कभी-कभी : ‘एक प्यार का नगमा है…!’ फर्श से अर्श पर पहुंचानेवाला गीत

‘एक प्यार का नगमा है मौजों की रवानी है, जिंदगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है…!’ गीतकार संतोष आनंद की कलम से निकला फिल्म ‘शोर’ का ये गीत किसी को फर्श से अर्श पर पहुंचा देगा, ये किसी ने सोचा भी नहीं था। १९७२ में बनी इस फिल्म के डायरेक्टर, प्रोड्यूसर और राइटर थे मनोज कुमार। फिल्म में मनोज कुमार का लीड रोल था, उनके अपोजिट थीं नंदा और जया भादुड़ी। संतोष आनंद द्वारा लिखे इस गीत के संगीतकार थे लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, जबकि इस गीत को सुरों से सजाया था लता मंगेशकर और मुकेश ने। फिल्म मकबूल हुई और ये गाना हर गली-मोहल्ले में गूंजने लगा।
दौर बदला। गाना वही था- ‘एक प्यार का नगमा है…’ लेकिन सिचुएशन बदल गई थी। फिल्म का ये गाना कोई फिल्मी हीरोइन या गायिका नहीं बल्कि कोलकाता के रेलवे स्टेशन पर एक महिला भिखारी बड़े ही सधे हुए सुरों में गा रही थी। डिजिटल युग के इस जमाने में किसी व्यक्ति ने उस महिला भिखारी को गाते हुए अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर उसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। पलक झपकते ही ये वीडियो वॉट्सऐप, फेसबुक सहित सोशल मीडिया पर हर जगह गूंजने लगा। अब इसे उस महिला की आवाज का दम कहें या उसके आवाज की कशिश बॉलीवुड ने उस महिला रानू मंडल के लिए रातों-रात अपने दरवाजे खोल दिए। हिमेश रेशमिया ने अपनी आनेवाली फिल्म ‘हैप्पी हार्डी एंड हीर’ में रानू को गीत गाने का ऑफर दे दिया। हिमेश के साथ रानू मंडल ‘तेरी मेरी, तेरी मेरी कहानी…’ गीत रिकॉर्ड भी कर चुकी हैं। इसके साथ ही वे अन्य कई टीवी प्रोग्राम्स में भी हिस्सा ले रही हैं।
खैर, इस गीत ने रानू की बंद किस्मत के साथ ही उनके लिए इंडस्ट्री के बंद दरवाजे भी खोल दिए। अगर किस्मत नहीं खुली तो गीतकार संतोष आनंद की, जिनका जन्म ५ मार्च, १९४० को सिकंदराबाद में हुआ था। ‘मैं ना भूलूंगा मैं ना भूलूंगी…’, ‘तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है…’, ‘मेघा रे मेघा…’, ‘ये गलियां ये चौबारा यहां आना ना दोबारा…’, ‘मोहब्बत है क्या चीज…’, ‘जिंदगी की ना टूटे लड़ी…’, ‘मारा ठुमका बदल गई चाल मितवा…’ जैसे एक से बढ़कर एक सदाबहार गीत लिखनेवाले संतोष आनंद आज गुमनामी के अंधेरों में रहकर अपनी जिंदगी के दिन काटने पर मजबूर हैं। हाल ही में इस गीत के गीतकार संतोष आनंद ने एक कवि सम्मेलन में भाग लिया था। कार्यक्रम की समाप्ति पर जब एक पत्रकार ने उनसे सवाल किया तो उन्होंने उसका जवाब देते हुए कहा कि ‘मुझे दूसरों से पता चला है कि मेरे लिखे गीत को सुनकर हिमेश रेशमिया ने एक महिला को मौका दिया है लेकिन मेरे पास एक सादा स्मार्ट फोन तक नहीं है, जिस पर मैं उस महिला का वीडियो देख सकूं।’
‘पूरब और पश्चिम’, ‘शोर’, ‘रोटी कपड़ा और मकान’, ‘क्रांति’, ‘प्यासा सावन’, ‘प्रेम रोग’ सहित कई फिल्मों के लिए गीत लिखनेवाले संतोष आनंद बेटे और बहू के आत्महत्या करने के बाद बुरी तरह से टूट गए और आज भी वे उस त्रासदी से उबर नहीं पाए। १९९५ में उन्होंने फिल्मों से नाता तोड़ लिया। खुद को एकांत में वैâद कर लेनेवाले संतोष आनंद दोस्तों के आग्रह पर ही अब मुशायरे और कवि सम्मेलनों में भाग लेने लगे हैं। १९७४ में ‘रोटी कपड़ा और मकान’ के गीत ‘मैं ना भूलूंगा…’ और १९८३ में फिल्म ‘प्रेम रोग’ के गीत ‘मुहब्बत है क्या चीज…’ के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का ‘फिल्मफेयर’ अवार्ड और २०१६ में ‘यश भारती’ पुरस्कार जीतनेवाले ७९ वर्षीय संतोष आनंद को उम्र के इस पड़ाव पर आज अपना जीवन-यापन करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है जबकि उनके शरीर के एक-एक अवयव धीरे-धीरे शिथिल पड़ते जा रहे हैं। उम्र की इस दहलीज पर आज संतोष आनंद को भी दरकार है एक ऐसे सहारे और एक ऐसे इंसान की, जो उनके लिए अपने बंद दरवाजे खोल दे…!