" /> काशी और मथुरा में भी धार्मिक सद्भाव का दीपोत्सव

काशी और मथुरा में भी धार्मिक सद्भाव का दीपोत्सव

जन्माष्टमी सिर पर है और मथुरा के हजारों मुस्लिम कारीगरों को दम लेने की भी फुरसत नहीं है। इन्हीं में हैं देवी-देवताओं के मुकुट बनाने में विशेषज्ञ इकराम। इकराम जैसे सैकड़ों मुस्लिम कारीगर इन दिनों भगवान कृष्ण एवं अन्य देवी-देवताओं के रत्नजड़ित परिधान एवं अन्य सामग्री बनाने के काम में रात-दिन लगे हुए हैं। काशी में बेचन यादव बरसों से बगैर मुसलमानों को किसी उङ्का के हिंदू मोहल्लों का गढ़ समझी जानेवाली चौखंभा की अनार वाली मस्जिद पर मुतवल्ली की जिम्मेदारी निभा रहे हैं और श्रावण माह में बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने आए कांवड़ियों का पैर पखारने में लगे हैं मुस्लिम युवक। अयोध्या में राम मंदिर का भूमिपूजन अवसर है मंदिर-मस्जिद विवाद का केंद्र रहे इन दोनों नगरों में भी सांप्रदायिक सौहार्द व मेल-मिलाप के प्रदर्शन का। जाहिर है, कृष्ण की नगरी मथुरा और शिव की नगरी काशी में भी उसी तरह आनंदोत्सव की दिवाली मनाई जा रही है, जिस तरह राम की नगरी अयोध्या में।
एकता का ताना-बाना
काशी और मथुरा का आपस में वैसा ही नाता है, जैसा वहां बहने वाली गंगा और जमुना नदियों का। काशी विश्वनाथ मंदिर के विद्वान महंत डॉ. कुलपति तिवारी बताते हैं, ‘गंगा-जमुनी एकता का प्रतीक है काशी। यहां मंदिर के घंटे एवं मस्जिद के अजान एक साथ गुंजायमान रहते है। ‘गंगा तीरे बधईयां’ बजाने के साथ विश्वनाथ मंदिर के नौबतखाने में शहनाई के सुरों की साधना करने वाले भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खां का तो पूरी दुनिया ने लोहा माना। यह खां साहब का काशी प्रेम ही था कि अपने अंत समय में उन्होंने काशी त्यागने से मना कर दिया, यह कहकर कि ‘बाबा विश्वनाथ की नगरी ही मेरा काबा है।’ काशी की ही आध्यात्मिक ऊर्जा के कारण ही मुगल शाहजादा दारा शिकोह बाबा विश्वनाथ की नगरी में संस्कृत की शिक्षा प्राप्त करने के लिए आया।’
एकता और भाईचारे से रहते हुए काशी और मथुरा के हिंदू और मुसलमान वैसे ही हैं, जैसे खुद साड़ी, हस्तशिल्प, बर्तन, गहने, खिलौने, पगड़ी और देव परिधानों का ताना-बाना, जिन्हें अधिकतर मुसलमान ही बनाते हैं। बनारसी साड़ियों के ताने-बाने में जिस तरह काशी के हिंदू और मुसलमान दोनों की मेहनत साझी है, उसी तरह देवी-देवताओं के लिए आकर्षक परिधान एवं अन्य सामग्री के निर्माण में मथुरा, वृंदावन व गोवर्धन क्षेत्र के मुस्लिम कारीगरों की। यहां और आस-पास के जिलों में विजयादशमी पर जलनेवाला रावण का पुतला भी मथुरा के पास रहनेवाले जफर अली का परिवार ही तीन पीढ़ियों से बना रहा है। इकराम बताते हैं, ‘देश में कहीं भी दंगे हों, हमारे संबंधों में कभी तनाव नहीं आता।’
प्रेम के देवता कृष्ण की धरती के लिए सांप्रदायिक सहयोग का यह माहौल कोई नई बात नहीं। नफरत की आग में पड़ोसी जिले भी जब कई बार झुलसे हैं मथुरा देश के सांप्रदायिक सद्भाव के लिए हौसला बनकर खड़ा हो गया है। हिंदुओं और मुसलमानों के बड़े त्योहार जब एक साथ पड़ रहे हों मथुरा में पंडित और मौलवी मिलकर आम सहमति से शोभायात्राओं और नमाजों का वक्त तय करते आए हैं। अभी कुछ समय पहले यहीं के मुस्लिम बुजुर्गवार लियाकत अली ने मुखाग्नि देकर अपनी हिंदू पत्नी कृपा यादव को अंतिम विदाई दी है और पं. होतीलाल शर्मा विश्व शांति को लेकर करांची और पाकिस्तान के दूसरे शहरों की दौड़ लगा आए हैं।
भगवान को शहनाई से जगाते थे उस्ताद बिस्मिल्ला खां
काशी वह जगह है, जहां विश्वनाथ मंदिर के सिंहद्वार के सन्मुख नौबतखाना बनवाया था अजीमुल मुल्कअली इब्राहिम खां ने और पंचगंगा घाट पर भगवान बालाजी को अपनी शहनाई से जगाया करते थे उस्ताद बिस्मिल्ला खां। काशी वह शहर है, जहां होली मिलन और ईद मिलन में ज्यादा फर्क नहीं होता। यह वह शहर है, जहां कई मस्जिदों में अजान देकर जगाने वाले पेश-इमाम को जगाने की जिम्मेदारी हिंदू युवकों ने संभाली हुई है। विश्वनाथ मंदिर में आज भी एक बड़ी पूजा मुसलमानों की तरफ से होती है, और मोहर्रम के जुलूस में हिंदुओं की तरफ से बाजों के साथ अगवानी करते हैं हिंदू वाद्यकार। आज तक आपको यहां कई मुसलमान, खासकर शियाओं में ऐसे मिल जाएंगे, जिनके घरों में विशुद्ध शाकाहारी भोजन ही बनता है। यहां कुछ मुस्लिम घरों में आपको मंदिर और हिंदू घरों में मजारों के दर्शन भी हो जाएंगे। यह वह नगर है, जहां की दालमंडी की तवायफों तक में एक जमाने में रिवाज होता था कि उनके यहां लड़का पैदा होता तो उसे हिंदू और लड़की पैदा होती तो मुसलमान नाम देते।
काशी वह नगर है, शहंशाह अकबर ने अपने ‘दीन-ए-इलाही’ धर्म की परिकल्पना जिसके सांप्रदायिक सद्भाव को देखकर की थी। बनारस में स्फटिक और धातुओं के जो ताबीज बनते हैं उन ताबीजों पर संस्कृत के श्लोक उकेरने वाला मुसलमान कारीगर है, और आलमगीरी धरहरा मस्जिद में मुसलमान भाइयों के रोजे खुलवाने वाले हिंदू नौजवान। यहां नमाजें गंगा में वजू करके अदा की जाती हैं और जकात के दान के साथ मोहर्रम के ताजिये ठंडे क‌िए जाते हैं गंगा के घाटों पर। चंदन शहीद, नूहदी शहीद, हजरत शाह तैयब, याकूब शहीद जैसे ‘बलियों’ और ‘कामिलों’ की मजारों और समाधियों पर उर्स के मेलों में तो हिंदू आज भी उमड़ पड़ते हैं। मोहर्रम पर फातमान पर एकत्र होने वालों में हिंदू भी अच्छी तादाद में होते हैं। इस महीने ‘जुल्जनाह’ (इमाम हुसैन का घोड़ा) के जुलूस में दुलदुल को दूध पिलाने वालों और नजराना चढ़ाने वालों में हजारों हाथ हिंदुओं के भी हुआ करते हैं।
डॉ. कुलपति तिवारी बताते हैं, ‘श्रावण माह में बाबा भोले का दर्शन करने आए कांवड़ियों का पैर पखारते और पानी पिलाते मुसलमान भाइयों का दिखना काशी में आम नजारा है।’ रामनवमी पर श्रीराम की आरती उतारती, गुरु पूर्णिमा पर गुरु का आशीर्वाद लेती और दशाश्वमेध की ‘गंगा पूजा’ के दर्शन करती बुर्का ओढ़े महिलाएं काशी में सहजता से मिल जाएंगी। बनारस के कई मुस्लिम लड़के ऐसे भी देखे हैं, जो हर रात निकलते हैं शहर की गलियों में गाय, सांड़, कबूतर, कुत्ते और गधे जैसे बेबस जानवरों को खोजने के लिए, ताकि उनके जख्मों पर मरहम लगा सकें। मिर्जा गालिब की ‘चिराग-ए-दयार’ का ‘देवालयस्य दीपा’ नाम से संस्कृत अनुवाद करने वाली डॉ. नाहिद आबिदी-जिन्हें संस्कृत भाषा में योगदान के लिए ‘पद्मश्री’ मिला है-काशी विद्यापीठ में व्याख्याता हैं, डॉ. फिरोज खान काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के धर्म विज्ञान विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर और डॉ. ऋषि शर्मा वहीं के उर्दू विभाग में ११ वर्षों से उर्दू के प्रोफेसर। काशी हिंदुओं की धार्मिक राजधानी ही नहीं, सभी धर्मों की एकता और सामाजिक सौमनस्य की भी राजधानी है।