" /> वो खूनी पटकथा!

वो खूनी पटकथा!

१९९१, नेपाल से राजशाही की विदाई की संवैधानिक शुरुआत का वर्ष था, तो नेपाल में चीन की सियासी घुसपैठ के एक दीर्धकालीन प्लान ‘बी’ के आरंभ का साल भी। यह वही दौर था जब हिंदुस्थान में एक फिल्म ‘खलनायक’ की काल्पनिक पटकथा लिखी जा रही थी और उसी वक्त हमारा एक साम्राज्यवादी पड़ोसी, नेपाल में खुद के अनुकुल सियासत की ‘असल’ स्क्रिप्ट लिख रहा था। जिससे हम तो क्या, शायद खुद नेपाल भी काफी हद तक अनजान था। बस, उस पड़ोसी को शिद्दत से तलाश थी तो सीमा पार नेपाल में उसके प्लान को अंजाम तक पहुंचानेवाले उपयुक्त किरदारों की। अपनी साम्यवादी सोच के चलते उसने हिंदुस्थान के खिलाफ नेपाल में एक अदद ‘खलनायक’ खड़ा करने की जमीन बनाना तय कर रखा था और वो उसी के अनुरूप अब काम भी कर रहा था।

नेपाल में १९४८ में ‘गवर्नमेंट ऑफ नेपाल एक्ट’ लाया गया था, जिसमें कुछ लोकतांत्रिक तत्व तो थे पर राणा शाही में कोई कटौती नहीं थी। फिर १९५१ में राजा त्रिभुवन के दौर की जनक्रांति ने नेपाल को एक अंतरिम कानून दिया, जिससे राणा शाही का अंत तो हो गया पर राजा के अधिकार और सुदृढ़ हो गए। १९५९ में उस अंतरिम कानून के विस्तार से बने संविधान में भी द्विसदनीय संसद के अधिकांश अधिकार राजा के ही अधीन बने रहे। जिसमें राजा ही सीनेट के आधे सदस्य नियुक्त कर सकता था और विशेष स्थितियों में संसद को भंग करने का अधिकार भी रखता था। नेपाल के राजनैतिक दल इनमें बदलाव चाहते थे। लेकिन १९६२ में तत्कालीन राजा महेंद्र ने उनकी इच्छा से उलट नेपाल पर एक नया संविधान थोप दिया और राजनीतिक दलों को अधिकार देने की बजाए उन्हें भंग ही कर दिया गया। देश में पंचायत प्रणाली कार्यान्वित कर अधिकाधिक अधिकार राजा के हाथों में केंद्रित हो गए। अब राजा अपनी इच्छानुसार संविधान के प्रावधानों में फेरबदल भी कर सकता था और उसे आपात परिस्थितियों में निलंबित भी।
१९६२ वाले उस जनतंत्र विरोधी संविधान ने नेपाल के सभी राजनैतिक दलों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आंदोलन हुए, राजमहल का घेराव हुआ और अंतत: १९९० में एक नया लोकतांत्रिक संविधान घोषित हो गया। राजनीतिक दलों पर लंबे समय से लगी रोक हट गई। साथ ही संसद को प्रतिनिधि संस्था के रूप में बहाल करते हुए राजा के अधिकार भी सीमित कर दिए गए। १९९० के उस नए संविधान ने नेपाल को एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर अग्रसर तो किया, तब भी उसकी तमाम कमियां उसे सर्वमान्य नहीं बना सकीं। खैर…।
एक दशक का ‘जन युद्ध’
१९९० के दशक से पहले तक नेपाल की संसदीय राजनीति में माओवादियों की दखल नहीं थी, परंतु १९९० के बाद यूएमसी ने संसदीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना शुरू किया और तब नेपाल के कम्यूनिस्ट भी संसदीय राजनीति में उतर गए। उस वक्त नेपाली माओवादियों ने देश की मुख्य धारा की राजनीतिक पार्टियां और कम्युनिस्टों के साथ लोकतंत्र की स्थापना के लिए संघर्ष तो किया था पर राजशाही के खिलाफ जनांदोलन की सार्थक कमान संभालने के नाते सत्ता के सूत्र प्रमुख राजनीतिक दल नेपाली कांग्रेस के हाथों में ही थे। चीन चाहता तो था कि नेपाल के कम्युनिस्ट किसी तरह नेपाल की संसदीय राजनीति का मजबूत हिस्सा बने रहें, ताकि वो राजनीतिक स्तर पर उन्हें अपना मोहरा बना सके। लेकिन निकट भविष्य में सत्ता के सूत्र नेपाली कांग्रेस के हाथ से निकलकर कम्यूनिस्टों के हाथ में आने के आसार उस वक्त तो उसे नजर नहीं आ रहे थे। उस पर अभी सत्ता के काफी अधिकार राजा के ही अधीन थे। नेपाल के नए-नए संवैधानिक राजतंत्र में अब नेपाली कांग्रेस के कृष्ण प्रसाद भट्टराई कार्यवाहक बन चुके थे। उनके छोटे से कार्यकाल के दौरान हुए चुनाव में नेपाली कांग्रेस के ही गिरिजा प्रसाद कोइराला ने प्रधानमंत्री पद का पदभार संभाल लिया था। भट्टराई और कोइराला दोनों के ही हिंदुस्थान से संबंध सहज थे। भट्टराई की तो शिक्षा ही बनारस हिंदू विश्व विद्यालय से हुई थी और उस पर हिंदुस्थान के साथ नेपाली कांग्रेस के रिश्ते शुरुआत से ही प्रगाढ़ थे। लिहाजा, नेपाली कांग्रेस पर दांव खेलकर चीन के मंसूबे पूरे नहीं होने थे। उसे नेपाल में खुद की विचारधारा के अनुकूल किरदार चाहिए थे। अंततः उसने नेपाल में माओवादी आंदोलन खड़ा करने की जमीन बनवाई और नेपाली कम्युनिस्टों को संवैधानिक व्यवस्था से थोड़ा अलग करने की रणनीति के तहत हथियारबंद माओवाद में झोंक दिया। उस दिन का दिन है और आज का दिन, चीनी कम्युनिस्ट नेताओं को चीन हमेशा ट्रेनिंग देता रहता है। कभी वीडियो कॉन्प्रâेंस के जरिए तो कभी चीन बुलाकर प्रत्यक्ष वार्ता के जरिए। चीनी कम्युनिस्ट नेता, नेपाली कम्युनिस्ट नेताओं को बाकायदा ट्रेनिंग देते रहते हैं। बार-बार, लगातार नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी, एक पराए देश की पार्टी से क्या ट्रेनिंग लेती होगी? इस सवाल का जवाब शायद आज तक नेपाल की जनता को भी नहीं मिल सका है, तभी तो नेपाल में इसे लेकर हमेशा सवाल उठते रहते हैं कि आखिर यह ट्रेनिंग क्यों है? और किसलिए?
शाही परिवार का नरसंहार
१९९० के संवैधानिक संशोधन में राजा के अधिकार सीमित करने के बावजूद नेपाल में राजघराने का ही राज था। राजा बीरेंद्र और उनका परिवार अब भी वहां के लोकप्रिय शासक थे। यही बात कइयों को खल रही थी, देश के भीतर भी और बाहर भी। एक रणनीति के तहत नेपाल को पहले ही एक ‘आंदोलन’ में धकेल दिया गया था। १९९६ से शुरू हुआ माओवादियों का वह ‘जन युद्ध’ हिंंसक होता चला जा रहा था। हजारों जानें चली गई थीं। तकरीबन एक दशक तक चले उस ‘जन युद्ध’ के दरम्यान ही किसी ने नेपाल के राजघराने को मिटाने की खूनी पटकथा भी रच दी। २००१ में शाही परिवार के ९ सदस्यों की हत्या कर दी गई। राजा, रानी, राजकुमार और राजकुमारियों के उस सामूहिक हत्याकांड का खलनायक बताया गया राजघराने के ही चिराग क्राउन प्रिंस दीपेंद्र बीर बिक्रम शाह को। कहा गया कि युवराज दीपेंद्र ने शराब के नशे में अपनी मां, पिता और भाई-बहन सहित परिवार के ८ सदस्यों की हत्याकर खुद को भी गोली मार ली थी। क्यों? तो परिवार उनकी पसंद की लड़की से उनकी शादी कराने को राजी नहीं था। ३ दिन बाद इलाज के दौरान दीपेंद्र की भी मौत हो गई। इस नरसंहार के बाद हुई उच्चस्तरीय जांच में भी इसी कहानी पर मुहर लगाई गई। हालांकि नेपाल की जनता को कभी इस पर विश्वास नहीं हुआ। कहानी विश्वास करने लायक थी भी नहीं। सभी जानते थे कि इसमें कोई बड़ा षड्यंत्र है पर क्या और किसका? इसे जानने के लिए कई रिसर्च हुईं, लोग तमाम अलग-अलग नतीजों पर पहुंचे, परंतु सच्चाई से पर्दा कभी नहीं हट सका। अलबत्ता, इससे कम-से-कम एक तस्वीर तो साफ हो ही गई कि उस नरसंहार के पीछे जो कोई भी था, वो बहुत ही प्रभावशाली था, ताकतवर था और शातिर भी। साथ ही उसका उद्देश्य भी बहुत बड़ा था। इसी बीच इस हत्याकांड के लिए राजमहल परिसर में तैनात खतरनाक हथियारों से लैस सुरक्षा गार्डों पर भी आरोप लगे तो एक पत्रकार ने राजमहल की एक महिला कर्मचारी के हवाले से यह तक लिख दिया कि दीपेंद्र के भेष में दो नकाबपोश लोगों ने उस रात गोलियां बरसार्इं थीं। वे दो नकाबपोश कौन थे? यह रहस्य आज तक रहस्य ही है।
नरसंहार की गहरी साजिश
शाही परिवार के नरसंहार के ८ साल बाद यानी २००९ में तुल बहादुर शेरचन नामक एक शख्स ने सामने आकर बेहद कमजोर-सा दावा किया कि उस हत्याकांड का जिम्मेदार वह खुद था। शायद उसका इस्तेमाल किसी ने हत्या के निष्कर्ष को भटकाने के मकसद से किया था। इसी बीच सवाल यह भी उठे कि पूरी घटना के दौरान राजमहल के एडीसी अपने कमरे से बाहर क्यों नहीं निकले? नेपाल के राजमहल के सुरक्षाकर्मी गोलियां चलने की आवाजों के बावजूद वहां क्यों नहीं पहुंचे? इत्यादि, इत्यादि… पर इन सबके बीच जो सबसे दिलचस्प रहा वो यह कि हत्याकांड के ९ साल बाद नेपाल के पूर्व पैलेस मिलिट्री सेक्रेट्री जनरल बिबेक शाह ने एक किताब लिखी ‘माइले देखेको दरबार’ (राजमहल, जैसा मैंने देखा) और दावा किया कि उस निर्मम हत्याकांड के पीछे संभवत: हिंदुस्थान का हाथ था। तुरंत शाह की हां में हां मिलाते हुए वरिष्ठ नेपाली कम्युनिस्ट नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड ने भी दावा कर दिया कि इस हत्याकांड की साजिश ‘रॉ’ ने रची थी। ये वही प्रचंड हैं, जिनका नाम चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से ट्रेनिंग लेनेवाले नेपाली नेताओं में प्रमुखता से आता है। ये वही नेपाली नेता हैं, जो कभी १९९६ के माओवादी आंदोलन के मुखिया रहे थे और जो भविष्य में नेपाल के प्रधानमंत्री भी बननेवाले थे। खैर, भारत सरकार ने तुरंत ऐसे सभी दावों को खारिज कर दिया। इसी बीच हत्याकांड के दौर में नेपाल के विदेश मंत्री रहे चक्र बासटोला का तर्क आया कि हत्याकांड के पीछे जनभावना भड़काकर पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला को भी मारने की साजिश थी। चक्र के मुताबिक कोइराला की कार पर हमला भी हुआ था। चक्र का वह दावा दर्शाता है कि साजिशकर्ताओं ने हिंदुस्थान से सहज सियासी संबंध बनाए रखनेवालों पर भी निशाना साध रखा था। कुल मिलाकर, नरसंहार की पटकथा में ड्रामा कुछ इस कदर रचा गया था कि जिससे एक ओर तो शक की सुई हिंदुस्थान पर जाकर ठहर जाए और दूसरी ओर नेपाल में हिंदुस्थान विरोध का एजेंडा चलानेवाले कुछ प्यादों की पहुंच उच्च संवैधानिक पदों तक आसान हो जाए। ताकि वे नेपालियों के मन में हिंदुस्थान के प्रति इतनी नफरत पैदा कर दें कि आम नेपाली खुद-ब-खुद चीन की गोद में जाकर बैठने को तैयार हो जाए।
माना जा सकता है कि आज चीन हिंदुस्थान-नेपाल के रिश्तों में दरार गहरी करने के अपने मंसूबों में काफी हद तक कामयाब रहा है। उन्हीं मंसूबों में जो उसने १९९० के दशक में रचे थे। इस हत्याकांड में चीनी कम्युनिस्ट शामिल हैं या नहीं? यह तो आज तक पता नहीं चल सका है, परंतु जिस तरह के दावे नेपाल के पूर्व पैलेस मिलिट्री सेक्रेट्री जनरल, नेपाली कम्युनिस्ट नेता प्रचंड और उस दौर के नेपाली विदेश मंत्री ने किए हैं उनसे साफ है कि उस कांड का असल खलनायक भी वही है, जो नेपाल में राजतंत्र और लोकतंत्र दोनों की हत्या करना चाहता है और जो एक तीर से कई निशाने साधने का हुनर भी रखता है। उसने न केवल माओवादियों के लिए नेपाल की सत्ता का रास्ता साफ कराया, बल्कि हिंदुस्थान से संबंध बिगाड़ने का काम भी। लिहाजा, वो खूनी पटकथा किसने लिखी और उसके असल किरदार कौन थे, इस पर अब मंथन करना बेमानी ही है क्योंकि अब तक यह गुत्थी काफी हद तक सुलझ भी चुकी है और उलझ भी।
(क्रमश:)
कल पढ़े – राजा ज्ञानेंद्र का ‘राज’!