" /> ‘ठाकरे सरकार’ छमाही में पास, प्रैक्टिकल बाकी है : शरद पवार

‘ठाकरे सरकार’ छमाही में पास, प्रैक्टिकल बाकी है : शरद पवार

पाकिस्तान नहीं चीन ही हमारा शत्रु!!

अर्थ व्यवस्था साफ ढ़ह गई है। इसे संवारने के लिए देश को और एक मनमोहन सिंह की जरूरत है, लेकिन मोदी सरकार को विशेषज्ञों की सलाह नहीं चाहिए!

शरद पवार ने साक्षात्कार के दूसरे भाग में राष्ट्रीय, अंतराष्ट्रीय सवाल और राष्ट्र की सुरक्षा के प्रश्नों पर अपने विचार व्यक्त किए। साक्षात्कार के दूसरे भाग का सवाल-जवाब ऐसे हुआ।

चीन आर्थिक दृष्टि से मजबूत हो गया है। उसका टारगेट अब हिंदुस्थान है। मतलब मोदी साहब ने वहां जाकर उनसे दोस्ती की, उन्हें यहां लाकर झूले पर बिठाया और भारतीय कपड़े सिलाए। यह सब करके हमने कुछ बड़ा कर दिया, ऐसा दृश्य ‘निर्माण’ किया। एक-दूसरे के हाथ में हाथ डालकर, गलबहियां कर दोनों देशों की दोस्ती हो रही है, ऐसा चित्र निर्माण किया। लेकिन गलबहियां ठीक है, शेकहेंड भी ठीक है परंतु ऐसा करके दोनों देशों के बीच के मुद्दे हल नहीं होते। ये अब हमें मालूम हो गया है।

राजनीति में शरद पवार जैसा अनुभवी नेता दूसरा नहीं। बारामती के एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पवार को अपना गुरु होने की बात कही। आज के साक्षात्कार में पवार ने हंसते-हंसते कहा, राजनीति में कोई किसी का गुरु नहीं होता, केवल सुविधा देखी जाती है! शरद पवार ने स्पष्ट रूप से कहा कि उद्धव ठाकरे के छह महीने का परफॉर्मेंस १०० प्रतिशत उत्तम है। विद्यार्थी छमाही परीक्षा में पास हो गया है! देश की वित्त व्यवस्था डगमगा गई है, इसे संवारने के लिए देश को और एक मनमोहन सिंह की जरूरत है। श्री. पवार लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति में हैं। देश के रक्षा मंत्री के रूप में नरसिंहराव के मंत्रिमंडल में उन्होंने अपनी छाप छोड़ी। देश पर आया चीन का संकट गंभीर है। पाकिस्तान की चिंता छोड़ो, चीन की ओर ध्यान दो, ऐसा पवार ने फटकारा। चीन के साथ संघर्ष सेना की ताकत से नहीं सुलझेगा, उसे डिप्लोमैटिक तरीके से ही सुलझाना होगा। चीन के राष्ट्रपति से गलबहियां कर वह कैसे हासिल होगा? ऐसा सीधा सवाल उन्होंने किया।

छह महीना यह परीक्षा का काल होता है। जैसा पहले वार्षिक और छमाही की परीक्षा होती थी… फिर वह प्रगतिपुस्तक आती थी अभिभावकों के पास। उसी तरह सरकार के छह महीने की प्रगतिपुस्तक आपके पास आई क्या?
सही है। लेकिन अब यह छह महीने की परीक्षा हो गई है। परीक्षा पूर्ण हुई है, ऐसा मुझे नहीं लगता। परीक्षा के प्रैक्टिकल का हिस्सा अभी भी बाकी है।

वही तो महत्व का है…
अब कहां लिखित परीक्षा हुई है लेकिन उस परफॉर्मेंस के आधार पर ही प्रैक्टिकल में भी यह सरकार सफल होगी, अब ऐसा ट्रेंड नजर आ रहा है। दूसरा महत्वपूर्ण यानी महज छह महीनों के कालखंड के संबंध में तुरंत ही निष्कर्ष निकालना उचित नहीं। इसके अलावा विद्यार्थी कष्ट उठाते हुए दिख रहे हैं। इसलिए अभी परिणाम की चिंता करने जैसी स्थिति दिखती नहीं। राज्य का विचार करके आप पूछ रहे हैं तो इन छह महीनों की परीक्षा में हमारे विद्यार्थी पूरे पास हुए हैं। वो आगे की परीक्षा, आगे के पेपर भी आसानी से सुलझाएंगे ऐसा विश्वास है।

आप ये मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के बारे में कह रहे हैं?
अर्थात मुख्यमंत्री ठाकरे के विषय में ही मैं ये बोल रहा हूं। क्योंकि आखिर में राज्यप्रमुख ही महत्वपूर्ण होता है। उनके नेतृत्व में टीम काम करती है इसलिए इसका श्रेय भी उन्हें ही मिलेगा।

आपने पहले कहा था कि कोरोना संकट नहीं होता तो राज्य को इन छह महीनों में और आगे ले गए होते। आप इसके पहले भी यह राज्य चला चुके हैं। इतने वर्षों का अनुभव है। आज राज्य के सामने सबसे बड़ा संकट कौन-सा है?
अर्थ व्यवस्था का संकट है। उसे पटरी पर लाना एक चुनौती है। यह मुझे काफी बड़ा चैलेंज लगता है।

कोरोना का संकट और अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव इसका परिणाम आपको क्या दिखता है?
कृषि की अर्थ व्यवस्था पर विचार करो। खासकर कृषि और उसके उत्पादन का। कृषि से संबंधित अन्य व्यवहार शुरू हैं, शुरू नहीं है, ऐसा नहीं है लेकिन उसे मार्वेâट नहीं। मार्वेâट न होने के चलते शुरुआत के कुछ दिन किसानों द्वारा उपजाई गई उपज को आगे ले जाकर करें क्या? यह सवाल किसानों के समक्ष आया। इसके बाद उस माल की कीमत का सवाल उठा। इसलिए संपूर्ण कृषि, वित्त व्यवस्था संकट में आई। दूध जैसे खेती से जो जुड़े हुए धंधे हैं, उसकी सप्लाई बंद होने जैसी स्थिति थी। साधन नहीं थे। इन सब बातों का राज्य की अर्थ व्यवस्था पर असर पड़ रहा था।

कारखानेवालोेंं पर भी संकट के बादल हैं…
आप एक बात ध्यान में रखें। महाराष्ट्र की विशेषता है कारखाना और औद्योगिकीकरण। लेकिन कोरोना के चलते महीनों तक कारखाने बंद, मजदूरों को काम करने का मौका नहीं। कारखाने का कारोबार पूरी तरह संकट में आ गया। कोरोना संकट के चलते वित्त व्यवस्था अड़चन में आ गई और वहां काम करनेवाले लोगों का रोजगार संकट में आ गया। बजाज ऑटो जैसे कुछ उद्योगपतियों ने मजदूरों को वेतन दिया लेकिन अब वे भी विचार करने लगे हैं कि हम कितने दिन वेतन दे पाएंगे? जिन उद्योगों की वेतन देने की कुवत ही नहीं थी, उस जगह के मजदूरों की, मेहनतकश लोगों की दुनिया वैâसे चलाएं, उनका घर वैâसे चलाएं, ये सवाल घर-घर से उत्पन्न होते हुए हमने देखे हैं और तीसरा मुद्दा मतलब व्यापार। व्यापार के लिए महाराष्ट्र या मुंबई ये महत्वपूर्ण केंद्र है। एक समय में मुंबई शहर कपड़ों की मिल एवं विभिन्न इंडस्ट्रीज का शहर था। लेकिन ‘बदलते दौर में’ अब वह दृश्य नहीं रहा। अब वे मिलें और व्यवहार अन्य शहरों व राज्यों में गए। मुंबई ने उसमें भी उड़ान भरी। अब मुंबई शहर देश का आर्थिक केंद्र हो गया है। यह नगरी अब फायनेंस और कम्यूनिकेशन टेव्नâोलॉजी क्षेत्र में काफी आगे गई है। लेकिन कोरोना काल में ये सभी व्यवहार भी बंद हो गए थे। अब वह धीरे-धीरे शुरू हो रहा है।

लेकिन फायनेंशियल सेंटर तो गुजरात ले जाया गया है…
वह कोरोना का दूसरा संकट है। ठीक है। उस पर बाद में कभी बात करेंगे। लेकिन अब आप बीकेसी का क्षेत्र देखिए। उस परिसर में कतार में आपको बड़ी-बड़ी बैंकों की इमारतें नजर आएंगी। गगनचुंबी। हमने भरसक प्रयास करके इन बैंकों को यहां लाया। अब उन सभी बैंकों का व्यवहार पिछले दो महीनों से करीब-करीब ठप हो गए थे इसलिए वाणिज्य, कृषि और कारखानदारों के जो विषय थे, वो सब पूर्ण रूप से ठंडे हो गए और इन सभी बातों का दुष्परिणाम हर घर में हुआ ये स्वीकार करना ही होगा।

लेकिन ऐसे समय में यह पूरा पीड़ित वर्ग आशा से सरकार को देखता है। ‘माई-बाप सरकार’ ऐसा जब हम कहते हैं तब सरकार हमारे चूल्हे जलाएगी, यह सरकार हमारे दाने-पानी की व्यवस्था करेगी, यह जनता की सरकार से अपेक्षा रहती है। ऐसे समय में बतौर सरकार क्या करेंगे? एक मंत्री का निवेदन मैंने सुना कि कर्मचारियों को वेतन देने के लिए भी पैसे नहीं हैं, ऐसा वे कह रहे हैं। ऐसे समय में राज्य वैâसे चलेगा?
ठीक है लेकिन असल में स्थिति क्या है, इसका भी अच्छी तरह विचार होना चाहिए। आप देखें, इन सभी परिस्थिति में नागरिकों ने पूरी तरह सामंजस्यपूर्ण भूमिका अपनाई। सरकार से उनकी अपेक्षा निश्चित है लेकिन उन्हें ये भी पता है कि सरकार की ही आवक थम गई है। सरकार की ही आवक थमने की बात आम जनों को दिखाई देने लगती है तब हम कितना आग्रह करें, कितना हठ करें, कितना संघर्ष करें, इन सभी बातों पर लोगों ने भी अत्यंत सामंजस्य दिखाया है।

आय इतनी घट गई कि वेतन होगा नहीं…
हां, राज्य सरकार की आय घट गई है, ये सच है। इस संदर्भ में मैं अधिकारियों से जानकारी ले रहा था कि आपने महाराष्ट्र के विधानसभा में राज्य का बजट पेश किया और उसके मंजूर होने के बाद कोरोना आया। अब उस बजट में राज्य की आय का क्या विचार किया था? वह आंकड़ा कुछ ३ लाख ९० हजार करोड़ के आस-पास था। मेरा आंकड़ा शायद गलत हो सकता है लेकिन ऐसा कुछ तो आंकड़ा था। ठीक है। अब इसके बाद यह तीन महीना ऐसे ही गया। सरकार की आवक रुक गई। इस काल में कितनी आय होगी, इसका अगर आकलन करें तो जो हमने मूल आंकड़ा माना था, उसमें ५० प्रतिशत से ज्यादा फटका इन तीन महीनों में लगा है, ऐसा दिखता है। इसका मतलब सरकार की भी आर्थिक ताकत घटने लगी है। इसे ही हम आर्थिक संकट कह सकते हैं। सरकार की भी मर्यादा है। एक मंत्री के स्टेटमेंट के विषय में आपने कहा। मैंने भी वो सुना। वित्तमंत्री से भी मैंने यही सुना। लेकिन फिर भी सरकार का सतत प्रयास है कि कुछ भी करके कर्मचारियों का वेतन दिया जाए और इस महीने तक सभी कर्मचारियों का वेतन दिया है लेकिन शायद आगे कर्ज लेना होगा, ऐसी परिस्थिति दिख रही है, लेकिन उस पर भी मार्ग निकाला जा सकता है।

इतनी बड़ी आपत्ति में केंद्र सरकार को राज्यों की मदद करनी चाहिए, ऐसा आपको नहीं लगता क्या?
हंड्रेड परसेंट। ऐसे समय में केंद्र को ही राज्यों की मदद करनी चाहिए। राज्य का आर्थिक पहिया दोबारा खड़ा करने के लिए केंद्र को ही मदद करनी चाहिए। यह केंद्र की ही जिम्मेदारी है। केंद्र की आय के मार्ग क्या होते हैं? उनके सभी आय के मार्ग राज्य से ही हैं। राज्य की वित्त व्यवस्था, राज्यों का व्यवहार, राज्य का उत्पादन गतिशील हुआ तो उससे राज्य की आय उत्पन्न होगी और उसी का हिस्सा केंद्र को मिलेगा। इसलिए केंद्र को अपनी दुकान चलाने के लिए भी राज्य की दुकान चलानी होगी।

केंद्र भी क्या कर पाएगा?
केंद्र के पास रिजर्व बैंक है, केंद्र के पास नोट छापने का अधिकार है। केंद्र के पास विश्व बैंक या एशियन बैंक से पैसे लाने की ताकत है। वह उनका अधिकार है। केंद्र बहुत कुछ कर सकता है। वह राज्य के लिए संभव नहीं। राज्य को कल कर्जस्वरूप पैसा लाना हो तो वह स्वयं के निर्णय से कुछ नहीं कर सकता। हर राज्य कितना कर्ज ले सकता है इसकी सीमा केंद्र सरकार द्वारा तय की गई होती है और इसलिए राज्य की मर्यादा है।

आप मोदी के गुरु हैं, ऐसा वे कहते हैं। ऐसे समय में आपको अपने शिष्य से यह कहना चाहिए कि देश की वित्त व्यवस्था के लिए कुछ निर्णय हमें कठोरता से लेना होगा…
मैं उनका गुरु हूं ऐसा कहकर बेवजह उन्हें अड़चन में न डालें और मुझे भी अड़चन में न लाएं। गुरु वगैरह छोड़िए, राजनीति में कोई किसी का गुरु वगैरह नहीं होता। हम एक-दूसरे के लिए अपनी सुविधानुसार विचार व्यक्त करते रहते हैं। इसके अलावा इधर उनकी और मेरी मुलाकात भी नहीं हुई है। बाकी बचा मुद्दा वित्तीय व्यवस्था के संबंध में, तो मुझे ऐसा लगता है कि इन सब परिस्थिति में वित्त व्यवस्था रिवाइव करने के लिए मोदी को कुछ विशेषज्ञों से मदद लेने की आवश्यकता है। बीच में एक गृहस्थ यहां रिजर्व बैंक के गवर्नर थे। दुर्भाग्यवश क्या हुआ, मुझे पता नहीं। वो छोड़कर चले गए। अब ऐसे जो लोग हैं, जिन्हें हम जानकार कह सकते हैं उनसे बात करनी चाहिए या डॉ. मनमोहन सिंह जैसे लोग हैं।

इस देश को एक मनमोहन सिंह की जरूरत है क्या?
हंड्रेड परसेंट जरूरत है। क्योंकि मनमोहन सिंह जब फाइनेंस मिनिस्टर हुए तब मैं उस मंत्रिमंडल में था। मुझे पता है कि उस समय हम फाइनेंसियल क्राइसिस से किस तरह गुजर रहे थे। लेकिन मनमोहन सिंह ने एक नई दिशा दी। इस देश को आर्थिक संकट से बाहर निकाला। उसके लिए मनमोहन सिंह को मैं श्रेय देता हूं। उसी तरह नरसिंह राव को भी श्रेय देता हूं। ये दोनों नियोजित दायरे से मार्ग बदलकर अलग मोड़ पर गाड़ी ले गए और पूरी वित्तीय व्यवस्था संवर गई। आज उनकी आवश्यकता थी। इस तरह के विशेषज्ञों की मदद लेकर मोदी साहब को कदम बढ़ाना चाहिए। मुझे विश्वास है कि इस तरह के किसी भी प्रयत्न को देश सहयोग करेगा।

आप राष्ट्रीय स्तर के बहुत महत्वपूर्ण नेता हैं और देशभर के कई राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी राय रखते हैं, आपकी सलाह ली जाती है। आप जो कहते हैं उसे एक महत्व मिलता है। फिर प्रधानमंत्री हो, गृहमंत्री हो, वित्त मंत्री हो या विरोधी दल के अन्य नेता हों, ये हमेशा आपके संपर्क में रहते हैं। लेकिन यह जो संकट आपको दिखाई दे रहा है, इस देश व महाराष्ट्र का, उसे दूर करने में कहीं समन्वय की कमी आपको नजर आती है क्या?
मुझे ऐसा दिखता है कि प्रधानमंत्री को अन्य दलों के कुछ जानकार लोगों से बात करने की जरूरत है। संकट की व्यापकता को देखते हुए किसी भी एक दल द्वारा हम ही सब कुछ सुलझा लेंगे, ऐसी भूमिका चलेगी नहीं। ऐसे समय में जिन-जिन की मदद लेना संभव हो, उपयुक्त हो, उन सभी को साथ लेने के बारे में प्रयास करना चाहिए। आज मोदी साहब का जो सेटअप है, उस सेटअप में कई सहयोगी ऐसे हैं, जिन्हें इस प्रकार के काम का अनुभव नहीं है। कोरोना की बात करें तो हमें भी उस तरह का अनुभव नहीं क्योंकि हमने ऐसा संकट कभी देखा ही नहीं था। लेकिन  इस संकट पर मात करने के लिए जिस प्रकार का कदम बढ़ाने के लिए सभी का साथ लेना चाहिए उसकी कमी हमें दिखती है। सभी को साथ लेकर ही इस संकट को मात दिया जा सकता है।

आपने देश के वित्तमंत्री से कभी इस बारे में चर्चा की?
नहीं। मेरी कभी उनसे मुलाकात ही नहीं हुई। एक बार भी मुलाकात नहीं हुई। मुलाकात छोड़िए, कभी बातचीत भी नहीं हुई लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि इतने बड़े देश, बड़ी जनसंख्या कहने पर रोज सामने ऐसे सवाल खड़े होते हैं, देश की वित्त व्यवस्था जब संकट में आती है, तब एक प्रकार का डायलॉग अन्य लोगों के साथ होना चाहिए, वह डायलॉग मुझे फिलहाल दिखाई नहीं दे रहा।

यह डायलॉग खत्म हो गया, ऐसा लगता है आपको?
कुछ लोगों के काम की यही शैली होती है। वह इनकी भी हो सकती है। पहले वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी थे। चिदंबरम थे या मनमोहन सिंह थे। उस समय कई बार मैंने देखा कि अन्य दलों के लोगों से या अन्य जानकारों से वे घंटों-घंटे चर्चा करते, विशेषज्ञों की राय लेते। अब उस तरह विशेषज्ञों की राय ली जाती है या नहीं, मुझे पता नहीं। क्योंकि हमारी तरह भिन्न विचार के लोगों को वहां प्रवेश है, ऐसा दिखता नहीं। इसलिए उस तरह जानकारों से सलाह वे लेते हैं या नहीं, मालूम नहीं। ले रहे होंगे तो उसका परिणाम कहीं तो दिखना चाहिए, वैसा वह दिख नहीं रहा।

कोरोना हो, लॉकडाउन हो, अर्थ व्यवस्था हो, इन संकटों के बीच देश पर और एक संकट आया है, वो है चीन का हमला। अपनी सीमा पर अशांति है। चीन के सैनिक अंदर घुस आए हैं, इस प्रकार के आरोप लग रहे हैं। आप इस चीन के संकट को इस समय  कैसे देखते हैं?
मेरा इन सभी प्रश्नों की ओर देखने का दृष्टिकोण अलग है। हम इस देश में वर्षों से अपना मित्र कौन, शत्रु कौन इसका जिस समय विचार करते हैं, उस समय भारतीयों के मन में शत्रु के रूप में पहले पाकिस्तान आता है। लेकिन मेरा कई वर्षों से मत है कि पाकिस्तान से सही में चिंता हमें नहीं। पाकिस्तान हमारे विचारों का नहीं, ये बात सच है। पाकिस्तान हमारे हितों के विरोध में कदम उठाता है यह भी सच है। लेकिन लांग टर्म की दृष्टि से हम सभी के हितों के संदर्भ में सही संकट पैदा करने की ताकत, दृष्टि और गतिविधियां केवल चीन की हैं। चीन हमारे देश की दृष्टि से एक बड़ा संकट है। चीन से हमें होनेवाला उपद्रव सीधा-साधा नहीं है।

ऐसा आप कैसे कह सकते हैं?
पाकिस्तान की सैन्य शक्ति तथा चीन की सैन्य शक्ति में जमीन-आसमान का अंतर है। आज हमारी सैन्य शक्ति, हमारी वायु सेना, हमारी नौसेना, हमारी फौज, अपने शस्त्र-विस्फोटकों की चीन से तुलना की जाए तो कदाचित दस की तुलना में एक, ऐसा प्रमाण पड़ सकता है। उनके पास ये सब चीजें हमसे १० गुना ज्यादा हैं। उन्होंने ये सब सालों-साल प्रयास करके योजनाबद्ध ढंग से तैयार किया है। उनका हिंदुस्थान पर कभी निशाना नहीं था। पहले यह उनकी पॉलिसी थी। नजारा एकदम हाल-फिलहाल में बदला है।

आप रक्षामंत्री रह चुके हैं। आप कई बार चीन के दौरे पर जा चुके हैं। वहां के नेताओं से चर्चा कर चुके हैं। इसलिए पूछता हूं कि उस समय आपका दृष्टिकोण क्या था?
वही बता रहा हूं। मेरा एकदम दृढ़ मत था कि हमें पाकिस्तान की बहुत ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है। वास्तविक चिंता चीन की ही है। उनका एक साथ… उदाहरण बताता हूं कि मैं रक्षा मंत्री रहते चीन गया था। उस समय डिफेंस सेक्रेटरी वोरा भी साथ में थे। वोरा, आपको याद आता होगा। इसके बाद वे कश्मीर में १० साल राज्यपाल रहे। तो सात दिन में मैं व वहां के डिफेंस मिनिस्टर ने चर्चा की। उस समय हिमालयन बॉर्डर पर हमारी सेना थी। उनकी भी सेना थी। हिमालयन बॉर्डर पर सेना रखना बेहद खर्चीला है। मौसम के लिहाज से हमारे जवानों के लिए बेहद तकलीफदेह था। बर्फ आदि प्राकृतिक बातों का विचार करें तो वैसे यह कठिन ही था। इस पार्श्वभूमि में हमने ७ दिन की चर्चा में अपने-अपने सैनिकों को पीछे लेने की बात पर एकमन बनाया। उस करार का ड्राफ्ट तैयार किया। मैंने उसे नरसिंहराव के पास भेजा, उस समय वे प्रधानमंत्री थे। उन्होंने इस करार के मसौदे को स्वीकृति दी। चीन के प्रधानमंत्री को भी यह ड्राफ्ट दिखाना था। चीन के डिफेंस मिनिस्टर ने मुझसे कहा कि हमारे प्रधानमंत्री को ये ड्राफ्ट दिखाने के लिए आप मेरे साथ चलो। मैंने कहा ठीक है। कहां जाना है, वैâसे जाना है? तो वह बोले प्रधानमंत्री विश्राम के लिए एक जगह गए हैं। कहां गए, यह बताया नहीं। कल सुबह हम जाएंगे, इतना ही बोले। ७:०० बजे तैयार रहना, ऐसा भी उन्होंने कहा। मैं ७:०० बजे तैयार हो गया। उनके आने पर हम निकल गए। हवाई अड्डे पर पहुंचे, डिफेंस के विमान में बैठे। कहां जा रहे हैं? यह उन्होंने उस समय भी नहीं बताया। ३ घंटे बाद प्लेन एक जगह उतरा। वह समुद्र तट पर स्थित एक प्रदेश था। वहां आबादी बिलकुल भी नहीं थी। खास ये है कि जहां विमान उतरा, वहां सिर्फ अच्छे बंगले थे। अंतत: मैंने पूछा कहां आए हैं हम? उन्होंने कहा कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो के जो मेंबर हैं, उनके विश्राम के लिए यह पूरा परिसर है। यहां बाकी आबादी नहीं है, सिर्फ सागर तट है। प्रधानमंत्री यहीं हैं। हम गए उन्हें मिले। हमारा ड्राफ्ट उन्हें दिखाया। साधारणत: ११:०० बजे तक यह सब निपटा लिया। बाद में उन्होंने हमें १:०० बजे भोजन के लिए आमंत्रित किया था। अभी ११:३० बजे थे और यह पूरी चर्चा खत्म हो चुकी थी। हम खाली हो चुके थे। भोजन के समय तक वहां कहीं जाने के लिए जगह भी नहीं थी। शहर नहीं, गांव नहीं। आस-पास कुछ भी नहीं। ३ घंटे वैâसे बिताएं। मैं यही सोच रहा था। उसी समय उनके प्रधानमंत्री ने सुझाव दिया, लेट्स वॉक! समुद्र तट पर हम सैर करेंगे। आकर्षक समुद्र तट है। मैंने मन में कहा यह गोल्डन अपॉर्चुनिटी है। इस निमित्त से मुझे उनसे बात करने का मौका मिलेगा। फिर हम उस तट पर चल रहे थे। घंटे-सवा घंटे मैं उनसे कई सवाल पूछता रहा। मुझसे वे एक ही बात कहते थे, मेरा पूरा निशाना अमेरिका और जापान है। यह ३० साल पहले की बात है। चीन को विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनाना है। ऐसा भी बार-बार कह रहे थे। अमेरिका के टक्कर में चीन खड़ा रह सकता है। यह दृश्य दुनिया को दिखाना है। अमेरिका के बाद अथवा उनके बराबरी में अथवा उनसे आगे जानेवाला देश चीन है। यह मुझे दिखाना है। यह उनका सपना था। वे यह सपने अभिमान के साथ बता रहे थे। यह चर्चा पूरी होने के बाद मैंने उनसे सीधा सवाल पूछा, आपकी पड़ोसी देशों के बारे में क्या नीति रहेगी? तो वे हंसे, बोले, हमारा टारगेट अमेरिका और जापान है। पड़ोसी देशों के बारे में फिलहाल हम विचार नहीं कर रहे हैं। देखते हैं, पांच-पच्चीस साल के बाद सोचेंगे। यह सुनते ही, मेरे दिमाग में आया कि कल हिंदुस्थान के सामने संकट आया तो, जो कि आज नहीं है। पच्चीस-तीस साल बाद आएगा।

यह संकट अब आया है…
हां, यह सच है। और आज क्या हुआ है… चीन आर्थिक दृष्टि से मजबूत हो गया है। अब उसका टारगेट हिंदुस्थान है। मतलब मोदी साहब ने वहां जाकर उनसे दोस्ती की। उन्हें यहां लाकर झूला झुलाया और हिंदुस्थानी कपड़े सिलाए। यह सब करके हमने कुछ बहुत बड़ा कर दिया है, ऐसा दृश्य ‘निर्माण’ किया। एक दूसरे के हाथों में हाथ डालकर, गले मिलकर दोनों देशों के बीच दोस्ती हो रही है, ऐसा दृश्य निर्माण किया लेकिन गले मिलना ठीक है हाथ मिलाना भी ठीक है, परंतु इस तरह से दो देशों में सभी समस्याएं हल नहीं होती हैं। यह अब हमारे ध्यान में आ गया है।

चीन और पाकिस्तान को लेकर जब-जब समस्या आती है, तब इस सरकार की ओर से हमेशा इंदिरा गांधी और पंडित नेहरू ही इस समस्या के जिम्मेदार हैं…
इस पर बोलेंगे ही, लेकिन उससे पहले मैं कहता हूं आज चीन ने क्या किया, भारत के आस-पास का दृश्य देखो। चीन ने भारत के इर्द-गिर्द स्थित हर देश को हमसे दूर किया। पाकिस्तान उनके साथ पहले ही गया। नेपाल जो हमेशा हमारे साथ था, वह अब दूर हो गया है। आपको याद होगा, मोदी साहब प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार नेपाल गए थे। पशुपतिनाथ मंदिर में जाकर पूजा की थी। पहले हिंदू राष्ट्र की हैसियत से उनका कौतुक भी किया था। हमारा मित्र होने के नाते! लेकिन अब नेपाल भी हमारे साथ नहीं है। वह चीन के साथ है। उसके पड़ोस में बांग्लादेश को देखो। बांग्लादेश के निर्माण के लिए हमने कितना कष्ट सहा था। चीन ने उसी बांग्लादेश से परसों करार किया है। इससे बांग्लादेश भी उसके साथ। मतलब पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और नीचे श्रीलंका ये चारों ओर से हमारे पड़ोसी हैं। इन सभी को चीन ने अपने पक्ष में कर लिया है। इसमें भारत विरोधी सुर हमें सुनने को मिल रहे हैं। ये बिगड़े हुए संबंध हाल के दौर का ‘योगदान’ है।

लेकिन अभी भी नेहरू के बाद इंदिरा गांधी को ही दोषी ठहराया जा रहा है।
हां, मैं इसी पर आ रहा हूं। अब यह नेहरू और इंदिरा गांधी को दोष देने संबंधित नीति अपना रहे हैं। जवाहरलाल नेहरू के कालखंड में प्रारंभिक दौर में चीन और हम में संघर्ष की हालत थी ही नहीं। वास्तव में चीन और हमारे बीच सहयोग व सौहार्द का संबंध था और जवाहरलाल नेहरू का दृष्टिकोण ये था कि आज नहीं तो कल चीन महासत्ता बननेवाला है। इसलिए उनसे सुसंवाद रखना जरूरी है। हमारा संघर्ष करना, दोनों के हित में नहीं है इसलिए उन्होंने संघर्ष की भूमिका नहीं अपनाई। इसके विपरीत नेहरू ने इन पड़ोसियों को साथ लेकर अपने पंचशील का तत्व ज्ञान दुनिया के सामने पेश किया। इन सभी को लेकर। इसलिए हमारे प्रदेश में एक प्रकार से शांति हमें देखने को मिली। उस दौर में दुर्भाग्य से आगे चीनी नेतृत्व में कुछ अलग भूमिका अपनाई और उससे हमारा और उनका संघर्ष हुआ। यह हिस्सा ही है, इसे नजरअंदाज करके नहीं चलेगा।

हमारी विदेश नीति चूक रही है, ऐसा आपको लगता है क्या?
जवाहरलाल नेहरू के दौर में, इंदिरा गांधी के दौर में अथवा अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में विदेश नीति में कुछ अंतर नहीं था और आज भी बहुत हद तक वही चल रहा है। सिर्फ बीच में मोदी साहब के आने के बाद उन्होंने कुछ अलग प्रयत्न करने का दृष्टिकोण अपनाया, ऐसा दिखाया था। लेकिन यह असल में टिका नहीं। आज विदेश विभाग देखा और उस विभाग का पूरा तंत्र देखा। हमारे राजदूत देखें कि जो पुराने हमारे रिश्ते थे, हम उससे अलग नीति अपनाते नहीं दिख रहे हैं।

चीन की समस्या पर राजनीति न करें, ऐसा आप कहते हैं। मतलब निश्चित तौर पर क्या?
मैंने क्या कहा? यह जो परसों संघर्ष हुआ उसमें निश्चित तौर पर चीन की भूमिका गलत थी। गलवान की जो घाटी है वह लद्दाख में अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है और लद्दाख हमारे दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है। लद्दाख, हिंदुस्थान के लिए कभी भी चिंता करने जैसा क्षेत्र नहीं था। वहां जो लोग हैं वे बुद्ध के विचारोंवाले शांतिप्रिय और हिंदुस्थान एवं संपूर्ण हिंदुस्थानियों के प्रति आस्था रखने जैसे हैं। यह अपना ही हिस्सा है। इससे पहले वहां कभी भी ऐसा विवाद नहीं भड़का था। पड़ोसी चीन है। वर्ष १९९३ में जब मैं चीन गया था, उस समय हमने चीन से करार किया था। हमने वह ड्राफ्ट बनाया था, जो मैंने पहले ही बताया। वह हमारे बीच चर्चा का मसौदा… उसके बाद पी.वी. नरसिंह राव ने खुद वहां जाकर उसे मंजूर करवाया। मसौदा क्या था? तो वह ऐसा था कि लद्दाख और इस पूरे परिसर में हमारे बीच संघर्ष नहीं चाहिए और कल किसी दूसरे मुद्दे पर मतभेद हुआ तो उस जगह दोनों देशों को बुलेट का इस्तेमाल नहीं करना है। बंदूक का इस्तेमाल नहीं करना है। तुमने देखा ही है। परसों सड़क को लेकर विवाद हुआ तब वहां बंदूक का इस्तेमाल नहीं किया गया। धक्का-मुक्की की। यह उस करार का हिस्सा था।

शस्त्र इस्तेमाल किए गए, इससे सैनिकों का नुकसान हुआ।
वह बाद में। दूसरे राउंड में। पहले राउंड में नहीं और उन शस्त्रों में उन्होंने डंडों का इस्तेमाल किया, बल्कि उनमें कीले लगाई थीं अथवा कुछ और… लेकिन फायरिंग नहीं हुई। वजह उस समय का वह करार था, वर्ष ९३ का। वह करार हमने भी पाला और उन्होंने भी कुछ हद तक पाला। अब हम वहां एक सड़क बना रहे हैं और वह सड़क मतलब डुरबुक से दौलत बेग ओल्डी… यह जो दौलत बेग ओल्डी का इलाका है, वह सियाचिन और लद्दाख के पास का क्षेत्र है। वहां जो सड़क हम बना रहे हैं, वह १०० ³ हमारी सीमा में है और उसके दूसरी तरफ चीन है। यह सड़क हम हमारी ही सीमा में बना रहे हैं इसलिए कुछ गलत नहीं है वहां जो चीन ने धक्का-मुक्की की हमारे लोगों से, वह उचित नहीं थी।

लेकिन इस पर उपाय क्या है? यह थम गया है, ऐसा लगता नहीं।
मेरा साफ मत ऐसा है कि यह समस्या जो है इसे हम सैन्य शक्ति से हल नहीं कर सकते हैं। यह समस्या हमें डिप्लोमेटिक स्टैंडर्ड से हल करनी पड़ेगी और इसलिए यह जो बार-बार कहा जा रहा है कि सेना है… सेना लाए हैं। सेना हम इस्तेमाल कर रहे हैं। ठीक है, सेना हम ले जा सकेंगे। सेना प्रमुख नरवणे और दूसरे लोगों का स्टेटमेंट मैंने सुना है। ठीक है समय आया तो वह हम करेंगे ही। उसकी क्या कीमत देनी होगी वह देंगे लेकिन आज उस सैन्य शक्ति से यह समस्या हल करने जैसे हालात नहीं है। इसका उल्टा परिणाम भी हमें भोगना पड़ेगा।

परंतु चीन अंदर घुस आया है और आरोप लग रहे हैं कि उसने हमारी जमीन कब्जे में ले ली है।
वह जमीन कोई आज कब्जे में नहीं ली है। उन्होंने आक्साई चीन में लगभग ४५ हजार स्क्वेयर किलोमीटर जमीन कब्जे में ले ली है और उसके बाद शैक्सगैम वैली के नाम से एक भाग है। शैक्सगैम वैली में ५००० वर्ग किलोमीटर जमीन उन्होंने कब्जे में ले ली है लेकिन यह आज नहीं ली, यह ली है जवाहरलाल नेहरू के कालखंड में। उन्होंने आक्रमण करके वह जमीन कब्जे में ली। इसलिए यह जो राहुल गांधी कह रहे हैं यह सही है लेकिन उसे ५० साल हो गए हैं। बल्कि उससे भी ज्यादा हो गए परंतु अब उन्होंने उस जगह अपने जबरदस्त सैनिक केंद्र खड़े कर लिए हैं। अब यह उनके द्वारा ५०-६० साल पहले ली गई ४५ हजार वर्ग किलोमीटर जमीन एक दिन में अथवा सरकार बदलने पर वापस लाई जा सकती है, यह कोई व्यवहारिक नहीं लगता है। आज उस दृष्टि से प्रयत्न किए जाने चाहिए लेकिन यह प्रयत्न नेगोसिएशन से होना चाहिए। दुनिया के अन्य देशों के मार्फत चीन पर दबाव लाकर यह समस्या हल की जानी चाहिए।

हमारे २० जवानों की हत्या चीन ने हमारी सीमा में घुसकर की है। यह चिंता का विषय है।
इस बारे में हमें निश्चित तौर पर सशक्त कदम उठाने पड़ेंगे और हमारे द्वारा वो कदम समय-समय पर उठाने की आवश्यकता होती है। जो कि इन परिस्थितियों में उठाने में कदाचित देर कर दिया गया कि क्या, ऐसा लगता है। मैं कहता हूं कि इसमें राजनीति न लाएं। इसकी वजह एक ही है कि यह समस्या इतनी गंभीर है। और कल हम कहेंगे की सेना भेजें.. हमला करें। कर सकते हैं लेकिन उस हमले का जो उत्तर दिया जाएगा और उसकी जो कीमत पूरे देश को चुकानी पड़ेगी उसे भी नजरअंदाज न करें… और इस वजह से हमला जरूरी हुआ तो विचार किया जा सकता है लेकिन हमला करने की बजाय नेगोसिएशन के माध्यम से डिप्लोमैटिक चैनल से दुनिया व अन्य देशों का दबाव लाकर, यूनाइटेड नेशन जैसी संस्था का उन पर दबाव लाकर, यदि इसमें से कुछ हल निकलता होगा तो यह पहले करना बुद्धिमानी होगी।

क्रमश: