" /> कानून का ही राज!

कानून का ही राज!

मुंबई के साकीनाका परिसर में एक महिला के साथ बलात्कार किया गया। एक नराधम ने उस महिला पर बर्बरतापूर्वक हमला करके उसे मार डाला। इस घटना से महाराष्ट्र की संस्कृति को ठेस पहुंची है। पुलिस व डॉक्टरों ने उस बदनसीब महिला को बचाने की कोशिश की, परंतु पीड़िता की मौत हो गई। बलात्कार करनेवाला नराधम उत्तर प्रदेश के जौनपुर का कोई मोहन चौहान है। उस नराधम को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है व उसके खिलाफ फास्ट ट्रैक कोर्ट में मामला चलाकर उसे जल्द से जल्द फांसी पर लटकाया जाएगा, ऐसी घोषणा मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने की है। महाराष्ट्र में कानून का ही राज है इसलिए ऐसे निंदनीय कृत्य करनेवाले नराधम कानून के शिकंजे से नहीं छूटेंगे। फिर भी इस पूरे प्रकरण को लेकर राज्य का विपक्ष हंगामा कर रहा है। राज्य में कानून का राज नहीं है, कानून का डर नहीं है, ऐसी बातें विरोधी कह रहे हैं। साकीनाका के पहले अमरावती, पुणे, नागपुर में ऐसी घटनाएं घटी हैं। हर घटना विचलित करने और आक्रोश बढ़ानेवाली है। मुख्यत: महाराष्ट्र की परंपरा को कलंकित करनेवाली है, जिसके विरोध में लोगों के मन में आक्रोश का भड़कना स्वाभाविक ही है। ऐसी घटना घटने पर तत्काल माहौल तनावपूर्ण हो जाता है, मन शून्य हो जाता है, फिर भी जीवन चलता ही रहता है। भारतीय जनता पार्टी ने इस प्रकरण में विपक्ष की जो कुछ भी भूमिका है, उसे अच्छे से निभाया है। मुंबई, महाराष्ट्र में महिला वैâसे सुरक्षित नहीं है, ऐसा वे अब चिल्लाकर कह रहे हैं। साकीनाका की घटना से सभी को आघात पहुंचा है फिर भी मुंबई महिलाओं के लिए दुनिया का अत्यंत सुरक्षित शहर है। इस पर किसी तरह की दो राय होने की कोई वजह नहीं है। साकीनाका जैसी घटनाएं एक भयंकर विकृति के कारण घटती हैं और दुनिया के किसी भी कोने में यह विकृति उफान मार सकती है। हाथरस बलात्कार और हत्या प्रकरण की तुलना साकीनाका घटना से की जा रही है, जो कि पूरी तरह गलत है। उत्तर प्रदेश के हाथरस में उस लड़की से बलात्कार करके मार डालनेवालों को सत्ताधारियों का प्रश्रय था व आरोपियों को गिरफ्तार करने में आनाकानी की जा रही थी। उस पीड़ित लड़की का शव सरकार ने जल्दबाजी में जलाकर सबूत ही नष्ट कर दिया और उसके परिजनों तक किसी को पहुंचने नहीं दिया जा रहा था। हाथरस प्रकरण में ‘बलात्कार हुआ ही नहीं!’ ऐसा योगी की सरकार कह रही थी, जो कि अंतत: झूठा साबित हुआ। राष्ट्रीय महिला आयोग की टीम साकीनाका प्रकरण में जिस तत्परता से मुंबई पहुंची, वह तत्परता इस आयोग ने हाथरस प्रकरण में नहीं दिखाई थी। ‘कठुआ’ बलात्कार प्रकरण में भी बलात्कारियों का समर्थन करने के लिए एक राजनीतिक पार्टी के लोग सड़क पर उतरे थे। कानून का डर नहीं है, ऐसा कहना ही है तो इन ऐसे प्रकरणों के लिए कह सकते हैं। साकीनाका प्रकरण में पुलिस ने १० मिनट में आरोपी को पकड़कर कानून का डर क्या होता है, यह दिखा दिया। असल में जो विकृत नराधम होते हैं, उन्हें कानून वगैरह कुछ समझ नहीं आता इसलिए यह विकृति जहां दिखे, वहां उसे कुचल देना चाहिए, यही उपाय उचित सिद्ध होता है। साकीनाका की पीड़ित महिला की दो बेटियां हैं। वो अनाथ हो गर्इं। उन बच्चियों की शिक्षा और आगे की जिम्मेदारी राज्य सरकार ले रही है, ऐसी घोषणा एकनाथ शिंदे ने की है। ये राज्य सरकार की संवेदनशीलता का लक्षण नहीं है क्या? राज्य में कानून का डर है ही व राज्य का मन भी है। बीते कुछ दिनों में महाराष्ट्र में ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं, इस पर नियंत्रण रखना कानून के साथ-साथ समाज का भी काम है। साकीनाका प्रकरण की जांच गहराई में जाकर करें तो मुंबई में ‘जौनपुर’ पैटर्न ने कितनी गंदगी कर रखी है, यह पता चल जाएगा। वारदात वाली हर जगह पुलिस का उपस्थित रहना संभव नहीं है, ऐसा पुलिस आयुक्त हेमंत नगराले ने कहा है। इस पर कुछ लोगों ने विवाद खड़ा कर दिया है। खासकर राष्ट्रीय महिला आयोग ने पुलिस के बयान पर नाराजगी जताई है। मुंबई की पुलिस ने ऐसा क्या गलत कह दिया? लखनऊ, पटना, कोलकाता, चेन्नई, बंगलुरू के पुलिस आयुक्तों की राय भी हेमंत नगराले जैसी ही होगी और यह सही है। मुंबई पुलिस सतर्क और सक्षम है। पूरे समाज का अपराधीकरण नहीं हुआ है। पुलिस व समाज को एक-दूसरे पर विश्वास है। जब तक यह है, तब तक कानून का ही राज रहेगा। मुंबई सहित महाराष्ट्र में इस तरह से कानून का ही राज है। विपक्ष के लोग साकीनाका बलात्कार प्रकरण को लेकर कितनी भी धूल उड़ाएं फिर भी कानून के राज को ठेस नहीं पहुंचेगी। इस प्रकरण में ऐसा नजर आता है कि पीड़िता व आरोपी की पहले से जान-पहचान थी। उससे दोस्ती हुई और उसी वजह से ‘घात’ हुआ। जिसने घात किया, उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। इसलिए अब इस प्रकरण को न्यायालय के जिम्मे छोड़ देना चाहिए। विपक्ष के नेताओं के कहे अनुसार उस नराधम को फांसी की सजा होगी क्योंकि आरोपी के बचाव अथवा समर्थन के लिए कोई सड़क पर नहीं उतरा है, जैसे कठुआ व हाथरस प्रकरण में हुआ था। किस मुद्दे व प्रकरण पर राजनीति करनी है, इसका भान रखना ही चाहिए। साकीनाका प्रकरण पर आंखों में आंसू आ जाएं, यह मन की संवेदनशीलता है। परंतु मगरमच्छी आंसू निकलने लगे तो डर लगता है। प्रकरण की गंभीरता नष्ट हो जाती है। पुलिस को अपना काम करने दें। इसकी जांच पुलिस को ही करनी होगी, फिर भी साकीनाका प्रकरण की फाइल भी किसी को ईडी आदि को सौंपनी होगी तो उन्हें कौन रोकेगा? जो चाहे, वो करने दो!