहर निकले लोगों के खिलाफ जैसा रोष होता है, वैसा ही रोष कांग्रेस अथवा राष्ट्रवादी से बाहर निकले लोगों के खिलाफ भी हो सकता है। ये रोष और नाराजगी क्या होती है इसके लिए सातारा में उदयनराजे भोसले और अकोला में पिचड के मामले में माहौल देखना चाहिए। महाराष्ट्र के राजनैतिक इतिहास में सर्वाधिक दल-बदल इस चुनाव में हुआ। संपूर्ण विरोधी पार्टी को सत्ताधारी पार्टी में विलीन कर लेने का तथा विरोधी पार्टी को शेष नहीं रखने की यह नीति उलट सकती है क्योंकि महाराष्ट्र की परंपरा लड़नेवालों की और बगावत करनेवालों की ही है। इस बगावत की चिंगारी भी महाराष्ट्र के कई निर्वाचन क्षेत्रों में दिख रही है। शिवसेना और भाजपा एक साथ लड़ रहे हैं परंतु लगभग ३७ निर्वाचन क्षेत्रों में शिवसेना-भाजपा के प्रमुख कार्यकर्ता एक-दूसरे के विरोध में ताकत से लड़ रहे हैं। इसकी वजह यह है कि महाराष्ट्र में ‘युति’ हुई। शिवसेना १२४ सीटों पर लड़ रही है। भाजपा ने मित्र दलों को समेटकर १६४ जगह हासिल कर ली परंतु दोनों पक्षों ने पहले स्वतंत्र रूप से लड़ने की तैयारी की थी। ऐन वक्त में उस तैयारी पर पानी फिर गया। इसलिए कई सीटों पर दोनों पक्षों में सक्षम उम्मीदवार होने के बावजूद मौका नहीं मिला। कहा जाए तो युति और विचार को ठुकराकर लोग खुद के अस्तित्व के लिए लड़ते हैं। इन्हें बागी कहना मुझे स्वीकार नहीं है।
थोड़ा ये देखो…
महाराष्ट्र में कल के चुनाव की विशेषता क्या है?
१) शिवसेना-भाजपा युति निश्चित तौर पर जीत रही है इसलिए जंग खत्म हो चुकी है।
२) मुख्य विरोधी दल कौन सा होगा? इतना ही सवाल है। विपक्ष इतना बेबस इंदिरा गांधी के सुनहरे दौर में भी नहीं हुआ था।
३) राज ठाकरे सभा कर रहे हैं। कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में उन्होंने कांग्रेस-राष्ट्रवादी से संबंध बनाए। उनकी सभाओं में भीड़ लोकसभा चुनाव में हुई थी। विधानसभा में भी वो हुई तो उसका रूपांतर मतों में होना मुश्किल है।
४) शरद पवार ने इतनी आक्रामकता से पहले कभी भी प्रचार नहीं किया था। महाराष्ट्र का यह जाणता राजा तू-तू, मैं-मैं और ‘उखाड़ने’ की भाषा बोलने तक पहुंच गया क्योंकि राज्य का माहौल बदल गया है और पवार के अस्तित्व की यह लड़ाई है।
५) बेलगाव सीमा समस्या महाराष्ट्र की अस्मिता, मुंबई के मराठी लोगों की समस्या आदि पर मौन साधनेवाला यह विगत ६० वर्षों में पहला चुनाव है।
६) भारतीय जनता पार्टी ने शिवसेना को कम सीटें दीं। भाजपा ने अपने मित्र दलों को भी कमल के चुनाव चिह्न पर लड़ने पर मजबूर किया इसलिए भाजपा कमल पर १६४ सीटें लड़ रही है। ये मित्रपक्षों के साथ छल होने की व्यथा खुद महादेव जानकर ने व्यक्त की। १६४ में से १४४ सीटें जीतें, ऐसा भाजपा को लगता है तथा १२४ में १०० सीटें जीतेंगे, ऐसा शिवसेना को लगता है। इन तमाम आंकड़ों में शरद पवार और उनकी राष्ट्रवादी पार्टी निश्चित तौर पर कहां खड़ी है!
७) नारायण राणे ने बेटों सहित भाजपा में प्रवेश किया। कणकवली निर्वाचन क्षेत्र में उनके पुत्र भाजपा का कमल हाथ में लेकर खड़े हैं। वहां ‘युति’ होने के बाद भी शिवसेना ने अधिकृत उम्मीदवार खड़ा किया है। सतीश सावंत ने धनुष-बाण निशानी लेकर राणे के खिलाफ बगावत की है।
८) ‘युति’ और ‘आघाड़ी’ दोनों ओर से है परंतु अविश्वास की धुंध उतनी ही गहरी हो गई है। २४ तारीख को दोपहर में इस धुंध से कौन किस राह पर जा रहा है, ये समझ में आएगा।
आदित्य ठाकरे
आदित्य ठाकरे चुनावी मैदान में उतरे और उनका चुनाव राज्य का राजनैतिक इतिहास बदलनेवाला सिद्ध होगा, ऐसा माहौल आज है। आदित्य ठाकरे चुनाव लड़ रहे हैं तो विधानसभा में जाकर सिर्फ विधायक बनकर बैठा जाए इसलिए नहीं। राज्य का नेतृत्व वे करें, ऐसी महाराष्ट्र की नई पीढ़ी की इच्छा है। राज्य का मुख्यमंत्री कौन यह २४ तारीख को ही पता चलेगा! राज्य का दृश्य शिवसेना-भाजपा युति के लिए आशादायक है। मुख्यमंत्री कहते हैं कि युति को चुनौती देनेवाले पहलवान अखाड़े में नहीं हैं, लड़ा किससे जाए? ये सवाल इसीलिए है। परंतु चुनौती है ही। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी को १० और गृहमंत्री अमित शाह को ३० सभाएं करनी पड़ीं? खुद मुख्यमंत्री फडणवीस को १०० सभाएं क्यों करनी पड़ी, यह सवाल शरद पवार ने पूछा, जो कि गलत नहीं है। महाराष्ट्र की लड़ाई बड़ी है इसलिए दिल्ली के नेता महाराष्ट्र में खूंटा गाड़ के बैठे हैं। कांग्रेस के शासन में मुंबई-ठाणे के हिंदीभाषी वोट पाने के लिए यहां लालू यादव, मुलायम यादव आते थे। उत्तर प्रदेश और बिहार के मंत्री आते थे इसलिए उनकी आलोचना होती थी। अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आते हैं और भाजपा का प्रचार करते हैं। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य भी मुंबई में आकर ठहरे। अंतत: हिंदीभाषी वोट यहां-वहां न जाए और हिंदू के रूप में युति के पाले में ही गिरे इसके लिए यह प्रयोजन। ‘लड़ाई’ है ही इसलिए यह सब तैयारी ‘महायुति’ को करनी पड़ी। शिवसेना ‘युति’ में रहकर भी अंतत: अकेले सेनापति की तरह लड़ी। महाराष्ट्र का इतिहास है, इस राज्य का भूगोल २४ तारीख के बाद कोई बहुमत के बल पर बदले नहीं इसलिए यह अकेला सेनापति लड़ रहा है। महाराष्ट्र इसे याद रखेगा!