" /> तिलिस्म मुंबई के पहाड़ों का!

तिलिस्म मुंबई के पहाड़ों का!

मुंबई के पहाड़ों के दुर्दिन ३०० साल पहले शुरू हो गए थे, जब सात द्वीपों में बंटे शहर को जोड़ने के लिए उन्हें जमींदोज किया जाने लगा था। हद तो तब हुई, जब लगभग ८० साल पहले ब्रिटिश सरकार ने भौगोलिक चमत्कार कहलाने वाले अंधेरी के गिलबर्ट हिल को ही निजी बिल्डरों के हाथ बेच डाला। तब से हालत सुधरी नहीं है। पनवेल के जसई और भिवंडी के मनकोली की पहाड़ियों का कम से कम ४० प्रतिशत हिस्सा पत्थर की खदानों से नष्ट हो गया है। कांदिवली का पाडन हिल छठी सदी के मशहूर मूर्तिशिल्पों के साथ अनियोजित निर्माणों और खनन कार्यों की भेंट चढ़ गया है। पारसिक हिल में लगातार खोदाई से ठाणे और नवी मुंबई का पारिस्थिकीय प्रतिकूल रूप से प्रभावित हो रहा है। नवी मुंबई हवाई अड्डा बनाने के लिए वहां के उलवे हिल का एक बड़ा हिस्सा सपाट कर दिया गया है। हालिया चर्चा में है डोंबिवली का उंबार्ली हिल। सावलाराम महाराज वनश्री और अन्य स्थानीय निसर्गप्रेमियों ने जिस निर्जन पहाड़ी को ४००० से अधिक पेड़ लगाकर गुलजार किया और १३२ से अधिक पक्षी प्रजातियों का शरणगाह बनाया, वह एक आवासीय योजना के कारण खतरे में है।
मुंबई महानगर पश्चिमी घाट और अरब सागर के बीच पहाड़ों को जमींदोज करके बना है! मुंबई की तमाम गुफाएं और कई प्राचीन मंदिर इन्हीं पहाड़ों की ज्वालामुखीय चट्टानों की ही देन हैं। २०० वर्ष पहले तक मुंबई मलबार हिल से डोंगरी तक २४ किलोमीटर लंबाई और चार किलोमीटर चौड़ाई में फैला एक विशालकाय इलाका था, जिसके २२ पहाड़ों में मलबार हिल और खंबाला हिल भी थे, जिनके घने जंगलों में बाघ और दूसरे जंगली जानवर उन्मुक्त विचरण करते थे। दलदली फासलों से अलग इन पहाड़ियों, टीलों, टेकड़ियों व डूंगरों पर दुर्लभ वनस्पति और घनी हरियाली थी। इनके मूल निवासी थे कोली मछुआरे।
मुंबई के सातों मूल द्वीपों को जोड़ने के लिए हुए रीक्लेमेशनों से दलदल पाटने की प्रक्रिया ने इन पहाड़ियों को गुम कर दिया। मुख्य शहर का आधा और उपनगरों का २० प्रतिशत हिस्सा समुद्र से इन्हीं पहाड़ों को जमींदोज करके रिक्लेम किया गया है। अगर आप डेढ़ सौ साल पुराने नक्शे देखें तो आपको सायन से कोलाबा तक पूर्वी और समुद्र तट के किनारे-किनारे पश्चिमी हिल रेंज नजर आएगी। पूर्व में हरे रंग की और पश्चिम में मलबार हिल से वर्ली तक फैली बादामी रंग की पहाड़ियां तो आज भी हैं, पर बाकी पहाड़ियां और टीले गायब हैं। डोंगरी की वह पहाड़ी, जिसपर ईस्ट इंडिया कंपनी का किला था, मझगांव के निकट की पहाड़ी और एक अन्य टीला, ताड़देव के निकट फ्लैग स्टॉफ हिल, शिवजी के मंदिर के लिए प्रसिद्ध शिवड़ी की पहाड़ी, राउली और सलामती पहाड़ियां, पारसी सेठ नवरोजी रुस्तमजी सेठ के नाम से मशहूर नवरोजी पहाड़ी – ये सब मुंबई की निर्माण और विकास की क्रम में नजरों से ओझल हो गए हैं।
आज मुंबई के इन पहाड़ों में मात्र मलबार हिल, कंबाला हिल, एंटॉप हिल, गिल्बर्ट हिल, वर्ली हिल, पाली हिल, मझगांव हिल, सायन व कुर्ला कसाइवाडा, अंबोली, महाकाली हिल, गोलांजी हिल और पुलशाची डोंगरी ही बचे हैं-वह भी नाम मात्र के, जिनमें मुख्य शहर का सबसे ऊंचा पॉइंट है मलबार हिल। माउंट मेरी (बांद्रा) और असल्फा व चांदिवली की पहाड़ियों, टीले और डूंगरों पर भी गुजरे वक्त के निशान ढूंढने से मिल जाते हैं। लोलुप निगाहें जब इन पहाड़ों को नष्ट करने पर आमादा हैं, नागरिकों की कुछ पहलें आशा की किरण बनकर आई हैं। ‘डूंगर’ जैसे स्वयंसेवी प्रयासों से घाटकोपर का भटवाडी हिल फिर से लहलहा उठा है। यहां सुबह-शाम सैर पर आने वाले २०० से अधिक स्थानीय लोगों ने ड्रिप इरिगेशन जैसी तकनीकों से पिछले पांच वर्षों में यहां नीम, पीपल, बरगद, आम, जामुन, इमली, आदि के हजारों पौधे लगाए हैं। ठाणे के अर्थकिड्स ह्यूमैनिटी फाउंडेशन और येऊर एनवॉयरनमेंटल सोसायटी जैसे संगठनों ने यही कार्य ठाणे के येऊर हिल पर किया है।
सैलानियों का स्वर्ग
मुंबई के शहरी क्षेत्र में तीन पर्वत श्रृंखलाएं हैं: घाटकोपर हिल्स, उत्तरी छोर पर पवई हिल्स (उच्चतम चोटी ४५० मीटर) और पूर्वी छोर पर ट्रांबे हिल्स (सबसे ऊंची चोटी ३०२ मीटर) । विहार और तुलसी झीलें पहाड़ों के ही बीच हैं और एक बड़ा हिस्सा बोरिवली नेशनल पार्क से घिरा है। येऊर की रेंज ठाणे के अलावा मुलुंड सहित मुंबई के पूर्वी उपनगरों को भी छूती है। पड़ोसी ठाणे में कलवा और मुंब्रा के बीच सह्याद्रि श्रृंखला का पहाड़ पारसिक कहलाता है, जिसके बीच से गुजरती, मुंबई को कल्याण से जोड़ने वाली पारसिक सुरंग भारत की सबसे पुरानी रेल सुरंग है। पश्चिमी घाट की मनोरम मालशेज घाट की पहाड़ियां यहां से ज्यादा दूर नहीं। इन हिल रेंज का चप्पा-चप्पा उनपर फैले ५९ से ज्यादा किलों सहित मॉनसून के दिनों किसिम-किसिम की गतिविधियों से गुलजार हो जाता है। हरी-भरी वादियां, सुंदर झरनों की मधुर कल-कल, खूबसूरत नजारे, मिट्टी की सोंधी खूशबू और शीतल हवाएं पहाड़ों का आकर्षण बढ़ा देती हैं। जेनिथ, भिवपुरी, पालघर, माथेरान, तुंगारेश्वर, पांडवकाडा व मालशेज घाट के वॉटर फॉल, कर्नाला, गौर कामत, माहुली, बसीन, मानिक गढ़, सुधा गढ़ सरीखे किले, नेशनल पार्क, भीमाशंकर, नेरल- आनंदवाडी, टपालवाडी जैसे पर्यटन स्थल सैलानियों को पुकारने लगते हैं। शहर की हद से दूर नहीं जाना चाहें तो हिरण की मस्त चौकड़ी और तुलसी लेक का मोहक सौंदर्य देखिए मुलुंड से बोरिवली के पहाड़ी रास्तों पर और ट्रैकिंग करके कान्हेरी केव्ज हो आइए। सैलानी पंछियों के अलावा विलुप्त होती पक्षी प्रजातियों के दर्शन करने हों तो बोरिवली पार्क या नवी मुंबई के खारघर हिल चले जाइए।
कृत्रिम पहाड़ी देखकर ही संतोष न करना पड़ जाए
एक ओर मटमैली झोपड़पट्टियों और दूसरी ओर ऐश्वर्यशाली गगनचुंबी इमारतों के झुरमुट में खोए साढ़े छह करोड़ वर्ष पुराने गिलबर्ट हिल की २०० फुट में सिमटी बौनी सपाट काया को देखकर भला कौन विश्वास करेगा ज्वालामुखी की राख से पैदा अंधेरी (पश्चिम) का यह बॉक्सनुमा पहाड़ एक समय अंधेरी स्टेशन से वर्सोवा तक फैला रहा होगा! मुंबई में पहाड़ों का जो हश्र हो रहा है उससे तो लगता है कि हमारी आने वाली हमारी भावी पीढ़ियों को कहीं कृत्रिम पहाड़ी देखकर ही संतोष न करना पड़ जाए, जिसे बांद्रा-कुर्ला कॉप्लेक्स में इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर के पास और धीरूभाई अंबानी इंटरनैशनल स्कूल और अमेरिकी दूतावास के पीछे मीठी नदी के सामने पांच-छह हेक्टेयर के भूखंड पर बनाने पर विचार जारी है। एमएमआरडीए की ५० करोड़ रुपये की इस योजना के तहत यहां नदी भ्रमण सुविधाओं के साथ एक उद्यान और हेलीपैड के अलावा वॉकवे, जॉगिंग पार्क, इनडोर और आउउटडोर गेम्स और हाइकिंग-क्लाइंबिंग जोन भी बनाने की भी योजना है।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)