" /> लॉकडाउन में ढील से पटरी पर आने लगी जिंदगानी

लॉकडाउन में ढील से पटरी पर आने लगी जिंदगानी

ऑटो-टैक्सी वालों के सुधारने लगे दिन

लॉकडाउन में 70 दिन से ज्यादा वक्त बीताने के बाद अब धीरे-धीरे ऑटो और टैक्सी वालों की जिंदगानी पटरी पर आने लगी है। खासतौर पर मुंबई के हजारों ऑटो-टैक्सी वालों, जिनकी रोजी-रोटी आम मुंबईकरों पर टिकी थी। बहुत से ऑटो-टैक्सी वाले कमाई न होने के कारण अपने गांव लौट गए और जो बचे हैं, वे लॉकडाउन में ढील मिलने के बाद जीवन को पटरी पर
लाने की कवायद में जुट गए हैं।

सुधरने लगे हालात
सीपी टैंक पर 20 साल से टैक्सी चलानेवाले जितेंद्र यादव लॉकडाउन से पहले रोजाना दो चक्कर टाटा हॉस्पिटल और सीपी टैंक का लगाते थे। सीपी टैंक स्थित कैंसर रोगियों की धर्मशाला से पेशंट को लाना और ले जाना होता था। इसके अलावा कुछ रेलवे स्टेशन के चक्कर लग जाते थे। कुल मिलाकर हजार रुपए तक कमाई हो जाती थी। रामरख बताते हैं कि लॉकडाउन में जीवन बिताना मुश्किल हो गया था। गाड़ी की ईएमआई नहीं भरनी है इसलिए तकलीफ ज्यादा नहीं थी लेकिन घर खर्च की परेशानी थी। अब 1 जून के बाद टैक्सी इमर्जेंसी सर्विस में चलने लगी तो दो-तीन दिन में एकाध चक्कर स्टेशन का भी लग जाता है। कुल मिलाकर, घर खर्च के लिए थोड़े-थोड़े पैसे आने से लॉकडाउन में हालात सुधारने लगे हैं।

मिलने लगे फिक्स ग्राहक
भुलेश्वर के कुम्हार टुकड़ा पर शेयर टैक्सी चलानेवाले चंद्रकांत शिंदे बताते हैं कि लॉकडाउन में वे अपनी टैक्सी लेकर अपने गांव सतारा चले गए थे। पता चला कि 1 जून से काम शुरू होगा, तो दोबारा मुंबई लौट आए। शिंदे बताते हैं कि पहले चर्नी रोड से भुलेश्वर के बीच दिनभर में 15-16 चक्कर लगते थे। अच्छी-खासी कमाई थी। लोकल बंद, तो शेयर टैक्सी की कमाई बंद। शिंदे ने कहा कि वे दोबारा सतारा लौटनेवाले थे लेकिन 8 जून के बाद भुलेश्वर मार्केट खुलने लगा। पहचानवाले दो-तीन दुकानदारों ने अपने स्टाफ को लाने और ले जाने का काम दे दिया। फिलहाल अब काम चल जाता है।

निकल रहा है खुद का खर्चा
संपत मिश्रा रोजाना भुलेश्वर में सुबह 4 बजे अपनी टैक्सी लगाते थे। यहां के फूल मार्केट से फिक्स ग्राहकों को लाना और ले जाना होता था। सुबह 7 बजे के बाद कुछ स्टूडेंट्स को कोलाबा तक छोड़ने का फिक्स काम था। मिश्रा ने बताया कि फिलहाल फूल मार्केट और स्कूल दोनों ही बंद हैं। कमाई का कोई जरिया नहीं था लेकिन अब कभी-कभी सामाजिक संस्थाओं की ओर से खाना लाने ले जाने का काम मिल जाता है। इससे खुद का खर्च चल जाता है। कभी-कभी मार्केट से कुछ दुकानदारों को लाने ले जाने का काम भी मिल जाता है।