" /> सोनू सूद अकेले असली!

सोनू सूद अकेले असली!

‘लॉकडाउन’ के दौरान अचानक सोनू सूद नामक एक नया महात्मा तैयार हो गया। इतने झटके से और चतुराई के साथ किसी को महात्मा बनाया जा सकता है? कहा जा रहा है कि सूद ने लाखों प्रवासी मजदूरों को दूसरे राज्यों में स्थित उनके घर पहुंचाया। अर्थात केंद्र और राज्य सरकार ने कुछ भी नहीं किया। इस कार्य के लिए महाराष्ट्र के राज्यपाल ने महात्मा सूद को शाबासी दी।

महाराष्ट्र में सामाजिक आंदोलनों की विस्तृत परंपरा रही है। महात्मा ज्योतिबा फुले से बाबा आमटे तक। इन नामों में अब एक और महान सामाजिक कार्यकर्ता का नाम जोड़ना पड़ेगा अर्थात सोनू सूद। लॉकडाउन के दौर में सोनू सूद ने जो किया वह बहुधा केंद्र व राज्य सरकार से भी नहीं हो सका। सोनू सूद हिंदी फिल्मों में खलनायक की भूमिका निभानेवाला एक कलाकार है। हाल के दौर में वह पर्दे पर दिखा था लेकिन लॉकडाउन के दौर में बीते १५ दिनों से वह पसीने ही बहा रहा है। गर्मी व धूप में सड़कों पर घूमते दिखा। उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, दिल्ली जाने का प्रयास कर रहे लाखों मजदूरों के लिए सोनू सूद किसी देवदूत की तरह प्रकट हुआ। उसने हजारों प्रवासी मजदूरों को ठेठ उनके घरों तक सुरक्षित पहुंचाया। गांव जा रहे प्रवासी मजदूरों को कृतार्थ भाव से विदा करते सोनू की तस्वीरें और वीडियो प्रसारित हुई। सरकार मजदूरों को पहुंचाने में नाकाम रही लेकिन सोनू सूद जैसा नया महात्मा कितनी सहजता के साथ मजदूरों की मदद कर रहा है, ऐसा प्रचार सोशल मीडिया में शुरू हो गया।

सोनू सूद द्वारा किए गए कार्य की महाराष्ट्र के राज्यपाल को सराहना करनी पड़ी और सोनू को राजभवन से चाय पीने का निमंत्रण आ गया। यह सोनू प्रकरण निश्चित तौर पर क्या है?

ये कैसे हुआ?
सोनू सूद ने विगत कुछ दिनों में हजारों मजदूरों को उनके राज्य वापस भेजा। रेलवे, बसों, हवाई जहाज के टिकट उन्होंने निकाले। प्रवासियों का इंतजाम उसने किया। एक चैरिटी ट्रस्ट के माध्यम से यह सब किया गया। ट्रस्ट के माध्यम से एकत्रित हुए पैसे से मजदूरों का प्रवास खर्च उठाया गया, ऐसा कहा गया। केरल के एर्नाकुलम में ओडिशा की १७७ लड़कियां फंसी थीं, उन्हें सूद महोदय ने एक खास विमान से भुवनेश्वर पहुंचाया। विमान का इंतजाम नहीं हो रहा था, तब बंगलुरु से खास विमान कोच्चि लाया गया और वहां से सभी लड़कियों को ओडिशा के लिए रवाना किया गया। इसके लिए ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने सोनू सूद और उनकी कंपनी का आभार माना है। किसी राजनैतिक, सरकारी या प्रशासनिक तंत्र के सहयोग के बिना सोनू सूद यह सब कर सकता है क्या? इस अवस्था में राज्यों की सरकारें बेबस हो गर्इं, ऐसा मैने देखा है। मजदूर पैदल ही निकल पड़े और लाखों प्रवासी मजदूर यूपी-बिहार के बॉर्डर पर जाकर फंस गए। वहां उन्हें पानी की एक बूंद भी नहीं मिल रही थी। सोनू सूद उन भूख से व्याकुल लोगों की भीड़ में नहीं पहुंचा। ये लाखों लोग वहां पहुंचे तो क्या सिर्फ सोनू सूद द्वारा खास प्रबंध की गई बसों, रेलवे द्वारा? वे अपने परिवार का बोझ ढोते हुए पैदल ही निकले थे। उनके खाने-पीने की व्यवस्था जिस तरह से महाराष्ट्र सरकार ने की थी, वैसा अन्य राज्यों में नहीं दिखा। केंद्र सरकार ने तो इन मजदूरों को भाग्य के भरोसे छोड़ दिया। मजदूरों के लिए उनके गांव जाने की व्यवस्था हो, इसके लिए महाराष्ट्र सरकार ने एक खास कक्ष तैयार किया लेकिन किसी को मुंबई से उत्तर प्रदेश जाना होगा तो अपने मोबाइल नंबर सहित एक संदेश भेजो, सोनू सूद तुम्हें घर पहुंचाएगा, ऐसा प्रचार योजनाबद्ध तरीके से किया गया। उस प्रचार के लिए भावी राजनीतिक तंत्र को काम पर लगाया गया। सरकार मजदूरों के लिए कुछ कर नहीं रही है लेकिन सोनू सूद कर रहा है। ये दिखाने का प्रयास किया गया।

चेहरा किसका?
सोनू सूद का चेहरा आगे करके महाराष्ट्र के कुछ राजनीतिक तत्व ‘ठाकरे सरकार’ को नाकाम सिद्ध करने का प्रयास कर रहे थे। सोनू सूद कोई महाबली, बाहुबली अथवा ‘सुपरहीरो’ है, ऐसा दृश्य तैयार करने में राजनीतिक दल कुछ हद तक सफल हुए। भारतीय जनता पार्टी के कुछ लोगों ने सोनू को दत्तक लिया। (ये दत्तक लेने की क्रिया गुप्त रूप से की गई।) उसे आगे करके प्रवासी उत्तर भारतीय मजदूरों में घुसने का प्रयास किया गया। सोनू सूद एक अभिनेता है। पैसा लेकर जो चाहे वह समाज में बोलना व अभिनय करना, यह उसका पेशा है। कुछ साल पहले कोबरा पोस्ट के एक स्टिंग ऑपरेशन में सोनू सूद के ऐसे ही एक व्यवहार का भंडाफोड़ हुआ था। सोशल मीडिया में इंस्टाग्राम, ट्विटर अकाउंट पर गुप्त ढंग से भाजपा के कार्यों का गुणगान करने की बात उसने स्वीकार की थी और इसके बदले उसने नजराने के रूप में महीने में डेढ़ करोड़ की मांग की थी। भारतीय जनता पार्टी का नेता बनकर सोनू से मिलनेवाले कोबरा पोस्ट के संवाददाता से उसकी लेन-देन की बातें झकझोरने वाली हैं। पैसा मिलने पर किसी का भी मुखौटा लगाकर घूमना व प्रचार करना, यह सूद जैसे कई लोगों का धंधा है। इसलिए प्रवासी मजदूरों का दुख वगैरह देखकर सूद महाशय भावनाविवश हो गए। उनके अंदर इंसानियत की ज्योति धधकने लगी, इस पर कोई सयाना विश्वास करने को तैयार नहीं है। कोरोना काल में भाजपा अस्तित्व के लिए लड़ रही थी। ठाकरे सरकार की सतत की जा रही आलोचनाओं के कारण भाजपा लोगों के मन से उतर गई। मजदूरों की दुर्दशा पर देश में मोदी सरकार के खिलाफ असंतोष भड़क उठा तो महाराष्ट्र में भाजपा ने ठाकरे सरकार को आरोपी के पिंजरे में खड़ा कर दिया। इसी उलझन में भाजपा ने सोनू सूद को महान समाज सेवक का मुखौटा पहनाकर प्यादे के रूप में इस्तेमाल किया है क्या?

निश्चित तौर पर तंत्र किसका है?
सोनू सूद के पास ऐसा कौन-सा तंत्र है, जिससे वह हजारों मजदूरों को ‘घर भेजने’ की व्यवस्था कर सकता है? इस पूरे तंत्र का कर्ता-धर्ता शंकर पवार है। वह राष्ट्रीय बंजारा सेवा संघ का अध्यक्ष है। तो यह सिर्फ एक चेहरा है। भीड़वाले सोनू के पीछे शंकर पवार खड़े रहते हैं, ऐसा कई तस्वीरों में नजर आ रहा है। सोनू सूद को महाराष्ट्र के राज्यपाल ने खासतौर पर राजभवन बुला लिया और उसके द्वारा किए जा रहे मददकार्यों की जानकारी ली। सोनू सूद राजभवन में जाकर राज्यपाल से मिला और प्रवासी मजदूरों का कष्ट उन्हें बताया। इस पर राज्यपाल भी भावुक हो गए। राज्यपाल ने सोनू सूद को आशीर्वाद दिया और बोले, ‘सोनू जी, आप महान कार्य कर रहे हैं, इसकी जितनी सराहना की जाए कम ही है। राजभवन से आपको जो मदद चाहिए, वो मिलेगी।’ महाराष्ट्र की कई सामाजिक संस्थाएं, व्यक्ति, पुलिस, मनपा कर्मचारी, डॉक्टर, नर्सेज, बैंक कर्मचारी विगत ३ महीनों से जी-जान से कोरोना से लड़ रहे हैं। मजदूरों के खाने-पीने की व्यवस्था मुंबई महानगरपालिका व अन्य कई सामाजिक संस्थाएं कर रही हैं। उन सभी की सूची राज्य के मुख्य सचिव अजोय मेहता को राजभवन प्रशासन को भेजनी चाहिए। ये सभी गुमनामी में रह गए क्योंकि वे सेवाभाव से काम करते रहे। वे सोशल मीडिया में चमके नहीं और राजनीतिक पार्टियों द्वारा नियुक्त ‘प्रचार’ कंपनियां उनके कार्य का प्रचार करने के लिए आगे नहीं आईं।

पूरा ही गोलमाल है
मैंने ऐसा पढ़ा है कि सोनू प्रतिदिन मुंबई में फंसे हुए हजार-बारह सौ मजदूरों को उनके घर बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बंगाल, मध्य प्रदेश बस द्वारा पहुंचाता है। उनमें से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने मजदूरों को अभी मत भेजो, ऐसा कहा था। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी महाराज कोरोना मुक्त होने के मेडिकल सर्टिफिकेट के बगैर किसी को भी अपने राज्य में लेने को तैयार नहीं थे, फिर ये मजदूर निश्चित तौर पर पहुंचे कहां? लॉकडाउन काल में नियम के विपरीत इतनी बसों की व्यवस्था कैसी हुई? मानो सोनू सूद एक समानांतर सरकार चला रहा था व उसे जो चाहिए वह सब मिल रहा था। सोनू सूद नामक इस महात्मा का नाम अब प्रधानमंत्री मोदी के किसी ‘मन की बात’ में आएगा। फिर वह दिल्ली में प्रधानमंत्री को मिलने के लिए जाएगा। एक दिन वो भाजपा का स्टार प्रचारक बनकर मुंबई, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार में घूमता दिखेगा। ऐसा करार पहले ही हो गया होगा इसलिए सोनू सूद लॉकडाउन में मालामाल हीरो की तरह चमकता रहा। लॉकडाउन काल में जब अन्य सभी अभिनेता घर में ही बैठे रहे उस दौरान सोनू सूद अभिनय का जलवा बिखेर रहां था। वास्तविक कलाकार को पर्दे की ही जरूरत पड़ती है ऐसा नहीं है, यह ‘महात्मा’ सूद ने दिखा दिया।

सोनू सूद एक बेहतरीन अभिनेता है ही उसके मन में सामाजिक कार्यों के प्रति दिलचस्पी भी होगी। उसने सड़क पर उतरकर जो कार्य किया, फिर भले ही वह ‘प्रायोजित’ होगा लेकिन देशभर की जनता ने उसे देखा है। अन्य कई अभिनेता, क्रिकेट खिलाड़ी भी पीछे नहीं रहे। फिर वह सलमान खान, शाहरुख खान, अक्षय कुमार, सचिन तेंदुलकर आदि होंगे। इन सभी ने कोरोना काल में करोड़ों रुपए की मदद की है। महाराष्ट्र में कई लोगों ने अपने ‘पेंशन’ की रकम, वेतन का चेक इस कार्य के लिए जमा करा दिया। छोटे बच्चों ने जन्मदिन का ‘खर्च’ टालकर उस रकम को मुख्यमंत्री सहायता निधि में जमा करा दिया। इसी पैसे से लाखों मजदूरों के रहने, खाने और आगे की यात्रा की व्यवस्था की गई। उसमें से कई लोगों का ‘दान’ गुप्त ही रह गया क्योंकि ये सभी लोग प्रायोजित नहीं थे। सोनू सूद पर्दे पर और रास्ते पर भी बेहतरीन अभिनय करते हैं क्योंकि पर्दे के पीछे के राजनैतिक निर्देशक उतने ही मंजे हुए होते हैं।
सोनू सूद की अगली राजनीतिक फिल्म कौन-सी होगी?
इसका खुलासा जल्द ही होगा!