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वसंतोत्सव

शीत के आपातकाल को
पंख पसारे पंछियों ने दी चुनौती

प्राची से फूटा उषा-गान
शुरू हुआ रंगोत्सव

अनगिनत रंगों से पट गया सिवान
वन-उपवन, खेत-खलिहान

ओस से नहाई गेहूं की बालियां
मनाने लगीं मदनोत्सव

वनस्पतियों की भाषा में
बतियाने लगी धूप
शांत ऋचाओं से
लद गए गुलमोहर

भिनने लगी हवा में खुमारी
फूलों की मनुहार में जुट गए भौंरे

ताक धिन ताक की थाप पर
थिरकीं आम्र-मंजरियां

देखते ही देखते
मंत्रजाप में मग्न हो गई कोयल

पवित्र दूब की अंगड़ाई ने
तितलियों से पूछा हाल

धरती का निर्दोष हास
कैसा संतुलन!
कितना उल्लास!

हे परमात्मा!
बचा लेना ऋतु-चक्र
अनंत काल तक मनाता रहे मानव
इसी तरह वसंतोत्सव।
-जीतेंद्र पांडेय