" /> वक्त का सितम…!

वक्त का सितम…!

किस्मत जब मेहरबान होती है तो बहुत कुछ देती है और यही किस्मत जब पलटती है तो इंसान से बहुत कुछ छीन लेती है, उसे कहीं का भी नहीं छोड़ती है। बीते जमाने में फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी ही एक डांसर थीं, जिन्हें इंडस्ट्री की पहली `आइटम गर्ल’ होने का खिताब हासिल है। इस डांसर ने अपनी जिंदगी में रुपया-पैसा, धन-दौलत, इज्जत-शोहरत जो कुछ भी चाहा ऊपरवाले ने उन्हें वो सब कुछ दिया। लेकिन वक्त का पहिया उनकी जिंदगी में कुछ ऐसा घूमा कि अपनी दोस्ती और मेहमान नवाजी के लिए मशहूर ये `आइटम गर्ल’ दाने-दाने को मोहताज हो गई। अब इसे आप वक्त का सितम नहीं, तो और क्या कहेंगे?
अपने जमाने की इस मशहूर डांसर का पूरा नाम कुक्कू मोरे था। कुक्कू का जन्म १९२८ में एक एंग्लो इंडियन परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्हें फिल्मों में काफी दिलचस्पी थी और वो चाहती थीं कि बड़ी होकर वे इंडस्ट्री की टॉप मोस्ट डांसर बनें और खूब रुपया कमाएं। ऊपरवाले ने कुक्कू के मन की बात सुन ली। कुक्कू जब बड़ी हुर्इं तो उन्होंने फिल्मों में पदार्पण किया और वे इंडस्ट्री की टॉप मोस्ट डांसर बन गर्इं। एक ऐसी डांसर जिसकी तूती हर तरफ गूंजती थी। उस जमाने में किसी भी फिल्म में एक डांस के लिए सबसे ज्यादा मेहनताना पानेवाली वे पहली `आइटम गर्ल’ थीं। १९४६ की फिल्म `अरब का सितारा’ से अपने करियर की शुरुआत करनेवाली कुक्कू की इस फिल्म की हीरोइन थीं अपने जमाने की मशहूर गायिका अमीरबाई कर्नाटकी और फिल्म के डायरेक्टर थे नानूभाई वकील। अपनी पहली ही फिल्म में कुक्कू ने इतना बेहतरीन डांस किया कि उनके लिए इंडस्ट्री के दरवाजे खुल गए और ढेर सारी बड़ी-बड़ी फिल्मों के ऑफर उनकी झोली में आ गिरे। १९४९ की फिल्म `अंदाज’ में कुक्कू पर फिल्माया गया गीत `झूम-झूम कर नाचो आज गाओ खुशी के गीत रे…’ हो या फिर १९४९ में रिलीज हुई राज कपूर की फिल्म `बरसात’ का गीत ‘पतली कमर है तिरछी नजर है…’, हो या १९५१ में आई फिल्म `आवारा’ के गीत `एक दो तीन आजा मौसम है रंगीन…’ को दर्शक आज भी नहीं भूले हैं। दोस्तों पर जान छिड़कनेवाली कुक्कू की हेलन के परिवार के साथ बड़ी गहरी दोस्ती थी। हेलन को फिल्मों में लाने का श्रेय कुक्कू को ही जाता है और इस बात को हेलन भी मानती हैं।
फिल्मों में काफी नाम, दाम और शोहरत कमानेवाली कुक्कू के पास मुंबई में अपना एक बंगला और तीन मोटर कार थी। एक मोटर कार अपने लिए, दूसरी दोस्तों के लिए और तीसरी घर के कुत्तों को घुमाने के लिए थी। लेकिन कहते हैं न कि समय एक-सा कभी नहीं रहता। इंसान को राजा से रंक और रंक से राजा बनने में देर नहीं लगती। वक्त का कुछ ऐसा ही पहिया कुक्कू के जीवन में भी घूमा और वे राजा से रंक बन गर्इं। अपनी इस हालत के लिए वे किसी और को नहीं, बल्कि खुद को जिम्मेदार मानती थीं। वे कहती थीं, `जब तक मेरे पास पैसा था मैंने पैसे की कद्र नहीं की। पानी की तरह पैसे को बहाया और अंततः पाई-पाई को मोहताज हो गई। जब तक पैसा था मैं फाइव स्टार होटलों से खाना मंगाती। खुद खाती, दोस्तों को खिलाती और जो बच जाता उसे फेंक देती। मेरा अन्न के दाने का इस तरह अपमान करना शायद ऊपरवाले को नागवार गुजरा और मैं दाने-दाने को मोहताज हो गई।’ हर वक्त कुक्कू को घेरे रहनेवाला दोस्तों का जमघट मुफलिसी के दौर में धीरे-धीरे उनका साथ छोड़ता चला गया। आखिरी दिनों में कुक्कू को कैंसर हो गया था। लेकिन अफसोस, न कोई साथ रहनेवाला था और न कोई साथ देनेवाला था। अपने सारे काम वे खुद ही करतीं। कुक्कू खुद सब्जी मंडी जातीं और वहां सड़क पर सब्जीवालों द्वारा फेंकी गई सब्जियों के ढेर में से सब्जियां चुनकर लातीं और उसे पकाकर खातीं। इसे किस्मत की बदनसीबी नहीं तो और क्या कहेंगे। जब तक कुक्कू जिंदा थीं उन्हें खाना नसीब नहीं हुआ और जब ३० सितंबर, १९८१ को उन्होंने इस संसार को अलविदा कहा तब उनके पास कफन के पैसे नहीं थे।