" /> जेंडर ये तय नहीं करे… -स्वरा भास्कर

जेंडर ये तय नहीं करे… -स्वरा भास्कर

स्वरा भास्कर को ‘दबंग गर्ल’ कहा जाता है। हर चुभनेवाली बात पर स्वरा ने अपनी आवाज बुलंद की है। न तो उन्हें किसी से कोई डर है और न किसी से खौफ। स्वरा के पिता नेवी ऑफिसर तो मां प्रोफेसर हैं। अपने टैलेंट के बलबूते इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनानेवाली स्वरा का बैक ग्राउंंड नॉन फिल्मी है। फिल्म ‘रांझणा’ से अपने करियर की शुरुआत करनेवाली स्वरा ने ‘नील बटे सन्नाटा’, ‘तनु वेड्स मनु’, ‘प्रेम रतन धन पायो’ जैसी फिल्मों में सशक्त अभिनय किया। पेश है स्वरा भास्कर से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

 सुना है, आपकी फिल्म `आपके कमरे में कोई रहता है’ थिएट्रिकल रिलीज होनेवाली थी?
फिल्म `आपके कमरे में कोई रहता है’ थिएट्रिकल रिलीज होनेवाली थी लेकिन लॉकडाउन के कारण ये संभव नहीं हो पाया। इस कॉमेडीनुमा फिल्म में काम करते हुए मैंने बहुत एन्जॉय किया। व्यक्तिगत तौर पर मैं कॉमेडी फिल्म करने के लिए उत्सुक रहती हूं, परंतु अभिनेत्रियों के हिस्से कॉमेडी सीन और फिल्में कम ही आती हैं।
 आप और नया क्या कर रही हैं?
फिल्म `जहां चार यार’ में उत्तर प्रदेश की कहानी है। इस फिल्म में कॉमेडी से लेकर सभी मानवीय संवेदनाएं हैं। मैंने एक कहानी लिखी है, जिसे मैं प्रोड्यूस भी कर रही हूं। साथ ही एक वेब सीरीज में व्यस्त हूं। अपने करियर के इस नए दौर को मैं एन्जॉय कर रही हूं।
 क्या आप फेमिनिस्ट हैं?
यह कहने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है कि हां, मैं फेमिनिस्ट हूं और सभी को फेमिनिस्ट होना भी चाहिए। फेमिनिज्म यानी अधिकारों की लड़ाई। ये लड़ाई सिर्फ महिलाओं के अधिकारों की नहीं, बल्कि किसी पुरुष को भी यदि उसके अधिकारों से वंचित रखा गया हो तो उसे भी खुद के हक के लिए लड़ना होगा। मैं मानती हूं कि यह लड़ाई बराबरी की है। सदियों से महिलाओं पर तमाम बंदिशें रखी जाती हैं और उन पर हर तरह से सख्ती बरती जाती है। मेरा यह मानना है कि महिलाएं हमेशा क्यों चूल्हा-चौका करें? मर्द ही क्यों पैसे कमाएं? मर्द को कभी रोना नहीं चाहिए। ये नियम-कानून किसने बनाए? मेरी सोच के अनुसार मर्द और औरत दोनों बराबरी के हैं। जेंडर यह तय नहीं करे कि कौन-सा काम कौन करे?
 क्या आप बचपन से बागी रही हैं?
बचपन में मुझे कभी बागी बनने की जरूरत ही नहीं पड़ी। हम बच्चों को पैरेंट्स ने हमेशा सपोर्ट किया। उन्होंने मुझे और मेरे भाई को अपना करियर चुनने और दिल की बात जुबान पर लाने की आजादी दी। इंडस्ट्री में आने के बाद मुझे दुनिया से लड़ने की शक्ति मिली है और उसके पीछे भी मेरे पैरेंट्स हैं। अपने दिल की बात अब मैं बेझिझक होकर कहने लगी हूं। हर माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों का मानसिक आधार बनें, उन्हें सपोर्ट करें और उनकी आवाज बनें। बच्चों को यह अहसास दें कि उनके अभिभावक हमेशा उनके साथ हैं।
 भारतीय समाज में फेमिनिज्म को स्वीकारा नहीं जाता?
हम ये वैâसे मान लें कि कोई हमें चांदी की थाली में हमारे अधिकारों को सजाकर सामने पेश करेगा? हिंदुस्थान जब अंग्रेजों का गुलाम था, उस वक्त क्या हमारे देशवासियों ने आजादी पाने लिए खून की होली नहीं खेली तब जाकर आजाद हिंदुस्थान का सपना साकार हुआ। यह स्वाभाविक है कि अच्छे बदलावों और अधिकारों को पाने के लिए बड़े परिश्रम करने पड़ते हैं। आसानी से कुछ स्वीकार होना नामुमकिन है। दकियानूसी समाज में किसी छोटी-सी भी चीज को स्वीकारना मुश्किल है। अपने अधिकारों के लिए लड़ना कोई गलत नहीं।
 आजकल `मी टू’ मूवमेंट फिल्म इंडस्ट्री से जैसे गायब हो गया है?
`मी टू’ मूवमेंट की शुरुआत मीडिया कर्मियों से हुई थी, फिर केरल फिल्म इंडस्ट्री में पैâली। केरल फिल्म इंडस्ट्री में एक अभिनेत्री को किडनैप कर लिया गया, उस पर हमला हुआ और यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ये बात बहुत देरी से सामने आई। `मी टू’ मूवमेंट अभी बस्ते में बंद नहीं हुआ है। अब लोग जागरूक हो चुके हैं और इसका श्रेय सिर्फ महिलाओं और उनके `मी टू’ को जाता है।
 `महिला दिवस’ के उपलक्ष्य में क्या आप कोई मैसेज महिलाओं को देना चाहती हैं?
हम महिलाओं को बचपन से पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही सिखाया जाता है कि समर्पण और त्याग करते हुए अपनों पर जिंदगी कुर्बान करो। जीवनभर एक स्त्री शादी से पहले अपने माता-पिता, भाई की सेवा करती है और फिर विवाह के बाद अपने पति, बच्चे और ससुरालवालों की सेवा में खुद को समर्पित करती है। इस चक्र में शायद वो खुद जीना भूल जाती है, मैं सभी महिलाओं से कहना चाहूंगी कि परिवार के प्रति समर्पित होने के लिए खुद को भुलाने की जरूरत नहीं है। आप सक्षम और मजबूत होंगी तो परिवार चलेगा। खुद का भी खयाल रखना बहुत जरूरी है।