" /> व्यंग्य…‘प’ से पेगासस!

व्यंग्य…‘प’ से पेगासस!

आज शाम में चौकी रखी है। अगले शुक्रवार जगराता है। माता रानी ने आखिर सुन ही ली मेरी और मुझे भी वी.आई.पी. बना डाला। जय शेरावाली की। मैंने ‘मन्नत’ मांगी थी (वो वाला बंगला नहीं) माता! अपने इस नालायक बेटे को भी जैसे-तैसे वी.आई.पी. बनवा दो। सो भाइयो-बहनो! पेगासस में अपुन का भी नाम आ गया है। मेरे फोन की भी टैपिंग हो रेली है। सोचो जिसे अपनी कॉलोनी में भी कोई नहीं जानता था। जानता भी था तो भाव नहीं देता था। वह रातोंरात अखिल भारतीय स्तर का वी.आई.पी. बन गया है। मोठे-मोठे मिनिस्टरों और पत्रकारों के साथ मेरा भी नाम बस यूं सोचो चल पड़ा है। अब तो ‘स्काई इज दी लिमिट’। सोच रहा हूं जिसने भी मेरा नाम डाला है क्या सोच के डाला होगा? क्या मैं सत्ता के लिए इतने मायने रखता हूं? यूं तो मैं अपने को विपक्ष लिए भी किसी मतलब का नहीं मानता। वो क्या कहावत है गांव-खेड़े में ‘बिल्ली का… न लीपने का न पोतने का’। फिर सोचता हूं इधर रिटायरमेंट के बाद मैं ज्यादातर अपनी कोठरी में सोता ही रहता हूं। अतः कहीं टैपिंग करनेवालों न हों कहीं मुझे ‘स्लीपर सेल’ वाला समझ लिया होगा। रिश्तेदार यूं तो पहले से ही मुझसे कन्नी काटते थे, मगर अब तो कन्नी ही नहीं काटते खौफ भी खाते हैं। मैं इस उम्र से चाहता भी था। भगवान जब देता है यूं समझो पेगासस जब देता है मोबाइल फाड़ के देता है। जब तक ये पता चले कि वो आर.के. कोई और है तब तक तो ये वी.आई.पी. वाली फीलिंग रहने दो ‘आई लाइक इट’!
थैंक यू पेगासस! इस पगलैट खच्चर को भी पेगासस बना दिया।
– डॉ. रवींद्र कुमार