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श्श्श्श शांति बनाए रखें!, उलझन सुलझाओ, फिर बोलो!

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने ऐसा कहा है कि महाविकास आघाड़ी सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाना चाहिए। महाराष्ट्र में भाजपा मुख्य विपक्षी पार्टी है। इसलिए इस तरह का आक्रामक रुख अपनाना गलत नहीं है। हमें विश्वास है कि हम अपने दम पर राज्य के सभी आगामी चुनाव जीतेंगे, ऐसा श्री नड्डा ने कहा है। यह सही है कि विपक्ष को आक्रामक होना चाहिए और राज्य हित के मुद्दों पर सरकार को घेरना चाहिए। विपक्ष जितना आक्रामक और सतर्क होता है, सरकार का काम उतना ही पारदर्शी होता रहता है। उस हिसाब से महाराष्ट्र में विपक्ष को दिए गए श्री नड्डा के सुझावों का स्वागत किया जाना है। वास्तव में नड्डा को भी ऐसा कहने की जरूरत नहीं थी। विपक्ष ने आक्रमण की तोप तैयार ही रखी थी लेकिन तोपें हमेशा निशाना साधती ही हैं, ऐसा नहीं है। श्री नड्डा एक संयमी नेता हैं। आक्रामकता उनका स्वभाव नहीं है। वे समन्वयवादी संस्कारी नेताओं में से एक हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में चुना है। इसलिए उन्होंने तय किया है कि उन्हें किस रास्ते पर जाना है। भाजपा ने आक्रमण की तोपें सिर्फ महाराष्ट्र में ही चलार्इं, ऐसा नहीं है। मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी उन्होंने तोप सुलगाई है। मध्य प्रदेश की सरकार गिर गई और राजस्थान की सरकार राज्यपाल की बगल में फंसी है। यह बहुमत वाली विरोधियों की सरकार को गिराने के लिए आक्रामकता का एक तरीका है। कहने की जरूरत नहीं है कि महाराष्ट्र में हमले के मार्ग अलग हैं। श्री नड्डा ने अध्ययनशील भाषण भले किया लेकिन उन्होंने सच नहीं बताया। ‘महाविकास आघाड़ी सरकार का गठन स्व-हित के लिए किया गया है और इसका एकमात्र उद्देश्य पैसा कमाना है,’ ऐसा तंज श्री नड्डा ने कसा है। फिलहाल भारतीय जनता पार्टी जिस राजनीति को आगे बढ़ा रही है, उसमें कौन सा परमार्थ छिपा हुआ है! उन्होंने मध्य प्रदेश में संतों-सज्जनों की भीड़ को इकट्ठा करके सरकार को नहीं गिराया है। राजस्थान में भी मंत्रोच्चार करके सरकार को अस्थिर नहीं किया गया है, बल्कि सीधे-सीधे धनबल का उपयोग करके आवश्यक बहुमत खरीदने का प्रयास किया जा रहा है। महाराष्ट्र की आलोचना करने से पहले इस तथ्य को स्वीकार किया जाना चाहिए। अगर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने कोरोना महामारी से बनी स्थिति को बहुत कुशलता से संभाला है, तो हम उनके बयान का खंडन नहीं करते। लेकिन मोदी अच्छा काम कर रहे हैं और जिन राज्यों में विरोधियों की सरकार है, सिर्फ वहीं कोरोना को लेकर भ्रष्टाचार और सारी गड़बड़ है, ऐसा कहना स्वस्थ राजनीति के लक्षण नहीं हैं। यदि राज्य में कोरोना संकट बढ़ा होगा और विफलता मिली होगी तो उस विफलता की जिम्मेदारी देश के नेता अर्थात प्रधानमंत्री पर आती ही है। गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा और कर्नाटक में कोरोना महामारी ने जो राक्षसी विकराल रूप धारण किया है, उसकी पूरी जानकारी हम महाराष्ट्र या दिल्ली के भाजपा कार्यालय में भेजने के लिए तैयार हैं। भाजपा शासित राज्यों में अधिकांश ‘अपने दम पर’ ही (तोड़फोड़ करके) सत्तासीन हैं और इनमें से कई राज्य कोरोना संकट को भगवान भरोसे छोड़कर निश्चिंत हो गए हैं। गुजरात की स्थिति चिंताजनक है, लेकिन उसका राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। हर राज्य में जनहानि न होने देना एक कर्तव्य है और केंद्र को इस मामले में मदद का हाथ आगे बढ़ाना चाहिए। शासक और राजा को इस मामले में दिलदारी दिखानी चाहिए। तभी वह राजा के रूप में अच्छा लगता है। महाराष्ट्र जैसे राज्य में मन के मुताबिक राजनीति नहीं हुई तो राज्य के अस्तित्व पर ही कीचड़ फेंकना अच्छा विचार नहीं है! नड्डा कहते हैं, ”हम अपने दम पर सत्ता में आएंगे। आक्रामक बनो!’ उसी समय, देवेंद्र फडणवीस कड़े शब्दों में कहते हैं, ‘ठाकरे सरकार का अस्तित्व ही नहीं है।’ इस बीच प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत पाटील ने नड्डा के बयानों से अलग एक बच्चों जैसा वक्तव्य दिया है। उन्होंने कहा, ‘आज भी हम राज्य के हित के लिए शिवसेना के साथ आने के लिए तैयार हैं।’ अब ये राज्य का हित वास्तव में क्या है? भाजपा को मुख्यमंत्री का पद मिलने पर ही राज्य का हित होगा, अन्यथा नहीं। दूसरी बात ये कि फडणवीस और नड्डा जैसे लोग शिवसेना को स्वार्थी और विफल बता रहे हैं। तो आप शिवसेना के साथ कैसे जाएंगे और राज्य का हित कैसे करेंगे? पाटील को यह स्वीकार करना चाहिए कि राज्य में वर्तमान व्यवस्था शिवसेना के मुख्यमंत्री के नेतृत्व में है और यह व्यवस्था राज्य के हित में है! भाजपा से गलबहियां करने पर ही राज्य का हित होगा, उन्हें इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए। कुल मिलाकर ये दिख रहा है कि भाजपा की अंतर्गत वैचारिक उलझनों को हल किए बिना पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के विचारों को अमल में लाना मुश्किल है। प्रयास करके, जबरदस्ती करके और खरीद-फरोख्त का बाजार लगाकर भी किसी सरकार को गिराया न जा सके तो मन इस प्रकार विचलित होता है। ऐसा होता दिख भी रहा है। विपक्ष को आक्रामक होना चाहिए, लेकिन स्व-निर्मित उलझनों में फंसकर चिल्लाना नहीं चाहिए। श्री नड्डा एक संवेदनशील नेता हैं। उन्हें ऐसा शोर पसंद नहीं। श्श्श्श शांति बनाए रखें! हमले में समय है।