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आंखों देखी : ज्योत से ज्योत जगाओ!

हर तीर्थक्षेत्र या संतों के रज से पावन हुई भूमि का अपना-अपना महत्व है। मनुष्य योनि में जन्म लेने के कारण संत गण भी एक दिन अपनी देह का त्याग कर देते हैं लेकिन अपने द्वारा किए सद्कार्यों के कारण उनके गुण सदा अमर रहते हैं। महाराष्ट्र शूरवीरों की भूमि के अलावा संतों की भूमि के रूप में विख्यात है। यहीं हिंदवी स्वराज्य संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे योद्धा जन्मे और इसी पावन धरती पर संत तुकाराम, संत ज्ञानदेव, संत नामदेव भी जन्मे, वहीं गाडगे बाबा और महात्मा फुले जैसे समाज प्रबोधन के अगुआ एक मिसाल बने।
अक्सर ऐसा होता है कि तीर्थक्षेत्रों में पुजारी-पंडों की तूती बोलती है। और बाकी कसर वहां के सेवाधारी (वॉलियंटर) पूरी कर देते हैं। अधिकतर जगहों पर पहले पंडों को पटाओ, फिर पुजारी जी से निवेदन (सेटिंग) करो तब जाकर श्रीविग्रह का दर्शन प्राप्त होता है। लेकिन ये भी तय है कि वहां तक पहुंचने के पहले आप बीसियों बार अकारण ही सेवाधारियों द्वारा हड़काए-धकियाए जाओगे। वहीं थोड़ी असंयमित जनता का भी दोष होता है। ‘मैं ही पहले दर्शन करूं’ वाली भावना में एक-दूसरे से प्रतिद्वंद्विता चलती रहती है। नतीजतन धक्का-मुक्की और फिर सेवाधारियों की ‘सेवा’। भगवान के सामने ही भक्तों का निरादर होता रहता है!
यूं तो मेरा कई तीर्थक्षेत्रों में जाना हुआ है। संतों की नगरी में अक्सर जाना होता ही रहता है लेकिन पिछले दिनों एक ऐसी नगरी का दर्शन लाभ मिला जहां से मैं और मेरे साथी एक ‘ज्योति’ लेकर वापस लौटे। बुलढाणा स्थित शेगांव (जिसे पहले शिवगांव कहा जाता था) की यात्रा हुई। कहने के लिए तो ये केवल धार्मिक यात्रा थी। वहां स्थित गजानन महाराज की समाधि दर्शन के पश्चात कई प्राचीन मंदिरों में दर्शन किया। जैसा कि अमूमन होता है, दर्शन आदि के पश्चात थोड़ी बहुत खरीददारी की और हम लौट आए। लेकिन इस संत भूमि से लौटा हूं तो खाली हाथ नहीं लौटा, कुछ लेकर लौटा हूं।। एक ‘ज्योति’ लेकर लौटा हूं। एक संत संदेश की ‘ज्योति’…!
हर संत ईश्वरीय तत्व से एकरूप होता है और भक्ति से अर्जित शक्ति से वह लोगों में आत्मचिंतन की ‘ज्योत’ जगाता है तथा विभिन्न व विविध प्रकार के जन-जागरण की भी ‘ज्योत’ जगाता है। ऐसे संतों का, अपने ईष्ट का, अपने गुरु का या अपने आदर्श का कम से कम एक गुण हमें आत्मसात करना चाहिए। समाज में जहां जो भी अच्छा हो उसका प्रचार-प्रसार करना चाहिए। जो भी बुरा हो उसे सुधारने का प्रयास करना चाहिए और ये संभव न होने पाए तो उसे नजरअंदाज कर देना चाहिए। शेगांव के गजानन महाराज के अनुयायी इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। प्रतिदिन हजारों लोगों को नि:शुल्क भोजन, बेहद रियायती दरों पर हजारों लोगों के रहने की उत्तम व्यवस्था। और स्वच्छता ऐसी कि कहीं भी एक कण कचरा तक नहीं दिखेगा और न ही पेड़ का एक पत्ता जमीन पर गिरा दिखाई देगा, सेवाधारी नम्र इतने कि अपने सादगीपूर्ण व्यवहार से आपको चिंतन करने को मजबूर कर दें। कुल मिलाकर अप्रतिम व्यवस्थापन!
कुछ उदाहरण देखिए! वहां आनेवाले सभी भक्तों को वहां के सेवाधारी भाईसाहब, बहन जी, ताई, दादा नहीं बल्कि ‘माऊली’ (ईश्वर) के रूप में संबोधित करते हैं। वहां सतत सफाई होती रहती है। सफाई भी ऐसी मानो आप किसी कॉरपोरेट ऑफिस में चल रहे हों। वहां के उपवन अत्यंत नयनारम्य हैं। अन्न-जल और बिजली व्यर्थ न हो, इसका पूरा ध्यान रखा जाता है। धर्म और विज्ञान को परिभाषित करती सैकड़ों पट्टिकाएं आपको जगह-जगह रुक कर पढ़ते रहने को मजबूर कर देती हैं। दर्शन के पश्चात भोजन (महाप्रसाद) मुफ्त है जिसे शहरी भाषा में अनलिमिटेड फूड कहा जाता है। इसी क्रम में मैं चाय की कतार में था। मेरे आगे एक सज्जन थे। उन्होंने ७ चाय का कूपन दिया। सेवाधारी ने ७ कप चाय उनके सामने रख दी। अब उस सज्जन का पारा ही चढ़ गया। वे सेवाधारी पर ही बरस पड़े कि मैं इतने कप एक साथ वैâसे ले जाऊंगा? तुम्हें कुछ बात समझ में नहीं आती क्या? वगैरह-वगैरह! सेवाधारी कुछ नहीं बोला। वह वहां से रसोईघर में गया। वहां से एक ट्रे लाया और नजरें नीची करके खड़ा रहा। वे सज्जन चले गए। फिर मेरी बारी आई। मुझे भी ४ चाय लेनी थी लेकिन मैं अपने एक मित्र को साथ ले गया था। हम दोनों ने दो-दो चाय उठाई। सेवाधारी हमें देखकर मुस्कुराया। हम भी वहां से जाकर अपनी टेबल पर बैठ गए।
ऐसी जगहों पर या कम से कम शेगांव में तो बच्चों को अवश्य ले जाना चाहिए ताकि हमारी भावी पीढ़ी ये समझे कि संयम क्या होता है? व्यवहार क्या है? सेवा धर्म किसे कहते हैं? व्यवस्थापन क्या होता है? स्वच्छता क्या होती है? कम संसाधनों में संतुष्ट वैâसे रहा जाता है? खैर, हम सब मित्रगण एक सद्गुरु की भूमि से लौट आए हैं लेकिन सादगी, स्वच्छता और संयम की ‘ज्योति’ लेकर आए हैं।
‘ज्योत से ज्योत जगाओ, सद्गुरु ज्योत से ज्योत जगाओ। मेरा अंतर तिमिर मिटाओ, सद्गुरु ज्योत से ज्योत जगाओ…!’