" /> सुशांत पर तमाशा मीडिया को तमाचा, न्यूयॉर्क टाइम्स ने उठाया किसान आत्महत्या का मसला

सुशांत पर तमाशा मीडिया को तमाचा, न्यूयॉर्क टाइम्स ने उठाया किसान आत्महत्या का मसला

बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की जब से मौत हुई है, कुछ मीडिया हाउस व चैनलों को मानो एक तमाशा मिल गया है। देश की तमाम ज्वलंत समस्याएं उनके लिए कोई मायने नहीं रख रहीं। वे दिन-रात बस एक खबर को रबड़ की तरह खींचे जा रहे हैं। मगर सुशांत पर ३ महीने से अशांत देश के कुछ चैनलों को अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने आईना दिखा दिया है। ऐसे मीडिया को तमाचा लगाते हुए ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने हिंदुस्थान में होनेवाले किसानों की आत्महत्या का मुद्दा उठाया है। अपने ८ सितंबर के अंक में अखबार ने हिंदुस्थान के अन्नदाताओं की दुर्दशा की खबर प्रकाशित की है।
‘न्यूयार्क टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार कोरोना वायरस महामारी में किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। इसके चलते उनकी आर्थिक दशा बुरी तरह प्रभावित हुई है और इस कारण कई किसानों ने आत्महत्या भी कर ली है। पंजाब के सिरसीवाला में रणधीर सिंह नाम के किसान ने खुदकुशी कर ली। कपास का उत्पादन करने वाले इस किसान की दशा बहुत खराब हो गई थी। उनके २२ साल के बेटे रशपाल सिंह ने कहा कि लॉकडाउन ने मेरे पिता की जान ले ली। हमारे पास १ एकड़ जमीन है, जिस में कपास की फसल लगी थी। यह फसल अपनी लागत भी नहीं वसूल पाई। लॉकडाउन के कारण उनका ड्राइवर का जॉब भी चला गया, ऐसे में परिवार की स्थिति बहुत ही ज्यादा खराब हो गई।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विकास रावल कहते हैं कि वर्तमान समस्या इस सरकार की देन है। प्रोफेसर रावल कहते हैं कि उन्हें लगता है कि इस लॉकडाउन के कारण पिछले कुछ महीनों में देश में हजारों लोगों ने आत्महत्या की हैं। किसान स्व. रणधीर सिंह के पुत्र कहते हैं कि जब सरकार ने तीसरी बार लॉकडाउन बढ़ाया तो उन्हें समझ में आ गया कि अब वह जिंदगी में कभी भी अपने कर्ज से मुक्त नहीं हो पाएंगे। वहीं उनकी मां परमजीत कौर का कहना है कि अब कुछ भी पहले जैसा नहीं होगा। हमें अब कौन खिलाएगा? पता नहीं क्या होगा? गौरतलब है कि हिंदुस्थान इस समय दुनिया में सबसे ज्यादा आत्महत्या करने वाले लोगों का देश बन गया है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार २०१९ में १०,२८१ किसान और मजदूरों ने आत्महत्या की थी। वहीं जानकारों का कहना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं बहुत ज्यादा हो सकती है क्योंकि बहुत सारे मामले तो डर के मारे रिपोर्ट भी नहीं किए जाते। इसी तरह ऐसे मामले मीडिया में भी नहीं आ पाते।