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भाषा संस्कृति की संवाहक होती है!

ध्वनि का रूप नहीं होता। संसार रूपों से भरापूरा है। समाज रूप को नाम देता है। नाम शब्द ध्वनि होते हैं। हिंदुस्थानी चिंतन में शब्द को ब्रह्म कहा गया है। प्रत्येक शब्द का अर्थ होता है। प्रत्येक शब्द ध्वनि होता है। ध्वनि के रूप का अर्थ निश्चित हो जाने के बाद शब्द का जन्म होता है। शब्दों के व्यवस्थित प्रयोग से भाषा बनती है। भाषा सामाजिक संपदा है। भाषा सामाजिक सरोकारों का उपकरण है। भाषा समाज गढ़ने का भी माध्यम है। समाज ही भाषा गढ़ता है। भाषा संस्कृति की संवाहक है। शब्द भाषा के घटक हैं। भाषा और शब्द मूल्यवान हैं। वृहदारण्यक उपनिषद में शब्द को ब्रह्म कहा गया है। ऐतरेय उपनिषद् में वाणी के उद्भव का विवरण है। शब्द की क्षमता विराट है। पुराणों के अनुसार ईश्वर को भी शब्द से प्राप्त किया जा सकता है। वैदिक स्तुतियां शब्द ही हैं। वेद के अनुसार प्रारंभ में शब्द ही था। भाषा मनुष्य द्वारा रचित सबसे बड़ी संपदा है। भाषा से इतिहास है, भाषा से संस्कृति है, भाषा से प्रीति है और भाषा से सभ्यता। हिंदी हिंदुस्थान की स्वाभाविक प्रीति है। राष्ट्र हिंदी में व्यक्त होता है, हिंदी में दुखी होता है और हिंदी में ही आनंदित। हिंदी हिंदुस्थान की राजभाषा है। लेकिन दुर्भाग्य से हिंदी को वह स्थान नहीं मिला, जिसका उसे अधिकार है। यहां अंग्रेजी का आकर्षण है।
अंग्रेजी के वर्चस्व और आकर्षण से आहत महात्मा गांधी ने लिखा था पृथ्वी पर हिंदुस्थान ही एक ऐसा देश है जहां मां-बाप अपने बच्चों को अपनी मातृभाषा के बजाय अंग्रेजी पढ़ाना पसंद करेंगे। अंग्रेजी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा कहा जाता है, लेकिन हिंदुस्थान में एक प्रतिशत लोग भी अंग्रेजी नहीं जानते। जापान, रूस, चीन आदि देशों में अंग्रेजी की कोई हैसियत नहीं है। हिंदुस्थान के बाहर अमेरिका, पाकिस्तान, नेपाल, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, प्रâांस, जर्मनी, सऊदी अरब, रूस आदि देशों में लाखों हिंदी भाषी हैं। एशिया महाद्वीप के ४८ देशों में ही हिंदुस्थान छोड़ किसी भी देश की मुख्य भाषा अंग्रेजी नहीं है। अजरवैजान की भाषा अजेरी और तुर्की, अरमेनिया की अरमेनियम, इजराइल की हिब्रू, ईरान की फारसी, सऊदी अरब, सीरिया, जार्डन, यमन, बहरीन, कुवैत की भाषा अरबी है। चीन, ताइवान, सिंगापुर की मंदारिन दोनों कोरिया की कोरियाई, लंका की सिंहली है।
भारतीय संविधान सभा में राजभाषा पर लंबी बहस चली थी। पंडित नेहरू ने कहा था हमने अंग्रेजी इस कारण स्वीकार की कि वह विजेता की भाषा थी। अंग्रेजी चाहे कितनी ही अच्छी हो, किंतु उसे हम सहन नहीं कर सकते।‘ बेशक अंग्रेजी विजेता की भाषा थी। १९४७ के बाद हिंदी भी विजेता की भाषा है। अंग्रेज जीते। अंग्रेजी लाए। हम हिंदुस्थान के लोग स्वाधीनता संग्राम जीते लेकिन अपनी मातृभाषा को प्रतिष्ठित नहीं कर पाए। प्रभु वर्ग के मन वचन में अंग्रेजी का आकर्षण बढ़ा। गांधी जी ने कहा था कि अंग्रेजी ने हिंदुस्थानी राजनीतिज्ञों के मन में घर कर लिया है। मैं इस बात को अपने देश और मानवता के प्रति अपराध मानता हूं।’ गांधी जी ने बीबीसी पर कहा, दुनिया वालों को बता दो, गांधी जी अंग्रेजी नहीं जानते। अमेरिकी भाषा वैज्ञानिक ब्लूम फील्ड ने ‘लैंगवेज‘ में लिखा था कि यार्कशायर के व्यक्ति की अंग्रेजी को अमेरिकी नहीं समझ पाते। भाषाविद चिंतक डॉ. रामविलास शर्मा ने भाषा और समाज में लिखा है कि अंग्रेजी के हिंदुस्थानी प्रोफेसरों को हॉलीवुड की फिल्म दिखाइए। पूछिए कि वे कितना समझे। व्याकरण, लिपि और शब्द ध्वनि की भिन्नता के कारण अंग्रेजी बोलने के अनेक ढंग हैं। लेकिन हिंदी सुबोध है।
भाषा संस्कृति की संवाहक होती है। गांधी जी ने लखनऊ में अखिल भारतीय भाषा सम्मेलन में कहा कि मेरी हिंदी टूटी-फूटी है, मैं टूटी-फूटी हिंदी ही बोलता हूं। अंग्रेजी बोलने में मुझे पाप लगता है। संविधान सभा में सेठ गोविंददास ने हिंदी का पक्ष रखा। आर.बी. धुलेकर ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बताया। मैं कहता हूं कि वह राजभाषा है। राष्ट्रभाषा भी। अंग्रेजी की टक्कर हिंदी से थी, हिंदी की टक्कर हिंदुस्थानी भाषाओं से नहीं है। राष्ट्र जीवन की सभी गतिविधियों में न्यायपालिका की उपस्थिति है। न्याय किसी भी समाज का उच्चतम क्षेत्र होता है। व्यथित वादी देश की किसी भी भाषा में अपना अभ्यावेदन दे सकते हैं। यह अधिकार संविधान ने दिया है। न्यायालय कार्यवाही की भाषा मातृभाषा ही होनी चाहिए। इससे वादी व प्रतिवादी अपना पक्ष आसानी से समझ जाते हैं। न्यायालय की कार्यवाही उनकी समझ में आसानी से आती है। अंग्रेजी की न्यायिक कार्यवाही वादी-प्रतिवादी नहीं समझ सकते। न्यायालयों में मातृभाषा का चलन जरूरी है।
इंग्लैंड में पहले पार्लियामेंट नहीं थी। सन् १३०० तक विधि और प्रशासन की भाषा लैटिन थी फिर प्रâेंच भाषा का प्रयोग होने लगा। एडवर्ड तृतीय के समय लोग अपना प्रतिवेदन अंग्रेजी में देते थे, लेकिन अधिनियम लैटिन या प्रâेंच में ही बनते थे। धीरे-धीरे अंग्रेजी ने प्रâेंच और लैटिन को विस्थापित किया। ब्रिटेन में भी न्यायपालिका के क्षेत्र में अंग्रेजी को काफी संघर्ष करना पड़ा। क्रामवेल के समय मांग उठी कि विधि और न्याय के क्षेत्र में अंग्रेजी भाषा का ही प्रयोग हो। सन् १६५० में तय हुआ कि न्यायालयों की भाषा अंग्रेजी हो। ब्रिटेन में भी अंग्रेजी भाषा के न्यायालयों में प्रवेश के लिए काफी संघर्ष चला था। हिंदी भाषा के लिए हम सबके प्रयास भी वैसे ही हैं। संविधान के अनुसार जब तक संसद विधि द्वारा उपबंध न करे तब तक उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में तथा विधेयकों, अधिनियमों की भाषा अंग्रेजी रहेगी। अनुच्छेद-३४८ के अनुसार उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय, संसद के सदन व राज्य विधानमंडल के सदन में स्थापित विधेयक के अधिकृत पाठ राष्ट्रपति व राज्यपाल के अध्यादेश अंग्रेजी में होंगे।
अनुच्छेद-३४८ के खंड-२ में कहा गया है कि ‘खंड-१ के खंड-क में किसी बात के होते हुए भी किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उस उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों में, जिसका मुख्य स्थान उस राज्य में है हिंदी भाषा का या उस राज्य के शासकीय प्रयोजनाओं के लिए प्रयोग होनेवाली किसी अन्य भाषा का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा।‘ इसलिए उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी के बजाय हिंदी या किसी क्षेत्र विशेष में बोलनेवाली भाषा का उपयोग संविधान सम्मत है। यही समय की मांग है।
(लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)