" /> ‘टेबल टॉप’ हादसा; कैप्टन साठे का बलिदान!, यह वर्ष कब अस्त होगा?

‘टेबल टॉप’ हादसा; कैप्टन साठे का बलिदान!, यह वर्ष कब अस्त होगा?

केरल में हुआ हुआ विमान हादसा झकझोरने वाला है लेकिन विमान के कैप्टन दीपक साठे का शौर्य चकित करनेवाला है। कोझीकोड हवाई अड्डे पर शुक्रवार की शाम दुबई से आया एयर इंडिया का विमान गिरा नहीं, बल्कि रनवे पर उतरते समय फिसल गया और हादसा हो गया। विमान हादसा हमेशा भयंकर ही होता है। कई बार आकाश में हवाई जहाजों की टक्कर होती है, आकाश में हवाई जहाजों में आग लग जाती है और वह गिर पड़ते हैं। कोझीकोड के रनवे पर एयर इंडिया का विमान सिर्फ ३० फुट ऊंचाई से गिर पड़ा। उसमें दो पायलटों सहित अट्ठारह यात्रियों को जान गंवानी पड़ी। हवाई जहाज में कुल १७० यात्री थे। ‘वंदे भारत’ अभियान के तहत दुबई में फंसे हिंदुस्थानी नागरिकों को लेकर यह विमान आया था व खिड़की से भारत भूमि का साक्षात दर्शन करने के दौरान ही हादसा हो गया। इतने भयंकर हादसे में १८ लोग मारे गए लेकिन ज्यादातर यात्रियों की जान बच गई, जो कि सही समय पर विमान के पायलट कैप्टन दीपक साठे की सूझबूझ के कारण। कम-से-कम डेढ़ सौ यात्रियों की जान बच गई है। पायलट साठे ने जान की बाजी लगाकर जीवित हानि कम कर दी। साठे महाराष्ट्र के सुपुत्र हैं। उनके एक भाई कारगिल युद्ध में देश के काम आए। पिता ब्रिगेडियर साठे ने भी सेना में देश की सेवा की। खुद कैप्टन साठे वायुसेना में थे और वह राष्ट्र की सुरक्षा के संदर्भ में कई दुष्कर जिम्मेदारियों को निभा चुके थे। ऐसे पायलट की कर्तव्य निर्वहन के दौरान मौत होने पर सभी को दुख हुआ है। साठे एक अनुभवी पायलट थे। उनका हवाई सेवा का अनुभव अद्भुत था और इसके लिए राष्ट्रपति ने स्वर्ण पदक देकर उन्हे गौरवान्वित किया था। फिर भी वे विमान हादसे का शिकार हो गए। क्योंकि केरल में प्रकृति कुपित हो गई है। मूसलाधार बारिश, तूफान का झटका लगा है। जगह-जगह पर भूस्खलन शुरू है। ऐसे तूफान में कैप्टन साठे विमान को रनवे पर ले आए। विमान को सुरक्षित उतारने का उनका प्रयास दो बार असफल हुआ। तीसरी बार उन्होंने आत्मविश्वास के साथ विमान की ‘लैंडिंग’ की। विमान उतरते समय रनवे से फिसल गया। विमान ने रनवे छोड़ दिया और चारदीवारी पर गिरने के बाद ३० फिट गहरी खाई में चला गया। अब ऐसा भी सामने आया है कि विमान में तकनीकी खराबी हुई थी। विमान का लैंडिंग गियर बंद हो गया था। इसलिए बड़ा अनर्थ टालने के लिए विमान के तीन चक्कर लगाकर विमान में उपलब्ध र्इंधन खत्म करने के बाद ही ‘लैंडिंग’ का निर्णय कैप्टन साठे ने लिया था। इसलिए विमान हादसा होने के बाद जला नहीं। कैप्टन साठे ने यह सब अत्यंत कौशल और चतुराई के साथ किया। विमान तीन बार गिरा, दो टुकड़े हुआ, लेकिन आग नहीं लगी। जिस हवाई अड्डे पर हादसा हुआ उस कोझीकोड का रनवे ‘सपाट’ जगह पर नहीं है। जिसे ‘टेबल टॉप’ कहना होगा ऐसी ऊंची जगह पर इस रनवे का निर्माण किया गया है। इसलिए रनवे के लिए विस्तृत खुली जगह नहीं है। यहां विमान उड़ाना व उतारना विशेष कौशल का काम है। इसमें बारिश, तूफान आदि का झटका लगा तो परेशानी होती है। शुक्रवार की शाम ठीक यही हुआ था। कुछ साल पहले मैंगलोर के हवाई अड्डे पर हुआ हादसा ऐसा ही था। विमान उतरते समय फिसल गया और आगे सुरक्षा दीवार तोड़कर खाई में जा गिरा। उसमें १९० यात्री मारे गए थे। मंगलुरू का रनवे ‘टेबल टॉप’ जैसा ही है। कोझीकोड का रनवे भी ‘टेबल टॉप’ जैसा है। दुनिया भर में कई हवाई अड्डे ऐसी जगहों पर हैं। नेपाल, भूटान, यूरोप के कुछ प्रदेशों में पहाड़ी-खाइयों व समुद्र में रनवे का निर्माण किया गया है। कुछ जगहों पर समुद्र में ही रनवे का निर्माण किया गया है। अंतर्राष्ट्रीय हवाई नियम कानून के अनुसार रनवे की लंबाई ९ हजार फुट होनी ही चाहिए लेकिन हमारे देश में हाल ही में जो हवाई अड्डे, रनवे बनाए गए हैं वो ९ हजार फुट से कम लंबे हैं। पटना, जम्मू, मैंगलोर, कालीकट, एजवाल, कुल्लू, लेह, पोर्ट-ब्लेयर, अगरतला स्थित रनवे के बारे में संदेह है। महाराष्ट्र के लातूर स्थित रनवे पर तो सुरक्षा दीवार ही नहीं है। लोगों व राजनीतिज्ञों की जिद के कारण रनवे का निर्माण करना और बाद में उन्हें राम भरोसे छोड़ देना। मैंगलोर हवाई अड्डे का रनवे एक रहस्य ही है। यह भी टेबल टॉप रनवे है। थोड़ी सी चूक हुई तो अनर्थ हो सकता है। रनवे की ‘लंबाई’ की गणना में गलती करके यहां पर टेकऑफ, लैंडिंग की तो सीधे स्वर्ग का रास्ता, ऐसा यह एयरपोर्ट के बारे में विशेषज्ञों का दृढ़ मत है। वर्ष २०१० में एयर इंडिया एक्सप्रेस का दुबई से आया और मैंगलोर स्थित हवाई अड्डे के ‘टेबल टॉप’ रनवे पर ‘लैंड’ करने वाले विमान के पायलट द्वारा रनवे की लंबाई का अनुमान लगाने में चूक हो गई और वह दीवार को तोड़ते हुए खाई में जा गिरा। यह भयंकर हादसा था। इसी तरह का हादसा अब कोझीकोड रेनवे पर हुआ। मैंगलोर का विमान भी दुबई से ही आया था और कोझीकोड का विमान भी दुबई से ही आया था। यह एक अजब संयोग सिद्ध हुआ है। कैप्टन दीपक साठे द्वारा प्रयास किए जाने के कारण ‘मैंगलोर’ की तरह बड़ी मानव हानि नहीं हुई। कैप्टन साठे का त्याग व शौर्य भुलाया नहीं जा सकेगा। वर्ष २०२० यह इंसानों की बलि लेनेवाला समाज व देश को वेदना देनेवाला साल है। इस वेदना में कोझीकोड हादसे से बढ़ोत्तरी हुई है। यह वर्ष जल्द अस्त हो जाए तो अच्छा होगा!