" /> तकनीकी क्रांति का पूंजीवाद

तकनीकी क्रांति का पूंजीवाद

पिछली सदियों में जब भारत समेत पूरी दुनिया में औद्योगिक क्रांति का दौर था तो चंहुओर पूंजीवाद एवं इसके दुष्प्रभावों की चर्चा थी। चर्चा थी कि वैâसे संसाधन कुछ मुट्ठियों में इकट्ठे होते जा रहे हैं। धीरे-धीरे इस औद्योगिक क्रांति का स्थान बाजार क्रांति ने ले लिया और पूंजीवाद ने बाजारवाद का वस्त्र पहन लिया। अबकी बार पूंजीवाद तकनीकी क्रांति के द्वारा उतर रहा है।
पूंजीवाद की आलोचना इसीलिए भी होती थी कि पूंजीवाद मुनाफाखोर था मूल्य का सिस्टम उनके हाथ में था। तकनीक में भी वही है। इस आभासी दुनिया के मूल्यांकन की कोई भी पारदर्शी व्यवस्था नहीं है और शुरुआत में आईटी कंपनियों ने ऊल-जूलूल पैसे भी वसूले। इसका फैलाव इतने चुपके से होता है की कई लोगों को पता ही नहीं लगता और सबकुछ लुट जाता है। मेरु और टैब कैब टैक्सी सेवा को तो हवा ही नहीं लगी कि कब ओला-उबर ने उनके सारे निवेश को एक झटके में खत्म कर दिया। और ऐसे ही काली पीली टैक्सी वालों को पता नहीं लगा कि कब मेरु, टैब कैब तथा बाद में ओला और उबेर ने उनके बाजार पर कब्जा कर लिया। आज उनका निवेश लाभ के लिए संघर्ष कर रहा है। कुछ ऐसा ही देश भर में फैले कचहरी के बाहर फैले झटपट स्टूडियो वालों के साथ हुआ मोबाइल कैमरे और आधुनिक प्रिंटर के अविष्कार ने उनकी जड़ ही खत्म कर दी। साथ में जबसे मोबाइल पर कैमरे आने लगे तो सागर किनारे फोटोग्राफर भी ग्राहकों के लिए तरसने लगे। रील वाले कैमरे का पहले तो बाजार डिजिटल कैमरे ने छीना। बाद में इन डिजिटल कैमरे का बाजार मोबाइल कैमरों ने छीन लिया।
अब तो टीवी से ज्यादा घंटे लोग मोबाइल पर खर्च करते हैं और इसने टीवी चैनलों के लिए नई चुनौती पैदा कर दी। करोड़ों रुपए लगाकर न्यूज चैनल खोलने वालों के सामने हजार रुपए खर्च कर लाखों की संख्या में यूट्यूब चैनल ने आने लगे। तकनीक इतनी तेजी से पिछले को खत्म कर रही है कि जिसने इसके साथ कदमताल नहीं किया, उसे पता ही नहीं चलेगा कि कब उसकी दुनिया खिसक गई।
कुछ ऐसा ही भारत में सीए लोगों के साथ भी हो सकता है। जब सब कुछ ऑनलाइन नहीं था, तब उनके प्रमाणन की आवश्यकता थी। अब तो सब डिजिटल प्रमाणित आता है और समाधान विवरण के साथ। हो सकता है कि कुछ साल बाद इनके प्रमाणन की आवश्यकता ही नहीं रहे। एक बिजनेस का ९० प्रतिशत हिस्सा उसका खरीद बिक्री होता है, वह तो अब जीएसटी पोर्टल प्रमाणित कर दे रहा है बाकि का डाटा आयकर विभाग को डाटा माइनिंग से आ जा रहा है। फिर उसे अलग से सीए की टैक्स ऑडिट प्रमाणन की जरुरत ही क्यों पड़ेगी? आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस के विस्तार ने कई जगहों से जहां मानवीय जजमेंट को खत्म किया है और वह डॉक्टर से लगायत कोई भी काम हो सकता है। तकनीक का जन्म एक मानवीय जजमेंट ने किया था। अब इसी तकनीक का मिशन हर उस जगह का स्थान लेना है जहां मानवीय जजमेंट प्रयोग होता है। इसलिए अगर मेट्रो चालक विहीन आ रहा है तो इसपर खुश होने की जरूरत नहीं है, ऐसी तकनीक का क्या फायदा जो आवश्यक रोजगार को खत्म कर दे।
एक समय था बाजार में मोटोरोला और नोकिया के फोन का ही दबदबा था और वो हौले हौले आ रही स्मार्टफोन, एंड्राइड एवं एप्पल के कदमों की आहट सुन नहीं सके। बहुत देर में जागे। तब तक बाजार में एंड्राइड एवं एप्पल सपोर्ट मोबाइल की बाढ़ आ गई। आज बाजार में इनकी उपस्थिति नगण्य है। मोबाइल की दुनिया में एक गलती माइक्रोसॉफ्ट ने भी कर दी। वह अपने डेस्कटॉप और लैपटॉप के ऑपरेटिंग सिस्टम पर ही ध्यान देती रही और उसे देर से पता चला कि कंप्यूटर की दुनिया अब मोबाइल में सिमट गई है। अब कंप्यूटर के लगभग सारे काम मोबाइल से ही हो जा रहे हैं। मोबाइल टैबलेट भी अब बाजार से बाहर जा रहे हैं क्योंकि अब मोबाइल ही इतने सक्षम हो गए हैं की टैबलेट का काम करने लगे हैं। अगला उदाहरण याहू का है। एक समय इन्टरनेट मतलब याहू था। ईमेल और चैट मतलब याहू, लेकिन इसने भी बदलते वक्त के साथ अपने को बदला नहीं और जीमेल की आहट को सुन नहीं सका और आज बाजार से बाहर हो गया। आज के दौर में कुछ बिजनेस सेगमेंट ऐसे भी हैं जो यदि समय की आहट को पहचान नहीं सके तो उनका भी पतन निश्चित है। उसमे पहला थिएटर और मल्टीप्लेक्स का बिजनेस है। जिस तरह से नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम और यूट्यूब ने अपना दायरा बढ़ाया है और उसके साथ स्मार्ट टीवी और होम थिएटर की बिक्री बढ़ी है और जियों के आने से डाटा सस्ता हुआ है और शहरों में ट्रैफिक और प्रदूषण बढ़ा है। कोरोना से ऑनलाइन का एक नया बाजार जो खड़ा हुआ है, अब वो दिन दूर नहीं जब बड़ी संख्या में लोग थिएटर जाना बंद कर के घर पर ही नई रिलीज हुई मूवी अपने स्मार्ट टीवी पर होम थिएटर सिस्टम लगाकर देखेंगे। कोरोना के बाद भी मूवी रिलीज डीटीएच सेवा प्रदाता, नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम और यूट्यूब या ऐसे ही प्लेटफार्म पर हो और ये प्लेटफार्म थिएटर से ज्यादा पैसा बनाएं इसलिए इसी कड़ी में अगला संकट इन डीटीएच सेवा प्रदाताओं पर आने वाला है।
ये तो उदाहरण है जिसमें तकनीक ने सक्षम लोगों को धराशायी कर दिया है। जरा सोचिये जो सक्षम नहीं हैं, उसका क्या हाल होगा? अगर तकनीक इसी तरह पिछले को दमित करते हुए आगे बढ़ गई तो पृथ्वी के इस ८०० करोड़ की आबादी का क्या होगा? आज पृथ्वी पर सबसे बड़ी समस्या जनसंख्या आधिक्य की है और कोई भी नीति यदि इनके समायोजन को उपेक्षित करके या इन्हें रिप्लेस करने के लिहाज से बनेगी तो एक छोटे गड्ढे को भरने के लिए हम बड़ा गड्ढा खोद रहे हैं। मशीनों का इस्तेमाल होना चाहिये लेकिन इतना नहीं कि आदमी ही खाली हो जाए, हमारे पास भी दिन के २४ घंटे होते हैं लेकिन इन २४ घंटे में लगातार हम काम नहीं करते। इसे हमने संतुलित घंटों में बांटा है ताकि हम लंबी अवधि तक जीते हुए काम करते रहें। इस तकनीक का संतुलन बिंदु हमें ढूंढना पड़ेगा नहीं तो तकनीक का पूंजीवाद औद्योगिक पूंजीवाद से ज्यादा प्रभावित करने वाला है और यह जनसंख्या आधिक्य ग्लोबल वॉर्मिंग से ज्यादा खतरनाक होगा। यह सिर्फ दुनिया की चुनिंदा कंपनियों फेसबुक, व्हॉट्सऐप या ट्विटर का मसला नहीं है। ये तो ऑरकुट, याहू की तरह आई हैं तो एक दिन इनकी जगह कोई और आ जाएगा। सबसे बड़ा खतरा हमारी नीति निर्माण की सोच है जो यहीं से शुरू होती है कि मानवीय हस्तक्षेप को खत्म करना है। अब अगर मानव व्यस्त नहीं रहेगा तो क्या करेगा? इसलिए हमें इस तकनीक क्रांति के पूंजीवाद की काट और इसके विकास का संतुलन बिंदु खोजना पड़ेगा नहीं तो एक दिन यही तकनीक मानव जाति की दुश्मन बन जाएगी।

(लेखक अर्थशास्त्र के जानकार हैं। आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक विषयों के विश्लेषक हैं।)