" /> बोल कि लब ‘आजाद’ हैं तेरे!

बोल कि लब ‘आजाद’ हैं तेरे!

रने, प्रदर्शन और रैलियों के लिए मशहूर आजाद मैदान मुंबई का हाइड पार्क ही नहीं, महात्मा गांधी की विरासत से भी जुड़ा है। यह कितनों को मालूम है कि शहर में यह १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम की एकमात्र यादगार है, जहां एक जुनूनी अंग्रेज पुलिस सुपरिंटेंडेंड ने दो हिंदुस्थानी सिपाहियों को तोप से बांधकर सरेआम गोलों से उड़वा दिया था?

सीएसएमटी स्टेशन के सामने २५ एकड़ में पैâला विशाल मैदान और उस पर आड़ी-टेढ़ी बिछीं २२ पिचें। दुनिया का यह शायद एकमात्र मैदान होगा, जहां एक साथ २२ क्रिकेट मैच होते हैं। क्रिकेट की इस नर्सरी में खेले बिना किसी मुंबइया क्रिकेटर को पूर्ण नहीं माना जाता। यह राज आज तक फाश नहीं हुआ कि यहां फील्डिंग करनेवाली २२ टीमें अपनी गेंदें वैâसे पहचानती हैं और बल्लेबाज अपने शॉट! यहीं एक कोने पर मौजूद बॉम्बे जिमखाना १९३३ में हिंदुस्थान के पहले टेस्ट मैच की भूमि है। यहीं १९८७ में खेले गए मैच में सचिन तेंडुलकर और ‌विनोद कांबली की ६६४ रन की विश्व कीर्तिमान साझीदारी आज तक याद की जाती है।
सीएसएमटी स्टेशन के सामने आजाद मैदान मुंबई का ‘हाइड पार्क’ भी है। रामलीलाओं, इज्तेमा, प्रदर्शनियों और कवि सम्मेलन जैसे आयोजनों के लिए तो विख्यात है ही, अण्णा डांगे, बाबा आम्टे और मेधा पाटकर सरीखे सुनामों से लेकर गुमनाम लोगों द्वारा अधिकारों के लिए तमाम विरोध धरना-प्रदर्शन-अनशनों का भी साक्षी है। आम आदमी के लिए यह शॉर्ट कट है सीएसएमटी से चर्चगेट के बीच का।
कैंप मैदान-जी हां, आजाद मैदान होने से पहले इसका यही नाम था, जहां १८२८ तक फोर्ट क्षेत्र के तमाम मवेशी घास चरने आते थे। अंग्रेजों को जब मनोरंजन की तलब लगी तब वे इंग्लैंड से अपना क्रिकेट मुंबई लाए और कैंप मैदान में उसका स्टंप गाड़ दिया। फिर एक लंबा अरसा यह ‘एस्प्लेनेड क्रॉस’ कहलाता रहा समीप मौजूद एस्प्लेनेड मैदान के नाम पर। यह ‘आजाद’ बना, जब यहां स्वतंत्रता सेनानियों की सभाएं और रैलियां होने लगीं। दिसंबर, १९३१ को यहां जो ऐतिहासिक मजमा जुटा, मुंबई के इतिहास में आज भी उसे विशालतम रैली के रूप में याद किया जाता है, जिसे महात्मा गांधी ने संबोधित किया था और रैली से ठीक पहले जवाहरलाल नेहरू और खान अब्दुल गफ्फार खान को गिरफ्तार कर लिया गया था। गांधी और नेहरू ही नहीं, मौलाना आजाद और वल्लभ भाई पटेल की भी कितनी ही सभाएं यहां हुईं।
फांसी तालाब था करीब
आजाद मैदान ने प्रदर्शन, धरने और रैलियां ही नहीं, बहुत से हंगामे, दंगे और गिरफ्तारियां भी देखीं। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि आजाद मैदान के बिलकुल निकट बाजार गेट के करीब फांसी तालाब (‌गिब्बेट गेट) नाम से प्रसिद्ध बड़ा-सा तालाब था, जहां मिट्टी, सड़े हुए अंडों, जूतों और पत्थरों की बौछार के बीच बेइज्जती करते हुए हत्यारों को सरे-आम फांसी पर लटकाया जाता था। १८५० में तालाब पाट दिया गया। मुंबादेवी का पुराना मंदिर भी कुछ ही फासले पर था, जिसे अंग्रेज गवर्नरों ने १७३७ में मुंबई की किलाबंदी के समय ढहवा दिया।
तोप के मुंह से बांधकर उड़ा दिया
मुंबई में गवर्नर के रूप में लॉर्ड एलफिंस्टन का कार्यकाल था, तब मुंबई के पुलिस सुपारिंटेंडेंट या कमिश्नर के ओहदे पर चार्ल्स फोर्जेट नामक एक गोरा अफसर आया। एलफिंस्टन जितने दयावान, फोर्जेट उतना ही जुल्मी। १८५७ के गदर ने मुंबई में भी रंग दिखाना शुरू कर दिया था। शेयर बाजार धड़ाम से गिर गया। मुंबई की २९ हिंदुस्थानी रेजिमेंटों में से तीन में विद्रोह पैâल गया।
दीवाली का दिन। अंग्रेजों को हर नागरिक पर शुबहा था। कहीं मुंबई भी मेरठ, लखनऊ और दिल्ली की राह न चल पड़े इसलिए भेद लेने के वास्ते फोर्जेट ने रातों में हिंदुस्थानी बाने में भेष बदलकर शहर की गली-मोहल्लों में चक्कर लगाने शुरू कर दिए। हिंदुस्थानी जुबान बोलने और समझने में निपुण फोर्जेट एक दिन काले कपड़ों में वह सोनापुर (मेट्रो सिनेमा के पास) गंगा प्रसाद नामक व्यक्ति के घर आकर छिप गया, जहां क्रांतिकारी अंग्रेज शासन पलटने के लिए जुटे थे। टूटी दीवारों की आड़ से उसने दीवाली की रात अंग्रेज अफसरों पर हमले की योजना सुनी तो आग-बबूला हो गया। फोर्जेट को सबसे अधिक शक शहर में रहनेवाले डेढ़ लाख मुसलमानों पर और छावनियों में टिके हिंदुस्थानी सिपाहियों पर था। उसने सारे बागियों को तुरंत गिरफ्तार कर लिया। नगरसेठ नाना शंकरशेठ छिप न जाते तो वे भी गिरफ्तार कर लिए जाते। गंगा प्रसाद फोर्जेट के दिए इनाम-इकराम के प्रलोभनों में फंस गया और मुखबिर बनकर उसने साथियों के सारे भेद खोल दिए।
१५ अक्टूबर, १८५७। धनतेरस का दिन। फोर्जेट के सिपाही मरीन बटालियन के ड्रिल हवलदार सैयद हुसैन और १०वीं रेजिमेंट के सिपाही मंगल गुदड़िया की मुश्कें कसकर आजाद मैदान में घसीट लाए, उनकी पीठें तोप के मुंह से बांधी और और बहुत निर्ममता से गोलों से उड़ा दिया। यह खौफनाक नजारा देखने के लिए अंग्रेज अफसरों व उनके परिवार बड़ी संख्या में एकत्र थे, साथ में आम जनता के साथ हिंदुस्थानी सिपाही भी, जो जबरन खींचकर यहां लाए गए थे। बहुत सारे लोग गिरफ्तार कर लिए गए या उन्हें जिलाबदर कर दिया गया। कई समुद्री जहाज से काला पानी भी भेजे गए। इनमें बहुतों का आखिर तक पता नहीं चला।
इस घटना की याद दिलाने के ‌लिए छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस के सबवे के ठीक सामने आजाद मैदान की फेंसिंग पर लगा एक मामूली सा प्लिंथ मौजूद है, जिस पर रोज गुजरने वालों की नजरें भी शायद ही जाती हों। इसे हवलदार सैयद हुसैन और मंगल गुदड़िया की इस आहुति की स्मृति में २००७ में देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम की १५०वीं वर्षगांठ पर स्थापित किया गया। मुंबई में देश के स्वतंत्रता संग्राम, यहां तक कि प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध के भी कई स्मारक हैं, पर संभवत: गदर के दिनों का यह एकमात्र यादगार है। न तो किसी मुंबईकर को इसकी याद है, न ही जिम्मेदार लोगों को उन्हें यह याद दिलाने की जरूरत महसूस होती है। ११ अगस्त, २०१२ को एक सभा के दौरान जब आजाद मैदान में दंगा हुआ, तब उपद्रवी भीड़ ने इसे भी क्षतिग्रस्त कर दिया।
फांसी की टिकटियों पर लटकाए स्वतंत्रता सेनानी
फोर्जेट बहुत ही क्रूर अफसर था। उसने अपने कार्यालय के सामने ही टिकटियां खड़ी कर दी थीं, जहां कितने ही लोगों को फांसी पर लटका दिया गया। इनमें ज्यादातर बिल्कुल निर्दोष थे। फोर्जेट नराधम अफसर था। पूरे जीवन काल में उसने शायद ही कोई अच्छा काम किया हो। इनमें एक ही याद आ रहा है। वह है १८६२ में जब मुंबई की किलेबंदी गिराकर फोर्ट की खाइयां पाट दी गर्इं तब टाउन हॉल के ठीक सामने के हिस्से में उद्यान और आस-पास गोलाकार इमारतें बनाकर उसे लॉर्ड एलफिंस्टन सर्कल (नया नाम हॉर्निमन सर्किल) बनाना।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)