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ये तो रेप नहीं है, २१ साल बाद प्रेमी हुआ बलात्कार के कलंक से मुक्त

महिलाओं के साथ यौन हिंसा की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। महिलाएं खासकर बच्चियां अपनों के बीच ही लैंगिक शोषण का शिकार हो रही हैं। लेकिन ये भी उतना ही सच है कि बलात्कार के कई मामले स्वार्थवश या बदले की भावना से दर्ज कराए जाते हैं। नौकरी, शादी या अन्य झांसों में फंसकर महिलाएं प्रेम संबंधों में सारी हदें पार कर जाती हैं। कई साल तक संबंध रखने के बाद अचानक कोई महिला या युवती अपने तथाकथित प्रेमी के खिलाफ प्यार में धोखा देने का आरोप लगाती है और पुलिस में बलात्कार की शिकायत दर्ज करा देती हैं। बलात्कार के ऐसे मामलों को बलात्कार माना जाए या स्वेच्छा से सेक्स संबंध कहा जाए, इस पर वर्षों से बहस चल रही है। २१ साल पहले प्रेम संबंध टूटने के कारण प्रेमिका द्वारा लगाए गए ऐसे ही एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अब अपना फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने इसे बलात्कार मानने से इंकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला प्रेम संबंधों में हद पार करनेवाली महिलाओं-युवतियों के लिए सतर्क रहने की चेतावनी है।
झारखंड की एक महिला द्वारा अपने पूर्व प्रेमी पर लगाए गए रेप के आरोप को देश की सर्वोच्च न्यायालय ने बलात्कार मानने से इंकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह बलात्कार तो नहीं है, बल्कि दोनों एक-दूसरे के प्रेम में पागल थे। महिला ने २१ साल पहले अपने तथाकथित प्रेमी के खिलाफ बलात्कार और धोखाधड़ी का आरोप लगाया था, जिसे ट्रायल कोर्ट और झारखंड हाई कोर्ट ने स्वीकारते हुए शख्स को दोषी ठहरा दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए शख्स को रेप के आरोप से मुक्त कर दिया कि कोई महिला चाकू की नोक पर यौन शोषण किए जाने के बाद आरोपी को प्रेम पत्र नहीं लिखेगी और उसके साथ चार सालों तक लिव-इन-रिलेशनशिप में नहीं रहेगी।
झारखंड निवासी शख्स के खिलाफ उसकी तथाकथित प्रेमिका द्वारा वर्ष १९९९ में बलात्कार और अवैध प्रसव कराने का आरोप लगाया गया। महिला ने कहा था कि आरोपी ने प्यार और शादी का झांसा देकर उसे ४ साल तक अपनी हवस का शिकार बनाया था। एक ट्रायल कोर्ट ने महिला की शिकायत पर प्रेमी को दोषी माना और सात साल जेल की सजा सुना दी थी। हालांकि प्रेमी ने प्रेमिका द्वारा भेजे गए प्रेम पत्र भी दिखाए थे, बावजूद इसके ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को झारखंड हाई कोर्ट ने रद्द करने से इंकार कर दिया था। जिसके बाद बलात्कार के दोषी करार दिए गए प्रेमी ने सुप्रीम कोर्ट में न्याय की गुहार लगाई थी। सोमवार को जस्टिस आरएफ नरीमन की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया कि झारखंड हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों, प्रेम पत्रों और उनकी तस्वीरों को नजरअंदाज कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने महिला की गवाही को अस्वीकार कर दिया, जिसमें उसने कहा था कि शादी का वादा होने या डर की वजह से उसने यौन संबंध बनाए थे। फैसला सुनाते हुए जस्टिस नवीन सिन्हा ने कहा कि हमें यह निष्कर्ष निकालने में कोई संकोच नहीं है कि ना सिर्फ लड़की की सहमति थी बल्कि वह जो चुना उसके प्रति वह सचेत भी थीं। ऐसा उन्होंने इसलिए किया, क्योंकि वह लड़के से बहुत प्यार करती थीं। उन्होंने अपने स्वेच्छा से अपना शरीर उसे सौंपा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों एक-दूसरे के प्रेम में पागल थे। महिला लड़के के घर में भी रही। हमारी नजर में चार साल साथ रहने के बाद पुरुष की शादी से ठीक सात दिन पहले एफआईआर दर्ज कराने से महिला की शिकायत पर गंभीर शंका पैदा होती है।
महिला ने एफआईआर में कहा था कि आरोपी ने उससे शादी करने का वादा किया था इसलिए वो दोनों पति-पत्नी की तरह रह रहे थे। महिला के मुताबिक, चार साल बद १९९९ में जब लड़के ने किसी अन्य महिला से शादी कर ली तो उसने बलात्कार और वादाखिलाफी का मुकदमा दर्ज करवा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में साक्ष्यों की गहन पड़ताल करते हुए पाया कि महिला और पुरुष, अलग-अलग धर्म के हैं जो दोनों के विवाह की राह का सबसे बड़ा रोड़ा बना। महिला का परिवार चर्च में शादी करवाना चाहता था, जबकि लड़के का परिवार मंदिर के लिए अड़ा था। जस्टिस नवीन सिन्हा ने फैसला लिखते हुए कहा कि लड़का अनुसूचित जनजाति का है, जबकि लड़की ईसाई है। दोनों की आस्था अलग है। दोनों एक ही गांव के हैं, इसलिए एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। एक-दूसरे को लिखी चिट्ठी के आधार पर कहा जा सकता है कि दोनों के बीच प्यार का लंबा दौर चला और परवान चढ़ा। कोर्ट ने कहा कि महिला विवाह में आनेवाली धार्मिक समस्याओं से पहले ही अनजान रही होगी, यह संभव नहीं है। बावजूद इसके वह अपने प्रेमी के साथ शारीरिक संबंध बनाती रही। अगर दोनों की शादी हो गई होती तो महिला रेप का आरोप नहीं लगाती। देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा कि दोनों की चिट्ठियों से पता चलता है कि लड़का उससे शादी करना चाहता था। अदालत ने कहा कि लड़के ने शादी का कोई झूठा वादा या जानबूझकर गलत बयानी नहीं की जिससे दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने। लड़की दोनों के अलग-अलग धर्म के होने की बात जानती थी। पीठ ने कहा पूरा मामला संदेहास्पद है इसलिए व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।