महाराष्ट्र के प्रति पूर्वाग्रह न पालें! परिणाम यही कहता है!

वर्ष २०१४ में भाजपा का अश्व उद्धव ठाकरे ने रोक दिया था। वर्ष २०१९ में इसे शरद पवार ने रोका, यह सत्य है। महाराष्ट्र में ‘युति’ को कामचलाऊ बहुमत मिला लेकिन कांग्रेस-राष्ट्रवादी जैसा मजबूत विपक्ष भी सामने खड़ा कर दिया है। राजनीति में कौन किसे खत्म करे, इस सवाल का निर्णय हो चुका है।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का परिणाम घोषित हो चुका है। चुनाव परिणाम का अर्थ क्या लगाना है ये जो जैसा सोचे वैसा तय करे। लेकिन सभी राजनैतिक दल दिवाली मना सकें, ऐसा जनादेश जनता ने दिया है। दिवाली से पहले जीत के पटाखे कौन जलाएगा इसे लेकर प्रचार सभाओं में गोलियां चलाई गर्इं। सत्ताधारी की हैसियत से शिवसेना-भाजपा की युति और विपक्ष के रूप में कांग्रेस-राष्ट्रवादी आघाड़ी ऐसी दोनों ही पार्टियां जीत के पटाखे जला सकें, ऐसा परिणाम आया है। ऐन दिवाली के मौके पर एक भी नरकासुर का वध नहीं हुआ। चारों पार्टियां नरसिंह अवतार में प्रकट हुईं। कई लोगों के गढ़ धराशायी हो गए। प्रमुख नेता परास्त हुए। रेस के घोड़े पिछड़ गए। लंगड़े घोड़े कई जगह रेस जीत गए। उस पर सत्ता स्थापित करने के लिए क्या किया जाएगा इस पर ‘सट्टा’ लगाया जा रहा है। परंतु निश्चित तौर पर सत्ता कौन स्थापित करेगा ये तय नहीं हुआ है। पहले एक ही दिन लक्ष्मी पूजन होता था। अब चुनाव आए तो ‘लक्ष्मी पूजन’ तय हो जाता है और लोगों को राजनीतिज्ञों ने यह आदत लगाई है। फिर भी महाराष्ट्र में सत्ताधारियों द्वारा किए गए लक्ष्मी पूजन का बड़ा फायदा नहीं हुआ और कुल मिलाकर २० से २५ विरोधी दलों के विधायक निर्वाचित नहीं होंगे, ऐसा दृश्य जिन्होंने प्रसार माध्यमों में तैयार किया उनका अनुमान गलत सिद्ध हुआ। कांग्रेस और राष्ट्रवादी इन दो प्रमुख पार्टियों ने मिलकर ही १०० की सीमा पार कर ली। इसका पूरा श्रेय अकेले शरद पवार को जाता है। बीते कुछ दिनों में शरद पवार के जुझारूपन के संबंध में काफी कुछ प्रकाशित हुआ। वर्ष २०१४ में भारतीय जनता पार्टी के अश्व को रोकने का काम उद्धव ठाकरे ने किया था। वर्ष २०१९ में ये काम शरद पवार ने किया। ये महाराष्ट्र की विशेषता है।
परिणाम अच्छे हैं फिर भी भ्रम है
महाराष्ट्र का परिणाम वैसे तो स्पष्ट है। भाजपा ने १०६ और शिवसेना ने ५६ जगह जीत हासिल की है। यह स्पष्ट बहुमत है, परंतु ‘युति’ होने के बावजूद भी दोनों पार्टियों को प्रचंड सफलता नहीं मिली। वर्ष २०१४ में स्वतंत्र रूप से लड़कर भाजपा ने १२२ और शिवसेना ने ६३ सीटें जीती थीं। मजबूत सत्ता, प्रचंड धनशक्ति को टक्कर देते हुए शिवसेना ने तब ये यश हासिल किया था। इस बार अपने हाथ में सत्ता, युति का समर्थन होने के बाद भी शिवसेना ५६ सीटों पर सीमित हो गई। ये ५६ का आंकड़ा तुलनात्मक रूप से कम होगा फिर भी महाराष्ट्र की सत्ता का ‘रिमोट कंट्रोल’ उद्धव ठाकरे के हाथ में आ गया है। महाराष्ट्र में विरोधी पार्टी शेष नहीं रहेगी और महाराष्ट्र से हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी, ऐसा बयान भाजपा के मुख्यमंत्री सहित अन्य नेताओं ने दिया था। महाराष्ट्र की ग्रामीण क्षेत्र की जनता को ये बातें पसंद नहीं आई। उन्होंने एक सशक्त विरोधी दल महाराष्ट्र में तैयार कर दिया। इसका श्रेय राज्य की जनता को देना पड़ेगा।
आयाराम-गयाराम
भारतीय जनता पार्टी मित्र दलों के साथ १६४ सीटों पर चुनाव लड़ी। उसमें से कुल मिलाकर १४४ सीटों पर जीत हासिल करने की उनकी व्यूह रचना थी। शिवसेना को रोकने का और विरोधियों को रौंदते हुए आगे बढ़ने की उनकी योजना को लोगों ने ठुकरा दिया। कांग्रेस-राष्ट्रवादी के दल-बदलुओं को खरीदकर तथा जांच की धौंस दिखाकर चुनकर लाना और इसके लिए आयाराम-गयारामों का जो बाजार सजाया गया, वह शेयर बाजार की तरह धराशायी हो गया। राष्ट्रवादी से भाजपा-शिवसेना में आए ज्यादातर बड़े नेता परास्त हो गए और उन्हें आम कार्यकर्ताओं ने पराजित किया। सातारा के उदयनराजे भोसले को इसके आगे उड़ाने के लिए ‘कॉलर’ भी शेष नहीं रखा। सातारा में उन्हें दयनीय पराजय मिली। जनता तुम्हारी गुलाम नहीं है और तुम खुद ईश्वर के अवतार नहीं हो। शिवराय ने अंत तक खुद को स्वराज्य का सेवक ही कहा। उनके तेरहवें वंशज शिवराय को समझ ही नहीं पाए। यह अंतत: लोगों ने दिखा दिया। ‘हम कुछ भी कर सकते हैं, किसी को भी ‘टोपी’ बदलकर, दल-बदल करके ला सकते हैं’, सातारा की हार इन अनैतिक विचारों की पराजय है। जयदत्त क्षीरसागर, निर्मला गावित, वैभव पिचड, दिलीप सोपल, हर्षवर्धन पाटील ये सभी लोग पार्टी बदलकर हार गए। ‘वॉशिंग मशीन’ मंदी के चक्कर में फंस गई, ऐसी प्रतिक्रिया इस पर उद्धव ठाकरे ने व्यक्त की।
अंकुश चाहिए ही
पूरे परिणाम का विश्लेषण बाद में किया जा सकता है। कामचलाऊ बहुमत युति को और बहुमत पर अंकुश रखनेवाला सशक्त विपक्ष, ऐसा नई विधानसभा का दृश्य है। मुख्यमंत्री कौन, सरकार कैसे और किसकी, इसकी चर्चा बंद है। ये पटाखे दिवाली के बाद ही फूटेंगे। महाराष्ट्र लड़नेवालों तथा संघर्ष करनेवालों के पीछे खड़ा रहता है और संकट के समय लड़नेवालों का साथ देता है, ऐसा बालासाहेब ठाकरे के दौर में देखने को मिला। वर्ष २०१४ में उद्धव ठाकरे और वर्ष २०१९ में शरद पवार के मामले में इसकी पुनरावृत्ति हुई। १०६ सीटें जीतकर भी भाजपा के सिर पर तलवार लटक रही है और श्री फडणवीस के चेहरे पर तनाव है। उन्मादी बर्ताव करनेवाले अंतत: ‘उदयनराजे’ बन जाते हैं और राजा होने के बाद भी फिर प्रजा उन्हें भाव नहीं देती है। शरद पवार ने महाराष्ट्र के लिए क्या किया, ऐसा सवाल पूछा गया। इसका जवाब सातारा सहित महाराष्ट्र की सौ विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में मिला। शिवसेना गिड़गिड़ाते हुए आएगी, ये सपना भी साकार नहीं हुआ। शिवसेना का बाघ हाथ में कमल लेकर दहाड़ रहा है, ऐसा व्यंग्यचित्र प्रकाशित हुआ। यह बोलनेवाला है। महाराष्ट्र का स्वभाव अलग है। पूर्वाग्रह न पालें, यही इस परिणाम का अर्थ है। आगे की आगे देखेंगे।