" /> एक ही नाम: बस वुहान!

एक ही नाम: बस वुहान!

पूरी दुनिया जानती है कि गत वर्ष नवंबर में ‘सार्स सीओवी-२’ वायरस का पहला मामला मध्य चीनी शहर वुहान से सामने आया था। इसकी घातकता का दुनिया को जब तक सही-सही अंदाजा लगता, काफी देर हो चुकी थी। चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने वायरस को लेकर शुरुआत से ही सारी जानकारियां छिपार्इं, जिन्हें वो आज तक उजागर करने को राजी नहीं है। इस बीच वैश्विक मंच पर इसे लेकर खुद को घिरा पाते ही शी जिंगपिंग सरकार को हिंदुस्थान के सहयोग की जरूरत महसूस होने लगी। उसी चीन को जो हिंदुस्थान की इच्छा के विरुद्ध जैश-ए-मोहम्मद के कुख्यात आतंकी सरगना मसूद अजहर का विश्व मंच पर बार-बार, लगातार बचाव करता रहा है। न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप हो या फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट, जिसने कभी किसी मुद्दे पर हिंदुस्थान को सहयोग नहीं दिया है, बल्कि हमेशा खुलकर उसमें रोड़े ही अटकाए हैं। चीन हिंदुस्थान को एक के बाद एक गहरे घाव देने की योजना पर निरंतर काम करता आया है और यह तय है कि आगे भी वो ऐसा ही करता रहेगा। यही चीन का दोहरा चरित्र है और घिनौना सच भी।

‘हिंदुस्थान को मुसीबत में डालो, परंतु खुद पर मुसीबत आए तो बेशर्मी से सहयोग मांग लो। आंखें दिखाओ और मौका मिलते ही आंखों में धूल भी झोंक दो, पीठ पर वार ही कर दो।’ चीन की ये दोगली कार्यशैली किससे छिपी है? १९६२ में भी उसने यही किया था और तबसे आज तक वो यही कर रहा है। और हमने क्या किया? हमने हमेशा उसकी सहमति में सहयोग तलाशने की नासमझी की। उसके चाल, चरित्र और चेहरे को पहचानने में मात खाने से आगे कुछ नहीं किया। यह जानते हुए भी कि चीन की हिंदुस्थान विरोधी दीर्धकालीन योजना में कदम-कदम पर साम-दाम-दंड-भेद का मायाजाल है, हम हमेशा उसे समझने में विफल रहे हैं। वर्तमान परिस्थिति इसका ताजा उदाहरण है। दुनिया को एक भीषण महामारी देकर इस बार भी उसने बड़ी सफाई से खुद को इससे अलग कर लिया है। उसने बेहद चलाकी से सभी को किसी-न-किसी मामले में उलझाकर खुद की समस्या को लगभग सुलझा लिया है। किसी पर आरोप लगाए, किसी को खरीदा, किसी से सहयोग मांगा तो किसी को साथ लेकर बचाव की राह आसान बना ली। येन-केन-प्रकारेण उसने वुहान वायरस का मनचाहा नामकरण भी करवा ही लिया है।

सांच को आंच क्या?
आज पूरी दुनिया महामारी फैलने की वजहों की एक विस्तृत अंतरराष्ट्रीय जांच चाहती है। जानना चाहती है कि इसमें चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का रोल क्या है? अमेरिका की फॉरेन अफेयर्स सेलेक्ट कमिटी, वायरस से संबंधित तथ्यों की तह में जाकर खोज करना चाहती है। वायरस वैâसे पैâला, यह पता लगाना चाहती है। चीन आरोप लगाता है कि इस वायरस के लिए अमेरिका जिम्मेदार है, तो अमेरिका बार-बार कहता है कि यह वुहान की लैब में ही तैयार किया गया है। यदि चीन को लगता है कि उसके आरोपों में दम है, उसकी ओर से कुछ गलत नहीं हुआ है, तो हो क्यों नहीं जाने देता जांच? सांच को आंच क्या? इससे उसके उन आरोपों की सत्यता भी सामने आ ही जाएगी, जिनमें उसने संक्रमण के लिए अमेरिकी सैनिकों को जिम्मेदार ठहराया है। तमाम वैज्ञानिक व शोधकर्ता तो कह ही रहे हैं कि वायरस कहां से निकला है, उसका सही-सही स्रोत पता लगाना और उसकी जांच करना बेहद जरूरी है। महामारी की वैक्सीन विकसित करने व इलाज की खोज के लिए पहले वायरस को समझना जरूरी है। परंतु चीन इसमें भी अड़ीबाजी करता है। ये संकेत है कि वैश्विक आरोपों में दम है और चीनी आरोप बेदम। चीन की आवाज अकेली है, तो अमेरिका की आवाज में ऑस्ट्रेलिया समेत विभिन्न देशों का साथ। प्रथमदृष्टा सबूतों के आधार पर भी वायरस का स्रोत वुहान का मांस बाजार है, तो तथ्यात्मक आरोपों में वुहान की ही एक लैब। दोनों में आम बात यह कि इसका उद्गम चीन का वुहान शहर ही है। इसीलिए शायद बीजिंग शिद्दत से इसकी जानकारी छिपाने का घृणित काम कर रहा है। यदि उसका दामन पाक-साफ होता तो नवंबर, २०१९ से लेकर जनवरी, २०२० तक वो भ्रम की स्थिति न बनाए रखता। पहले चीन, फिर उसकी शह पर डब्ल्यूएचओ वुहान वायरस वाली सच्चाई दुनिया से न छिपाता, उस पर पर्दा डालने की हर मुमकिन कोशिश न करता। शुरुआत में डब्ल्यूएचओ ने चीन के इशारे पर वायरस की घातकता को लेकर लगातार संभ्रम निर्मित किए थे, उसके संसर्गजन्य न होने का पुख्ता दावा किया था। यह जानते हुए भी कि ऐसा करना इतिहास से कहीं ज्यादा नुकसानदेह हो सकता है, उसने चीन की हर गलती पर पर्दा डालने का हर संभव प्रयास किया। उसने कथित चीनी प्रयासों का पुरजोर महिमामंडन भी किया और तारीफों के पुल भी बांधे। उसने अधिकृत तौर पर यहां तक कह दिया कि चीन ने वायरस नियंत्रण के नए आयाम स्थापित कर दिए हैं।

पालतू गठबंधन का फालतू खेल…
वुहान में मिला वायरस पहली नजर में डब्ल्यूएचओ को घातक न भी लगा हो तब भी उसके प्रसार को सीमित करने के प्रयास तो उसे करने ही चाहिए थे। ‘प्रिकॉशन इज बेटर देन क्योर’ यह मेडिकल जगत की ए-बी-सी है, इसके बावजूद डब्ल्यूएचओ को ‘एहतियात वाली’ एक आवश्यक एडवाइजरी तक जारी करने का समय नहीं मिला। उलट, जिन देशों ने अपने नागरिकों के लिए आवश्यक सतर्कता सुनिश्चित करना शुरू किया भी तो डब्ल्यूएचओ ने उससे किनारा कर लिया। डब्ल्यूएचओ ने यात्रियों की स्क्रिनिंग तक को बेमानी बता दिया था। लिहाजा, वुहान वायरस चीन से निकलकर आसानी से पूरी दुनिया में पैâलता चला गया। चीन के भीतर बैठे विशेषज्ञों से लेकर पड़ोसी ताइवान तक ने जब इस घातक वायरस को लेकर बार-बार चेताया, तब भी डब्ल्यूएचओ के कानों पर जूं तक न रेंगी। नतीजा, चीन में वायरस पर उठनेवाली हर आवाज को आसानी से दबा दिया गया, सबूतों को नष्ट कर दिया गया। इसलिए इस महामारी के लिए जितना चीन दोषी है, उससे कम दोषी डब्ल्यूएचओ भी नहीं। याद रहे, ये वही डब्ल्यूएचओ है, जिसने अभी १७ साल पहले ही, २००३ में चीन की नाक में नकेल कस दी थी। जब ‘सार्स-१’ वायरस के ८०,००० मामलों से ८,००० मौतें हुई थीं। आज डब्ल्यूएचओ के मौजूदा प्रमुख डॉ. ट्रेडोस गैबरेयेसस, उनके मुल्क इथोपिया और चीनी सरकार के संबंध किसी से छिपे नहीं हैं। जो देश चीन के निवेश पर जिंदा हो, जहां का पूर्व स्वास्थ्य मंत्री आज डब्ल्यूएचओ का सरबरा हो, प्रमुख हो, उसी की पार्टी की उसके देश में सत्ता हो, उससे चीन के प्रति इसी वफादारी की ही उम्मीद की जाएगी। परंतु वफादारी यदि गले का पट्टा बन जाए तो मामला पालतू हो जाता है। जब दुनिया को डब्ल्यूएचओ से एक जिम्मेदार अगुवाई की अपेक्षा थी, वो सारी मर्यादाएं ताक पर रखकर आंखें मूंदे आका की धुन पर नाच रहा था। कुल मिलाकर, मौजूदा प्रमुख ने डब्ल्यूएचओ की साख को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। पूरी दुनिया इस ‘पालतू गठबंधन’ का ‘फालतू’ खेल देख ही चुकी है।

वायरस नॉन जेनेटिकली इंजीनियर्ड ही!
आज दुनिया बखूबी जान चुकी है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को `गंभीर मंदी’ की चपेट में आना ही है। ये तो शुरूआत है, हर देश को महामारी का बड़ा खामियाजा उठाना ही है। जब पूरी दुनिया इससे बुरी तरह प्रभावित हो, तब आह निकलना स्वाभाविक है और उतना ही स्वाभाविक है इसके जिम्मेदार वायरस को सही नाम देने की मांग का उठना। एक ताजा स्टडी से ‘नाम की गुत्थी’ पर और प्रकाश पड़ता है। जो कहती है कि ये वायरस वुहान के मांस बाजार में किसी जानवर से नहीं पैâला है। मॉलीक्यूलर बायोलॉजिस्ट अलीना चैन और इवोल्यूशनरी बायोलॉजिस्ट शिंग झैन द्वारा वायरस के जेनेटिक डाटा को खंगालने पर पता चला है कि इसके जानवरों से इंसानों में पैâलने की कोई संभावना नहीं है। इस आधार पर तो दूसरी संभावना ही पुख्ता होती है न! अर्थात निश्चित ही यह वायरस लैब में स्टडी के दौरान नॉन जेनेटिकली इंजीनियर्ड है, जो कि किसी तरह इंसान के संपर्क में आ गया होगा। डेली मेल की एक रिपोर्ट इसकी पुष्टि करती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक इस वायरस का स्पेशलिस्ट और बायोलॉजिस्ट ने विश्लेषण किया है। प्राप्त डेटा के मुताबिक इसका संक्रमण पहले से ही संक्रमित व्यक्ति के जरिए मीट मार्केट में पहुंचा था। वायरस में पहले से ही एक इंसान से दूसरे इंसान में पैâलने के लक्षण थे। जिससे इसका प्रसार तेजी से हुआ। इन प्रारंभिक तथ्यों के आधार पर वायरस की कहानी बिल्कुल साफ है कि वो वुहान के लैब में चमगादड़ों पर किए गए किसी प्रयोग के दौरान पैâला और वहां से किसी संक्रमित के जरिए वुहान के मांस बाजार में पहुंच गया। जहां से चीनी नववर्ष की लंबी छुट्टी ने उसे आम शहरियों तक पहुंचा दिया। अंत में उन आम शहरियों ने उसे दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाया। इसलिए अहम मुद्दा ये है कि इस दौरान यदि चीन ने सख्ती बरती होती तो वायरस वहीं तक सीमित रखा जा सकता था। हालांकि ऐसा करने के लिए सरकार को उसकी उत्पत्ति और घातकता की सही-सही जानकारी सार्वजनिक करनी पड़ती। जो कि उसकी बदनामी का सबब बन सकती थी। लिहाजा, चीन ने ऐसा नहीं किया। शुरुआत में तो वो खुद ही मामले को दबाता रहा, परंतु जब मामला हाथ से निकलने लगा तो उसने डब्ल्यूएचओ को मोहरा बनाकर कुछ समय खरीद लिया। नतीजे में जिस तरह स्पेनिश फ्लू परिवहन के जरिए दुनिया भर में पहुंचा था, उसी तरह वुहान वायरस भी दुनिया भर में पैर पसारता चला गया। क्या चीन की यही संदिग्धता वायरस को ‘वुहान’ नाम देने के लिए पर्याप्त नहीं? जब स्पेन को बिना जुर्म के कलंकित किया गया तो फिर वायरस जानबूझकर पैदा करनेवाले पर नरमी क्यों?

क्योंकि नाम में ही सब कुछ है…
आदिकाल से ही व्यक्ति, वस्तु, स्थान, पदार्थ, देश इत्यादि को जानने और सरलता से पहचानने के लिए उनका नामकरण किया जाता रहा है। नाम किसी की भौतिक और भौगोलिक पहचान के साथ-साथ उसके आंतरिक व व्यापारिक गुणों का वर्णन भी होता है, उसका सार होता है। इसलिए हर एक सभ्यता में, चाहे वह प्रागैतिहासिक हो या अति-आधुनिक, नामकरण का विशेष महत्व है। जीवित-निर्जीव, भौतिक-भौगोलिक, दृश्य-अदृश्य, साकार-निराकार सभी का कुछ-न-कुछ नाम तो है ही और वह नाम उसे उसकी भौतिक, भौगोलिक, आंतरिक व व्यवहारिक पहचान के नाते ही मिला है। विज्ञान की दुनिया में भी नामकरण का यही महत्वपूर्ण आधार है। जब वैज्ञानिक किसी बीमारी का नाम रखते हैं या किसी वायरस को नाम देते हैं तो बड़ी सावधानी बरतते हैं। उसे एक ऐसा नाम देते हैं, जिससे वह न सिर्फ सरलता से पहचाना जा सके, बल्कि उसके तत्व व सत्व को भी आसानी से जाना जा सके। इसीलिए उसकी पहचान को उसकी भौगोलिक उत्पत्ति से संदर्भित किया जाता है। यही परंपरा भी है और विज्ञान की जरूरत भी। आज तक तमाम वायरसों तथा बीमारियों के नाम उनकी उत्पत्ति से जोड़कर ही रखे गए हैं। तब सवाल यह है कि फिर ‘सार्स सीओवी-२’ का नाम ‘वुहान’ की बजाय ‘कोविड-१९’ क्यों? क्यों इस महामारी के लिए जिम्मेदार एक वायरस का नाम मानकों पर खरा नहीं उतरता? जबकि चीन के खिलाफ तो प्रथमदृष्टा ही पुख्ता प्रमाण मिल भी रहे हैं, वुहान वायरस की कृत्रिम उत्पत्ति के। इस पैमाने पर पहले दुनिया कभी किसी ‘कृत्रिम’ वायरस की चपेट में नहीं आई थी। जब यह विध्वंस के मंसूबे के तहत ही बनाया प्रतीत होता है, तब इसका नाम वुहान क्यों नहीं? बात का निचोड़ यही कि यदि अतीत के तमाम नामकरण सही थे तो आज का ‘वुहान’ नाम भी सही है और यदि आज का यह नाम गलत है तो तब के वे तमाम नाम भी गलत हैं। इसलिए सबसे पहले डब्ल्यूएचओ आगे बढ़े और इस भारी चूक को खुले मन से स्वीकार करे और इस गलती के लिए सार्वजनिक तौर पर माफी भी मांगे। है तैयारी ऐसा करने की? नहीं न! तो फिर चुपचाप चीन को परंपरागत नामकरण विधी से अवगत कराए और समझा दे कि उसे ऐतिहासिक व भौगोलिक दृष्टिकोण से इस वायरस का नाम वुहान ही उपयुक्त है। नाम बच्चे का हो या वायरस का, तार्किक भी होना चाहिए। जिसका नामाक्षर या नामांक सही नहीं होता वह परेशानी का ही सबब होता है। यह शास्त्रों में भी कहा गया है। इसलिए ‘कोराना’ का नाम ‘वुहान वायरस’ से उपयुक्त कोई हो ही नहीं सकता। बल्कि इसमें चीनी सरकार की संदिग्ध व धूर्तता वाली ‘जैनेटिक’ भूमिका के मद्देनजर तो इसे ‘चाइनीस वायरस’ ही कहा जाना चाहिए। मानव जाति को नुकसान पहुंचाने के मकसद से कृत्रिम रूप से तैयार किए गए इस वायरस के लिए इससे बेहतर नाम भला हो भी क्या सकता है? उस पर जब कोरोना नाम के आगे ही नॉवेल लगता है तो मामला खुद ही शीशे की तरह साफ भी हो जाता है कि ये अपने आप में अनोखा है जो आज से पहले कभी कहीं नहीं पाया गया। मतलब, ये जीव व जेनेटिक से नहीं, बल्कि किसी प्रयोगशाला में नाजायज तरीके से बना है… और वो प्रयोगशाला निश्चित रूप से चीन के वुहान शहर की वही प्रयोगशाला है, जो इन दिनों वायरस पैâलाने के लिए कुख्यात है। इसीलिए दुनिया इस ‘नॉवेल’ (अनोखे) वायरस से होनेवाली बीमारी को भी ‘कोविड-१९’ नहीं कह सकती। पारंपरिक प्रथा के आधार पर वो उसे ‘वुहान डिजीज’ ही कहेगी।

अंत में एक बात और। भले ही लैटिन में कोराना का एक अर्थ ‘क्राउन’ या ‘ताज’ भी होता होगा पर ये चीनी मंसूबों का क्राउन होगा, मानव जाति के लिए तो यह महामारी ही है। इसलिए इसका नाम भी उसी के अनुकूल होना चाहिए। नाम नकारात्मक न सही पर तथ्यात्मक तो जरूर होना चाहिए। खासकर नाम में किसी पराक्रम का आभास तो कतई नहीं होना चाहिए। लिहाजा, इस वायरस का नाम उसकी भौतिक और भौगोलिक पहचान के अनुरूप वुहान से ही जुड़ना चाहिए? उसे पैदा करनेवाले शातिर देश से ही जुड़ा होना चाहिए? समग्रता में कहें तो उस देश पर ही होना चाहिए। इसे चीनी या चाइनीस वायरस ही कहा जाना चाहिए क्योंकि नाम में ही सब कुछ है… वुहान में ही सब कुछ है। (समाप्त)
(सूचना: नियमित स्तंभ `अर्थार्थ’ का प्रकाशन शनिवार को होगा।)