" /> मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का अनलॉक्ड साक्षात्कार: कोरोना यह विश्व युद्ध, विरोधियों, पेट दर्द बंद करो अब!

मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का अनलॉक्ड साक्षात्कार: कोरोना यह विश्व युद्ध, विरोधियों, पेट दर्द बंद करो अब!

…सब कुछ भगवान पर छोड़कर नहीं चलेगा। मुंबई की स्थिति सुधर रही है, पर लापरवाह होकर नहीं चलेगा। वॉशिंगटन पोस्ट और विश्व स्वास्थ्य संगठन हमारे प्रयासों की प्रशंसा कर रहे हैं। ये ‘मैनेज’ हैं क्या?

कोरोना वैश्विक संकट है, यही कड़वा सच है। इस संकट के बारे में दृढ़ता से बोलनेवाला या सलाह देनेवाला दुनिया में कोई नहीं है। एक तरफ लॉकडाउन करना चाहिए क्या? तो उसका विरोध करनेवाले कई सयाने हैं। लॉकडाउन से क्या हासिल हुआ? लॉकडाउन मतलब इलाज है क्या? लॉकडाउन से आर्थिक संकट आता है, ऐसी बकवास की जाती है। ठीक है बाबा, मेरा उन्हें यही कहना है, हम तुम्हारे लिए लॉकडाउन खोल देते हैं। लेकिन फिर लोग मौत के मुंह में चले गए तो आप जिम्मेदारी लेंगे क्या? आज जो दरवाजा खुला होने के कारण सरकार की चौखट पर आकर बैठे हैं, क्रंदन कर रहे हैं, उनके लिए दरवाजा खोलने में हर्ज नहीं है। लेकिन दरवाजा खोलने के बाद आप परिणाम की जिम्मेदारी लेनेवाले हो क्या?

पूरा विश्व, देश और महाराष्ट्र कोरोना युद्ध से जूझ रहा है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने यह ‘रण’ जारी रखते हुए ‘सामना’ को साक्षात्कार दिया। मुख्यमंत्री ने ‘कोरोना’ युद्ध की सविस्तार जानकारी जनता के सामने प्रस्तुत की। ‘कोरोना का संकट वैश्विक संकट है। तीसरा महायुद्ध समझो। पूरा विश्व वायरस से लड़ रहा है। लापरवाह होकर नहीं चलेगा। लोगों की जान बचाना ही जरूरी है!’
मुख्यमंत्री ठाकरे ने अत्यंत मजबूती से कहा, ‘लॉकडाउन हटा दो, ये खोल दो और वो खोल दो’ ऐसा कहनेवाले लोग जिंदा लोगों की जिम्मेदारी लेंगे क्या? पुनश्च हरिओम का अर्थ समझ लें।
अंतिम वर्ष की पदवी परीक्षा का निर्णय लिया गया है। परीक्षा नहीं होगी। विपक्ष राजनीतिक उत्सव न मनाएं। संकट की गंभीरता को ध्यान में रखकर जिम्मेदारी से पेश आएं, ऐसी फटकार भी उद्धव ठाकरे ने लगाई।
अंतिम वर्ष की पदवी परीक्षा का निर्णय लिया गया है। परीक्षा नहीं होगी। विपक्ष राजनीतिक उत्सव न मनाएं। संकट की गंभीरता को ध्यान में रखकर जिम्मेदारी से पेश आएं, ऐसी फटकार भी उद्धव ठाकरे ने लगाई।
मुख्यमंत्री का लंबा साक्षात्कार ‘अनलॉक’ अर्थात खुले रूप से हुआ। अब तक फेसबुक लाइव के माध्यम से जनता से संवाद साधनेवाले मुख्यमंत्री ‘सामना’ साक्षात्कार के माध्यम से सभी शंकाओं का निराकरण करने के लिए जनता के समक्ष आए। ऐसे हुई साक्षात्कार की शुरुआत…

आप कैसे हैं?
– देखिए, आपके सामने हूं।
हां, सच है लेकिन बहुत दिनों के बाद कहिए या बहुत महीनों के बाद, साक्षात्कार के माध्यम से जनता ने आपका स्वच्छ चेहरा देखा। आपके चेहरे पर मास्क नहीं है…
– बिल्कुल। मेरा चेहरा स्वच्छ ही है और अभी आपने फेसबुक लाइव का उल्लेख किया तो फेसबुक लाइव में भी मेरा चेहरा स्वच्छ ही था।

आज आप बहुत खुश दिख रहे हैं…
– बेशक, क्योंकि ‘सामना’ का साक्षात्कार है।

आपके चेहरे पर कोई तनाव नहीं है। सिर्फ सिर के थोड़े बाल कम दिख रहे हैं। यह गत ६ महीनों का परिणाम है क्या?
– पहली बात यह है कि अभी आपने कहा कि फेसबुक के माध्यम से मैंने जनता से संवाद किया या बौद्धिक लिया कहिए या कुछ और उसे आप कुछ भी कहें लेकिन एक बात साफ है कि मैंने जनता से अपना नाता टूटने नहीं दिया। मैं जनता से दूर नहीं हुआ। इसी के साथ मैं मतलब महाराष्ट्र सरकार उनके कंधे से कंधा मिलाकर हर संकट में हर कदम पर उनके साथ है। यह महत्वपूर्ण है।

विश्वास का नाता है ये…
– मुझे एक बात की खुशी है कि जनता मुझ पर मतलब महाराष्ट्र सरकार पर विश्वास रखती है। सरकार की बात सुनती है। सहयोग करती है। इसलिए अभी आपने जैसा कहा कि मेरे चेहरे पर तनाव नहीं है, जनता जब साथ हो तो किसी प्रकार का तनाव या चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। जनता हमारे साथ है। जनता का विश्वास है। वह विश्वास मेरे लिए शक्ति देनेवाला है। जब तक वह विश्वास मेरे साथ है, जब तक वह शक्ति मेरे पास है तब तक मुझे किसी प्रकार के तनाव की परवाह करने की आवश्यकता नहीं।

वही कह रहा हूं कि कोरोना जैसे बड़े संकट के दौरान कई नेता तनाव में दिख रहे हैं…
– रुकिए। आपके पहले के सवाल का जवाब देना रह गया। वह भी बताता हूं। आपने कहा न कि बाल कम हुए दिख रहे हैं। उसका कारण बताता हूं। एक तो कई दिनों बाद कल ही मैंने बाल कटवाए। गत तीन-चार महीनों से खुद ही अपने बाल थोड़े-बहुत काट रहा था।

हां, कई लोगों ने इस राष्ट्रीय कार्य को घर पर ही किया…
– आत्मनिर्भर!

प्रधानमंत्री मोदी का भी आत्मनिर्भर होने का जो संदेश है…
– नहीं। वह सही है लेकिन मैं सिर्फ आत्मनिर्भर कह रहा हूं। आप कुछ और मतलब मत निकालिए।

ठीक है। कई दिनों से आप जनता के स्वास्थ्य का खयाल रख रहे हैं…
– हां। बिल्कुल रख रहा हूं। अभी आपसे बात करते हुए भी मेरे दिमाग में वही विचार चल रहे हैं। जैसे-जैसे एक-एक जानकारी मेरे पास आती है, वैसे-वैसे उस पर क्या उपाय योजना करना है, इसका भी विचार शुरू है।

कोरोना के कठिन काल में मैंने देश भर के कई मुख्यमंत्रियों का इंटरव्यू देखा, उनकी बातें सुनीं, भाषण सुने, प्रधानमंत्री मोदी को भी सुना। हालांकि आप जब बोल रहे थे तो आपको सुनते हुए ऐसा लगता था कि विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ही मार्गदर्शन कर रहे हैं। आपके बोलने में इतना डॉक्टरी ज्ञान, स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान और आपके व्यवहार में भी यही दिख रहा था। यह डॉक्टरी ज्ञान आप में कहां से आया?
– इसका सीधा उत्तर तो नहीं दिया जा सकता लेकिन एक बात बताता हूं। उस समय छोटे बच्चों से एक सवाल अक्सर पूछा जाता था कि बड़े होकर तुम क्या बनोगे? तब बच्चे अपनी इच्छा व्यक्त करते थे। हालांकि उस समय उत्तर देनेवाले वैसा बने या नहीं भी बने होंगे। लेकिन मेरे बारे में कहें तो मुझे बड़ी छोटी उम्र से ही स्वास्थ्य संबंधी जिज्ञासा थी और अध्ययन का विषय भी था। उस दौरान मेरे मन में भी डॉक्टर बनने की इच्छा जागती थी। हालांकि मैं नहीं बना, अच्छा ही हुआ।

अरे वाह…!
– हां, लेकिन डॉक्टर बनने का मैंने कभी प्रयास नहीं किया। बीच के दिनों में मैं होम्योपैथी का अध्ययन अवश्य करता था।

आपके घर की एक परंपरा है। आपके दादाजी प्रबोधनकार ठाकरे हों या आपके चाचा श्रीकांत ठाकरे हों या शिवसेनाप्रमुख हों, उन सभी की इसमें रुचि थी और ज्ञान भी था…
– सही बात है। उन सभी को रुचि तो थी ही, मुझे भी उसमें रस था। हमारे पास एक दवाइयों का बक्सा रहता था। उसमें आजकल जो बहुत प्रयोग किया जा रहा है आर्सेनिक आल्बम आदि दवाइयां भी होती थीं। किसी के बीमार होने पर पहले उसका घर पर ही उपचार किया जाता था। उस समय होम्योपैथी के डॉक्टर हमारे घर आते थे। एलोपैथी तो बहुत दूर की बात थी। वह समय ही अलग था। आज के जैसे उपद्रवी वायरस वगैरह नहीं थे। उस दौरान ऐसे त्रासदायक वायरस नहीं होते थे। एक अच्छी जिंदगी होती थी। उस दौरान मैं होम्योपैथी का अध्ययन करता था। जाने- अनजाने जो पसंद थी, वह आज भी थोड़ी-बहुत जिंदा है। वह पसंद या शौक, आज उपयोगी साबित हो रही है। आपने ध्यान दिया होगा कुछ साल पहले बीड में ‘प्लेग’ आया था। उस समय मैंने वहां शिवसेना का एक दल भेजा था। यह दल डॉक्टर दीपक सावंत के नेतृत्व में वहां गया था। उन्होंने दौरा किया। दवाइयां कितनी लगेंगी, कौन-सी लगेंगी, कहां से मंगानी होंगी, यह सब काम शिवसेना ने उस समय किया। मुंबई में एक बार बाढ़ आई थी। उस समय भी शिवसेना ने इसी प्रकार काम किया। यह थोड़ा-सा काम मैं बड़ी तन्मयता से करता रहता हूं और आज भी विचित्र संयोग बना है। लेकिन मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी कंधे पर आ गई है और वह भी ऐसे समय आई कि दुनिया में स्वास्थ्य संबंधी आपातकाल की स्थिति बन गई है। उसी से हम गुजर रहे हैं। यह मुश्किल घड़ी है। इस समय यह जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आई। मतलब कोई भी संकट हो उसकी गहराई में जाना महत्वपूर्ण है।

आप बहुत गहराई में गए और इतना अध्ययन किया…
– बिल्कुल। इसके बिना आप निर्णय नहीं ले सकते। किसी विषय की गहराई में गए बिना, उससे संबंधित निर्णय तक नहीं पहुंचा जा सकता। आज कोरोना मामले में कोई विशेषज्ञ नहीं है। जिसे जो अनुभव आता है, वो अपनी जानकारी के हिसाब से व्यवहार करता है। यह अनुभव ही हमें सिखाता है। उसी से हमें समझदार बनना है कि नहीं यह सबकी अपनी निजी सोच का मामला है। लेकिन कम-से-कम हम समझदार बनने का प्रयास कर रहे हैं।

जनता का मार्गदर्शन करते-करते आपने कोरोना के साथ जीने का तरीका सिखा दिया है।
– सबको सीखना ही चाहिए। फेसबुक के माध्यम से मैं यही बताता हूं। कई दिनों से मैंने फेसबुक लाइव नहीं किया है। ऐसा नहीं है कि मैंने उसे रोक दिया है। आनेवाले दिनों में मैं फिर से वो करूंगा क्योंकि उसे करते रहना पड़ेगा। जब तक आप कोरोना के साथ जीना नहीं सीखते और स्वीकार नहीं करते, तब तक ये बातें आपको अपरिहार्य रूप से करनी होंगी। बिना कारण घूमना, बिना कारण भीड़ इकट्ठा करना जैसी कई बातों को रोकना होगा।

ठाकरे सरकार शुरू ही है…
– ऐसा क्यों कहें?

ठाकरे सरकार कहना चाहिए। क्योंकि जो नेतृत्व करता है, उसी के नाम से सरकार पहचानी जाती है…
– वह ठीक है। मैं इसका नेतृत्व कर रहा हूं ये एक बात है ही लेकिन महाविकास आघाड़ी के रूप में यह तीन दलों की सरकार है। निर्दलीय भी साथ हैं। ये उनकी सरकार है और उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि जिन्होंने इस प्रयास को स्वीकार किया, इस प्रयास का स्वागत किया, उस माई-बाप जनता की सरकार है।

इस सरकार को छह महीने हो गए…
– छह महीने हो गए।

किसी सरकार या किसी मुख्यमंत्री के पद को एक महीना पूरा हो जाता है तो उत्सव मनाया जाता है…
– (हल्की हंसी) फिलहाल उत्सव पर रोक है।

हां, रोक है। लेकिन राज्य और देश में ऐसे कई उदाहरण हैं जो दो-चार महीने भी प्रधानमंत्री पद या मुख्यमंत्री पद पर नहीं रह पाए।
– आप कहना क्या चाहते हैं।

आपका ६ महीने का समय पूरा हो गया। इन ६ महीनों की तरफ आप किस तरह देखते हैं?
– बड़े विचित्र तरीके से गुजरा है। आपने जो कहा वह बात सच है कि एक महीना हुआ। ६ महीना पूरा होने पर सरकार का जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया। अब मुझे ऐसा लगता है कि विरोधी दल नेता पद दिवस को भी धूमधाम से मनाया जा रहा है।
अच्छा?
– कुल मिलाकर यही दिख रहा है। लेकिन आपके सवाल का जवाब देता हूं। यह जो ६ महीने बीते थे। ये कई प्रकार की चुनौतियां लेकर आए थे। चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं। राजनीतिक चुनौतियां ठीक हैं। मुझे उसकी चिंता नहीं। मैंने आपसे अभी कहा ही कि जब तक जनता की ताकत मेरे साथ है, जब तक जनता का आशीर्वाद मेरे साथ है, तब तक मैं इन चुनौतियों की परवाह नहीं करता। लेकिन शुरुआती दौर में ही जैसे कोरोना का संकट, जिसे आज तक कोई समझ नहीं पाया, अभी भी उसका कोई उपाय नहीं जान पाया, ऐसा भी संकट आया। एक बात ध्यान में रखिए आपदा नई नहीं है। आपदाएं आती रहती हैं लेकिन कुछ आपदाएं ऐसी होती हैं, जैसे कहीं पर भीषण बाढ़ आती है या भूकंप आ जाता है। बहुत भयानक होती हैं ये आपदाएं। कभी सुनामी आती है। एक क्षण में सब-कुछ खत्म कर जाती हैं।

कोरोना संकट भयानक है…
– वही कह रहा हूं। कई बार ऐसा भी होता है कि ऐसे कोरोना जैसे संकट आते हैं, जिसको लेकर हमने सावधानी नहीं बरती तो लोग तेजी से बीमार पड़ते हैं और उनकी मौत हो जाती है। लेकिन तूफान जैसा संकट अभी ‘निसर्ग’ तूफान का उल्लेख आपने किया। भूकंप आता है। यह एक क्षण में ही सब-कुछ नेस्तनाबूद कर देता है और उसके बाद हमें तुरंत संकटग्रस्त लोगों की मदद करने का काम करना होता है। उनके पुनर्वसन का काम करना होता है। संकट जाने के पश्चात कहां कितना नुकसान हुआ, यह पता चलता है। जैसे हाल ही में ‘निसर्ग’ तूफान आया था। उस समय सौभाग्य से शुरुआत से ही सावधानी बरती गई। इसलिए जनहानि कम हुई। हालांकि जितनी हानि हुई उतनी भी नहीं होनी चाहिए। लेकिन हानि कम-से-कम ही रख सके, मर्यादित रख पाए। उस दौरान कई बिजली के खंभे उखड़ गए थे। पेड़, बाग आदि का नुकसान हुआ। घरों का नुकसान हुआ। खेती का नुकसान हुआ। अब हम उसकी नुकसान भरपाई कर रहे हैं।

कब समाप्त होगा यह संकट?
– कोरोना के बारे में एक बात कहनी है कि कोरोना खत्म नहीं हो रहा है। मैंने अपने एक फेसबुक लाइव में भी कहा था ‘कब खत्म होगा यह रण…’ यह रण कब खत्म होगा पता नहीं चल रहा।

आप इसे रण मानते हैं…
– रण ही है। यह रण संग्राम है। बड़ा वैश्विक रण है ये। जैसा मैंने कहा था, यह वर्ल्ड वॉर है।

तीसरा विश्वयुध्द…
– वॉर अगेंस्ट वायरस।

जैसे दो विश्वयुद्ध हुए। वैसे ही यह तीसरा विश्वयुद्ध…
– यह बहुत भयानक है। यह असली विश्वयुद्ध है। क्योंकि इसने पूरी दुनिया को ढंक लिया है। आज भी जिसने जल्दबाजी में लॉकडाउन हटाया या सबकुछ खत्म हो गया, ऐसा समझकर लॉकडाउन हटाया, उन देशों में अब फिर से लॉकडाउन किया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण लीजिए। आपने सुना होगा कि वहां कुछ क्षेत्रों में उन्होंने सेना का भी सहारा लिया।

महाराष्ट्र में ऐसा समय आया था क्या? आपको कभी ऐसा लगा कि सेना बुलानी चाहिए?
– महाराष्ट्र में सेना बुलाने की नौबत नहीं आई। ऐसी खबरें आई थीं, उस समय मैंने कहा था कि हम मुंबई में फील्ड अस्पताल बना रहे हैं क्योंकि यह संकट संक्रमण का है। संक्रमण एक झटके में कितने लोगों को अपनी चपेट में ले लेगा कहा नहीं जा सकता। जब यह संकट आया था तो आपको याद होगा बेड्स की कमी थी, एंबुलेंस नहीं थी, औषधोपचार नहीं था, वेंटिलेटर नहीं था, ऑक्सीजन कंसंट्रेटर नहीं थे। इन सबकी कमी थी। क्योंकि हमारे पास अब तक जितने अस्पताल हैं, उतने ही अस्पताल थे। जब मार्च में विधानसभा का अधिवेशन चालू था उस समय भी कुछ मरीज मिले थे। उनकी संख्या धीरे-धीरे बढ़ते देखकर हमें अधिवेशन भी एक हफ्ता कम करना पड़ा। उस समय जब जो ब्रीफिंग हुई, तब मुझे बताया गया कि परिस्थिति कितनी गंभीर है। उसी समय मैंने कहा था कि हमें युद्ध स्तर पर फील्ड अस्पताल शुरू करने होंगे। उस समय अगर जरूरत पड़ी तो मिलिट्री की तकनीक का उपयोग करो। वे तुरंत इस प्रकार के अस्पताल बना सकते हैं। लेकिन इस मामले में भी सेना की मदद की आवश्यकता नहीं पड़ी। हमने यहीं अस्पताल बना लिए। मुझे अपने प्रशासन पर गर्व है। हम जो कहते हैं, उसके अनुसार वे तत्परता से काम कर रहे हैं। इसीलिए चीन ने १५ दिनों में इंफेक्शन अस्पताल शुरू किया। हमने भी १५ से २० दिनों में ऐसे अस्पताल शुरू में बनाए। अब हम अस्पतालों में सुविधाएं बढ़ा रहे हैं।

अभी आपने प्रशासन का उल्लेख किया कि प्रशासन अच्छा काम कर रहा है। इस दौरान गत ६ महीनों में आप मंत्रालय बहुत कम बार गए, आप पर ऐसे आरोप लग रहे हैं…
– ठीक है न। लेकिन मंत्रालय अभी बंद है, इस बात का ध्यान रखिए। मंत्रालय में मैं कम गया, इस आरोप में दम नहीं है। मैं अपनी बात विस्तार से बताता हूं। अब तकनीक इतनी प्रगति कर चुकी है। इस तकनीक का तुम उपयोग नहीं कर सकते तो तुम्हारे जैसा दुर्भाग्यशाली तुम ही होगे। फिलहाल तकनीक के माध्यम से हम कितने सारे काम कर रहे हैं। जैसे आपके इस साक्षात्कार के खत्म होने के बाद मैं घर जाकर अर्थात घर जाकर ही यह जान-बूझकर बोल रहा हूं, तो घर जाकर मैं मुंबई मनपा आयुक्त से वीडियो कॉन्प्रâेंसिंग द्वारा चर्चा करनेवाला हूं। सिर्फ आयुक्त ही नहीं बल्कि सहायक आयुक्तों की भी बैठक होगी। यह रोज चल रहा है। पिछले दिनों मैंने मराठवाड़ा के विधायकों से बातचीत की। शिवसेना जिला प्रमुखों की बैठक हुई। परसों विदर्भ के तीनों दलों के विधायकों की वीडियो कॉन्प्रâेंसिंग हुई। मतलब मैं घर बैठकर भी हर जगह जा सकता हूं। यह तकनीक का फायदा है। एक ही समय में पूरे राज्य को कवर कर रहा हूं और मुख्य बात यह है कि तुरंत निर्णय ले रहा हूं।

तकनीक का अच्छा उपयोग कर रहे हैं…
– घूमना आवश्यक है। मैं न नहीं कहता। लेकिन जब तुम घूमते हो तब तुम्हारी कुछ सीमाएं होती हैं। तुम एक ही जगह पर जाते हो लेकिन जब तुम वीडियो कॉन्प्रâेंसिंग का उपयोग करते हो तो तुम हर जगह जाते हो।

यात्रा का समय बचता है।
– बिल्कुल। यात्रा का समय बचता है।

इसके अलावा यंत्रणा पर भी दबाव कम होता है…
– सही है। जो मुझ पर आरोप लगा रहे हैं, उनसे मेरा सवाल है कि फिर तुम हवाई जहाज से क्यों जाते हो? बैलगाड़ी से क्यों नहीं जाते? बैलगाड़ी से जाओ। पैदल जाओ। तकनीक का उपयोग नहीं करना चाहते तो तकनीक की खोज क्यों करते हो?

आप अधिकारियों से संवाद कर सकते हैं। लेकिन विरोधियों का आक्षेप है कि जनता से आपका संवाद कम हो रहा है…
– फिलहाल तो हमारी परिस्थिति लॉकडाउन की है। सभा-समारोह पर रोक है। जनता को सभा के लिए बुलाना मतलब अपने ही नियमों को तोड़ना है।

सही है…
– और यहां हम साक्षात्कार के लिए जैसे सुरक्षित अंतर पर बैठे हैं। वैसे संभव होगा क्या? मैं मुख्यमंत्री हूं। मेरी सुरक्षा व्यवस्था है। मेरे अगल-बगल कहो या आस-पास कोई नहीं आएगा। लेकिन मेरे सामने मेरी जनता बैठेगी, उसका क्या? वह सब पास-पास में बैठे तो? मैं संवाद करूंगा लेकिन अगर जनता बीमार पड़ गई तो संवाद का क्या उपयोग?

मतलब आप नियमों का पालन कर रहे हैं?
– नियमों का पालन अगर मैंने ही नहीं किया तो जनता क्यों करेगी? अगर मैंने नियमों का पालन नहीं किया तो लोगों को उपदेश देकर क्या फायदा?

ये जो कोरोना युद्ध आप कह रहे हैं, हमारे प्रधानमंत्री मोदी ने शुरुआत में कहा था कि यह महाभारत का युद्ध है। महाभारत का युद्ध १४ दिन चला था पर कोरोना युद्ध हम २१ दिन में खत्म कर देंगे। लेकिन यह युद्ध २१ दिन में खत्म नहीं हुआ बल्कि बढ़ता चला जा रहा है।
– जब तक हम कोरोना के साथ जीना नहीं सीखेंगे, स्वीकार नहीं करेंगे तब तक परिस्थिति कठिन ही रहेगी। हालांकि अब लोगों ने इसे स्वीकार करना शुरू कर दिया है। महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि अब हम ही अंतर रखकर नहीं बैठे तो इस पर भी टीका करेंगे कि आप नियमों का पालन कर रहे हैं, ऐसा कह तो रहे हैं लेकिन आपके मुंह पर मास्क नहीं है। एक बात ध्यान में रखिए, हम जहां साक्षात्कार ले रहे हैं, वहां हमारे आस-पास कोई नहीं है। हमारे बीच भी काफी दूरी है। नहीं तो हम बंद कमरे में पहले साक्षात्कार देते ही थे। इसलिए कह रहा हूं तुम सार्वजनिक स्थानों पर भीड़ नहीं कर रहे हो, मुंह पर मास्क लगाकर घूम रहे हो, मुंह पर हाथ नहीं लगा रहे हो, हाथ लगातार धो रहे हो, तब तक चिंता करने की आवश्यकता नहीं। मैं कहता हूं यही कोरोना के साथ जीना है। हो सकता है भूलवश मुझसे भी गलती हो जाए। कोई नियम टूट सकता है। लेकिन तब तुम्हें भी मुझसे कहना चाहिए कि जरा प्लीज, ऐसा मत करिए। इसी को हम कोरोना के साथ जीना कह रहे हैं।

आज के इस दौर को आप युद्ध कहते हैं, तो युद्ध कहने पर हम मिसाइल लाते हैं, टैंक लाते हैं, बंदूक के गोला-बारूद लाते हैं, सैन्य भर्ती करते हैं… ये युद्ध के आयुध हैं। आपने जब कोरोना के विरुद्ध महाराष्ट्र में युद्ध शुरू किया तब आपने बड़े पैमाने पर आईसीयू, वेंटिलेटर्स, बेड, दवाओं का स्टॉक किया। यह स्वास्थ संबंधित युद्ध है। लेकिन इतने बड़े पैमाने पर इंप्रâास्ट्रक्चर खड़ा करने के बाद भी लोगों की शिकायतें बढ़ रही हैं…
– नहीं। अब शिकायतें नहीं हैं।

कोविड सेंटर में बेड नहीं, यह शिकायत तो बड़े पैमाने पर की जा रही है या जाने पर हमारा इलाज नहीं हो रहा है, इस प्रकार की शिकायतें भी आ रही हैं। इतना काम करने के बाद भी ऐसी शिकायतें आती हैं तब बतौर मुख्यमंत्री आपको क्या लगता है?
पूरा तंत्र ही यह युद्ध लड़ रहा है। मुझे काम करना है और जनता को बचाना है। आपने जो शिकायतें बतार्इं, वह स्थिति मुंबई की शुरुआत में थी यह ईमानदारी से आपको स्वीकार करना चाहिए। इस ‘वायरस’ का प्रसार और हमारी सुविधा एक समान नहीं थीं। अब मुंबई में हम स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ा रहे हैं। परंतु यह वायरस ग्रामीण भागों में पैâल रहा है। अन्य शहरों में भी पैâल रहा है। उन शहरों में और ग्रामीण भागों में जहां मुंबई की तरह स्वास्थ्य सुविधा हम उपलब्ध करा नहीं पाए या ऐसी सुविधा उपलब्ध कराने का काम शुरू है, वहां ऐसी शिकायतें थोड़ी-बहुत रहेंगी। इसके लिए सभी जिलाधिकारियों को मैंने निर्देश दिया है कि जहां-जहां ऐसी सुविधाओं की आवश्यकता है, वहां तत्काल इन सुविधाओं का निर्माण करें। वर्तमान में बारिश के दिन हैं। इस वजह से न कहें तो भी कार्यों की गति पर थोड़ा असर पड़ेगा ही। मुंबई में हमने जब ये सुविधाएं उपलब्ध कराई तब बारिश नहीं थी। इसलिए किसी भी गतिरोध के बिना हम वह तैयार कर पाए।

बीकेसी में आपने बड़ा अस्पताल शुरू किया…
– गोरेगांव के नेस्को का अस्पताल तो उससे भी बड़ा है। उसके बाद वरली के डोम में हॉस्पिटल है। अब रेसकोर्स में भी ऐसा अस्पताल बनाया जा रहा है। मुलुंड चेकनाका, दहिसर चेकनाका है। इस जगह ऐसी स्वास्थ्य सुविधा हम क्यों खड़ा कर पाए, क्योंकि तब बरसात नहीं थी। उसका लाभ हमने उठाया। मुंबई में इस महामारी की शुरुआत पहले हो गई थी। इस वजह से बारिश से पहले ही हम ये काम शुरू कर पाए। अब क्या हो रहा है कि गांव या अन्य शहरों में बारिश शुरू हो गई है। उस वजह से ऐसे मैदान आपको मिलेंगे नहीं। इन मैदानों में भी हमने सिर्फ तंबू नहीं लगाए हैं। वहां भी टॉयलेट की सुविधा स्थायी रूप से कर दी है। इसके लिए सिवरेज लाइन, पानी की लाइन भी बिछाई गई है। यानी कहीं भी बाद में तकलीफ न हो, इसका खयाल रखते हुए ये सुविधा निर्माण की गई है। अब गांव-गांव में, बल्कि अन्य शहरों में बड़े हॉल या कुछ जगह बड़े कवर्ड गोदाम हैं, ऐसी जगहों पर हमें ऐसी सुविधा निर्माण करनी होगी या कुछ जगह हम स्कूल, कॉलेजेस, हॉस्टेल्स को हम क्वॉरंटीन सेंटर के लिए अपने अधीन लेनेवाले हैं। उस समय तत्काल विकल्प नहीं थे इसलिए यह निर्णय हमने लिया।

इतना सब करने के बाद भी देश में मरीज बढ़ रहे हैं। देश में दस लाख के ऊपर मरीजों की संख्या है। शायद उससे भी ज्यादा का आंकड़ा हो सकता है। महाराष्ट्र का आंकड़ा तीन लाख से ऊपर चला गया है…
– तीन लाख कुल। मतलब पहला मरीज जो ठीक होकर घर गया है, उसे भी इसमें जोड़ा जा रहा है।

मुंबई में एक लाख मरीज हैं… यानी जो स्वस्थ होकर घर गए वह फीगर नहीं दी जा रही…
– अर्थात, जो स्वस्थ हुए हैं उनका आंकड़ा इसमें शामिल नहीं किया जाना चाहिए। आप अपने महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री और देश में प्रधानमंत्री कितने हैं, ऐसा पूछ रहे हैं क्या? फिर नेहरू से लेकर प्रधानमंत्री गिनोगे क्या? महाराष्ट्र में भी यशवंतराव से मुख्यमंत्री गिनोगे क्या? ऐसे सभी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री एक साथ नहीं गिन रहा। अब कितने प्रधानमंत्री… एक! अब कितने मुख्यमंत्री…एक। अभी तक कौन-कौन होकर गए, तो फिर वो पहले के सभी नाम आएंगे। लेकिन अब कौन? तो एक ही नाम आना चाहिए।

मतलब अब आंकड़े कम हो रहे हैं…
– कम ही है। अर्थात एकदम ही कम हुआ है ऐसा भी मैं नहीं कहूंगा क्योंकि कुछ जगहों पर संक्रमण बढ़ रहा है। आंकड़ा बढ़ रहा है। वह थोड़ा बढ़ेगा, लेकिन जल्द-से-जल्द मरीज को पहचानकर उसे ठीक करना यह महत्वपूर्ण है। दरअसल, किसी में ऐसे कुछ लक्षण दिखाई दिए तो उसे स्वयं आगे आना चाहिए। उपचार करवाना चाहिए। मृत्यु दर कम रखना यह उद्देश्य है। दवाई न होते हुए भी हम ये प्रयास कर रहे हैं। जो भी दवाएं अभी उपलब्ध हैं, उसके अनुसार उपचार करके मृत्यु का प्रमाण कम रखना ये अब हमारे आगे की सबसे बड़ी चुनौती है।

मुंबई नियंत्रण में आ रही है…
– मैं उस बारे में अभी कुछ नहीं बोलूंगा। मुझे जल्दीबाजी में कोई स्टेटमेंट देना नहीं है।

मुंबई में आंकड़ा कम हो रहा है, यह सच है न?
– है, लेकिन अभी हम अगर ऐसा मान लें तो हम असावधान हो जाएंगे। उसी की मुझे चिंता है। इसलिए कृपा करके आप उन आंकड़ों की ओर ध्यान न दें।

लेकिन मुंबई के करीब के जो शहर हैं… कल्याण, डोंबिवली, अंबरनाथ या पुणे, पिंपरी-चिंचवड ये परिसर कोरोना से ज्यादा संक्रमित हुए हैं और सभी को वो चिंता का विषय लगता है क्योंकि एक तो ये भीड़-भाड़ वाली जगह है। नौकरी-धंधे की जगह है। औद्योगिक वसाहत है और अब पुणे-पिंपरी, चिंचवड को दोबारा लॉकडाउन करना पड़ा। नई मुंबई में भी संकट बढ़ रहा है। चंद्रपुर जैसे परिसर में भी मरीज बढ़ रहे हैं। नागपुर की परिस्थिति खराब है। ये बार-बार लॉकडाउन करने की नौबत क्यों आ पड़ी?
– बताता हूं, यह समय केवल अपने ऊपर ही नहीं आया है। यह वैश्विक संकट है। यही कड़वा सच है। इस संकट के बारे में बोलनेवाला और सलाह देनेवाला विश्व में कोई नहीं। एक तरफ लॉकलाउन करना चाहिए क्या? तो उसका विरोध करनेवाले कई चालाक लोग हैं। लॉकडाउन से क्या मिला, लॉकडाउन कोई इलाज है क्या? लॉकडाउन से आर्थिक संकट आता है, ऐसा शोर मचाया जाता है। लॉकडाउन से अर्थव्यवस्था पर संकट आता है।

ठीक है बाबा, मेरा उनसे यही कहना है कि हम आपके लिए लॉकडाउन खोल देते हैं। फिर यहां लोग मरेंगे तो आप जिम्मेदारी लेंगे क्या? आज जो दरवाजा खोलो कहकर सरकार के दर पर आकर बैठे हैं, आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं उनके लिए दरवाजे खोलने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन दरवाजा खुलने के बाद आप जिम्मेदारी लेंगे क्या? अर्थव्यवस्था के संकट की चिंता हमें भी है।

फिर बतौर सरकार आप कुछ कदम उठा रहे हैं क्या?
– मेरी राय ये है कि हम अब लॉकडाउन शब्द का उपयोग नहीं करना चाहते हैं। मैं ऐसा कभी नहीं कहूंगा कि मैं
लॉकडाउन हटा रहा हूं। नहीं, बिल्कुल नहीं, लेकिन मैं धीरे-धीरे एक-एक चीज खोलते जा रहा हूं और मेरा प्रयास ये है कि एक बार जो चीज खुल गई है वो दोबारा बंद न हो। इसलिए सिर्फ स्वास्थ्य का विचार करके नहीं चलेगा, सिर्फ अर्थव्यवस्था का विचार करके भी नहीं चलेगा। जो सिर्फ और सिर्फ अर्थव्यवस्था की चिंता करते हैं उन्हें स्वास्थ्य की चिंता थोड़ी बहुत करनी चाहिए और जो सिर्फ स्वास्थ्य की चिंता करते हैं उन्हें आज के समय में सत्य एवं सही है तो उन्हें थोड़ी बहुत आर्थिक चिंता भी करनी चाहिए। इन दोनों का तालमेल रखना ही होगा।

मतलब यह एक प्रकार से तार पर की कसरत ही है?
– यह तार पर की कसरत ही है। कोरोना के साथ जीना सीखने का मतलब यह तार पर की कसरत करना सीखना चाहिए और दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा, मुंबई के आस-पास के परिसर में थोड़ा वायरस बढ़ रहा है। इस वायरस के बर्ताव पर आप गौर करें तो आप समझेंगे कि यह वायरस गुणाकार करता जा रहा है और जहां शुरुआत होती है वहां पहले वो पीक पर जाता है, शिखर पर जाता है और फिर वो फ्लैट होकर कम होता। जहां देरी से संक्रमण पैâलता है उस क्षेत्र में वह देरी से पीक पर जाता है। इसलिए यह परिसर और यह शहर भी कालांतर में इस संकट से बाहर निकलेगा। भयभीत होने की कोई बात नहीं।

आपको कोरोना पर डॉक्टरेट मिलना चाहिए। इतना रिसर्च आपने किया ऐसा लगता है...
– इतना अध्ययन नहीं किया तो बतौर राज्य के मुख्यमंत्री मैं काम कैसे करूंगा?

देश के मुख्यमंत्रियों में कोरोना पर इतनी गहराई से अध्ययन करनेवाले आप एकमात्र मुख्यमंत्री मुझे दिख रहे हैं!…
– (मजाक में) मैं घूमता नहीं, घर में बैठता हूं इसलिए अध्ययन होता है। अध्ययन न करते घूमना और न घूमकर अध्ययन करना इसमें आपको क्या चाहिए, वो आप तय करें।

विपक्षी नेता देवेंद्र फडणवीस खूब घूम रहे हैं…
– मैं इस पर कुछ नहीं कहूंगा।

हाल ही में फडणवीस दिल्ली में थे…
– वहां कोरोना की परिस्थिति देखते होंगे।

और उनका ऐसा कहना है कि…
– लेकिन वहां की परिस्थिति के बारे में कुछ बोले नहीं वो।

दिल्ली में जाकर विपक्षी नेता ने महाराष्ट्र की भयावह परिस्थिति के बारे में बोला है…
– इसकी वजह क्या? तो उन्होंने उनका जो विधायक का फंड है, वो महाराष्ट्र का फंड दिल्ली में देने के कारण वो सभी बातें दिल्ली में जाकर कर रहे हैं।

ये आपका कहना यदि सच मान लें तो भी राज्य की परिस्थिति का अपडेट्स उनका प्रधानमंत्री मोदी से मिलकर देना कहां तक उचित है? सही मायने में यह चर्चा मुख्यमंत्री से करनी चाहिए…
ऐसा कौन क्या कहता है, क्या करता है यहां ध्यान देता नहीं। मैं बार-बार कहता हूं, मैं अपने काम के प्रति ईमानदार हूं। मुझ पर मेरी जनता का विश्वास है तब तक कोई चिंता नहीं। इनका ठीक है। ये बोलेंगे। बोलते रहेंगे। शायद उनका पेट दर्द इसलिए भी होगा कि, कहीं भी न जाते हुए, न घूमते हुए एक संस्था ने देश के सर्वोत्तम मुख्यमंत्रियों में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का चयन किया। इसका भी पेट दर्द हो सकता है। क्योंकि कोरोना के लक्षण अलग-अलग हैं।

अच्छा! यानी पेद दर्द भी एक लक्षण है?
– लक्षण अलग-अलग है। निश्चित ही!

सर्दी, खांसी, बुखार भी लक्षण हैं ऐसा सुना है…
– हां, सर्दी, खांसी, बुखार, स्वाद का जाना, गंध का जाना, शरीर पर रैश आना, कुछ लोगों की उंगलियां काली-नीली हो जाती हैं।

उसमें अब यह नया लक्षण… पेट दर्द!
– पेट दर्द ये भी लक्षण हो सकता है।

अच्छा! फिर ये पेट दर्द से आया है तो…
– यह, ठीक है, लेकिन अब मैं थोड़ी गंभीरता से कहता हूं। यह मजाक नहीं है। हममें कोई अनपेक्षित बदलाव हुआ है, ऐसे कुछ ध्यान में आया है तो वो भी कोरोना का लक्षण हो सकता है, ऐसा एक अध्ययन है।

हां क्या…
– इसलिए किसी को विचित्र लगने लगे, जैसे गंध जाना, स्वाद का जाना तो उन्हें चिकित्सकीय मदद और इलाज कराना चाहिए। हमने सभी ओर होर्डिंग्स लगाई है कि छींकते समय, खांसते समय चेहरे पर रूमाल रखें। यहां-वहां न थूकें। प्रत्यक्ष में सर्दी-खांसी का संक्रमण, सौभाग्य से इतने बड़े पैमाने पर नहीं आया। बुखार आना ये भी कोरोना का लक्षण है। कुछ लोगों के मुंह का स्वाद का जाना, मतलब ऐसा कुछ तो अलग लग रहा है क्या यह देखना होगा।

मतलब राज्य में सत्ता परिवर्तन होने के बाद से कई लोगों का जीवन बेस्वाद हो गया है…
– हो सकता है।

उसका यह परिणाम है ऐसा आपको लगता है क्या?
– हो सकता है।

विपक्ष यह संसदीय लोकतंत्र में महत्वपूर्ण संस्था है...
– बहुत जिम्मेदार संस्था है।

विपक्षी नेताओं को महाराष्ट्र के मुद्दों पर सही मायने में मुख्यमंत्री से चर्चा करनी चाहिए ऐसा विधान है लेकिन इस विधान का विपक्षी नेता फडणवीस पालन नहीं कर रहे हैं ऐसा लगता है क्या?
– मैंने एक-डेढ़ महीने पहले सर्वदलीय नेताओं की एक बैठक ली थी। आनेवाले कुछ दिनों में ऐसी बैठक मैं फिर लूंगा। परंतु उस समय मैंने उन्हें खुलकर कहा था कि आप भी खुलकर जो कुछ निरीक्षण होंगे, कोई सुधार होंगे तो कहें। राजनीति तो आपकी रग-रग में है। हमेशा-हमेशा राजनीति सिर्फ राजनीति। लेकिन कोरोना का संक्रमण यह जनता के जीवन से खेल हो रहा है। आप जो कहते हैं उसे मैं स्वीकार करूंगा कि किसी कोविड सेंटर में अव्यवस्था होगी, हो सकती है। लेकिन होगी तो मुझे वह सुधारनी चाहिए क्योंकि आखिरकार वह सुविधा मैंने जनता के लिए की है। उसमें अगर कोई कमी है तो उसे दूर करनी ही चाहिए। अभी भी अपने पास कुछ-कुछ दवाएं, बहुत पहले शोध की गई दवाएं भी उपयोग की जा रही हैं। मैं जान-बूझकर कह रहा हूं, डब्ल्यूएचओ हो या दूरदर्शन व समाचार पत्रों से पता चला कि एक दवा मिली है। डेकसोना नामक स्टेरॉइड का नाम आया है। इस बारे में टास्क फोर्स से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यह दवा हम पिछले दो महीने से इस्तेमाल कर रहे हैं। यानी अपने पास पहले से ही इस दवा का उपयोग शुरू हो गया है। यह दवा किसे कितनी देनी है यह प्रमाण डॉक्टरों को तय करना है। इसलिए हर मरीज को यह दवा मिलनी ही चाहिए यह आग्रह हमें नहीं करना चाहिए। उसे डॉक्टरों पर सौंप देना चाहिए।

फिलहाल महाराष्ट्र, देश और पूरे विश्व में डॉक्टर्स, नर्स और वॉर्डबॉय का उल्लेख सफेद कपड़े में देवदूत ऐसा किया जा रहा है। यही कोरोना के विरुद्ध विश्व में लड़ रहे हैं। उनका बलिदान बड़ा है…
– निश्चित ही उनका योगदान बड़ा है। इस युद्ध के समय में उन पर ही विश्वास रखकर हम काम कर रहे हैं। भगवान और देवदूत पर विश्वास न हो तो दोनों भी काम नहीं कर पाएंगे।

कर्नाटक में कोरोना की परिस्थिति गंभीर हो गई है। वहां के मंत्रियों ने कहा है कि अब हम सब भगवान पर छोड़कर मुक्त हो रहे हैं, ये कहां तक उचित है?
ये भी मेरे फेसबुक लाइव का मुद्दा था। सभी प्रार्थनास्थल बंद हैं। मंदिर बंद हैं। फिर भगवान हैं कहां? भगवान कहां गए? वो भगवान तो हममें हैं। हम एक-दूसरे को संभालें यही महत्वपूर्ण है। डॉक्टरों के रूप में वे हमारी मदद कर रहे हैं। पहले स्कूल के समय में हम पिक्चर देखते थे, उसमें पौराणिक फिल्मों में देवताओं के हाथों से ऐसी किरणें निकलती हैं और फिर चमत्कार हो जाता है। मृत्यु के मुख में गया हुआ फिर जीवित हो जाता है। बीमार ठीक हो जाता है। अभी के संदर्भ में इसका विचार करें तो भगवान का आशीर्वाद यानी दवाओं के रूप में उसका मिलना। स्वास्थ्य सेवा मिलना। ये सभी बातें उसी का हिस्सा है।

शरद पवार भी इसी विषय पर बोले हैं…
-क्या बोले हैं?

अयोध्या में जो राम मंदिर बन रहा है, कोरोना की चिंता उससे ज्यादा है। मंदी के जरिए कोरोना ठीक नहीं होगा, ऐसा शरद पवार बोले हैं। उनके विचार भी आप जैसे ही हैं कि कोरोना से लड़ने के लिए डॉक्टर्स चाहिए…
– सही है, डॉक्टर चाहिए ही। हम जो सुविधा तैयार कर रहे हैं वह सुविधा बीमारों की ठीक नहीं करेगी। इन सुविधाओं के साथ डॉक्टर्स चाहिए। मैंने पहले ही कहा था कि जंबो  फैसिलिटी चाहिए। मतलब हमने कोई बेड की दुकान नहीं खोली है। फर्नीचर की दुकान नहीं खोली है। प्रदर्शनी नहीं लगाई है। इस बेड पर जब मरीज आएंगे तब मरीज के बेड के बगल में डॉक्टर्स एवं सिस्टर्स चाहिए और हाथ में दवाइयां चाहिए।

मुंबई में कोरोना के हालात पर सबसे ज्यादा टिप्पणी देशभर के राजनीतिज्ञों ने की। फिर चाहे वह प्रवासी मजदूरों का मुद्दा हो, अथवा मरीजों की बढ़ती संख्या को लेकर। उसी मुंबई पैटर्न का आज सर्वाधिक बोलबाला है। हर जगह मुंबई पैटर्न लागू करो, ऐसा देशभर में सभी को लग रहा है।
– चर्चित कौन कर रहा है…

सभी कर रहे हैं। देशभर में सराहना हो रही है। यह मुंबई पैटर्न जब आपने शुरू किया…
– (मुस्कुराते हुए) आपने मैनेज किया होगा। शायद इसीलिए सराहना हो रही है।

 

परंतु मुंबई पैटर्न, उसमें भी धारावी की सफलता उल्लेखनीय है। धारावी कहने पर लोगों की भौहें तन जाती हैं। लेकिन…
– यह सच है। बड़ी चुनौती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जानबूझकर धारावी का उल्लेख किया। धारावी पैटर्न की सराहना की। मुझे लगता है कि ये आपकी सरकार का सबसे बड़ा यश है। राज्य सरकार और महानगरपालिका के प्रयासों की सफलता है। बल्कि आपने लगातार धारावी और मुंबई की ओर ध्यान दिया।
– हमारी जनता और तंत्र पर विश्वास है। यह विश्वास नहीं होता तो असंभव था। मैं धारावी सिर्फ घूमते दिखा होता तो क्या हासिल हुआ होता? मेरा मुख्यमंत्री की हैसियत से वहां जाना मतलब पूरा लाव-लश्कर मेरे इर्द-गिर्द इकट्ठा होगा। अर्थात कार्यस्थल और कार्य छोड़कर तंत्र मेरे इर्द-गिर्द इकट्ठा होंगे। यह मुझे नहीं चाहिए था लेकिन एक बात निश्चित तौर पर संतोषजनक है कि डब्ल्यूएचओ ने धारावी का उल्लेख किया। इसके बाद दो दिन पहले ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ में आर्टिकल छपा था, उसमें उसने कहा था कि मुंबई एक ऐसा शहर है, जिसने कोई भी जानकारी नहीं छिपाई।

लुकाछिपी नहीं…
– लुकाछिपी नहीं, बिलकुल नहीं। जो है, वो स्पष्ट है।

लेकिन आप छिपा रहे हैं… कुछ तो छिपा रहे हैं, ऐसा विपक्ष के नेताओं का कहना है। मृतकों की संख्या छिपा रहे हैं। संक्रमितों के आंकड़े छिपा रहे हैं…
– उनके पास ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ आदि नहीं आता होगा। अब ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ हमने मैनेज किया तो…

उनके पास खुद का तंत्र है क्या, जिसके जरिए उन्हें आंकड़े मिल रहे हैं अथवा राज्य के कामकाज की जानकारी मिल रही है?
– हो सकेगा। परंतु ‘डब्ल्यूएचओ’ और ‘वॉशिंगटन पोस्ट’ जैसों द्वारा हमारे कार्य पर गौर करना, बहुत बड़ी बात है।

बिलकुल, यह गौरव की बात है…
– इसकी वजह से मैं बाकी बातों की ओर ध्यान नहीं देता।

धारावी में हमें सफलता मिल रही है…
– मैं अभी भी ऐसा नहीं कहता हूं। संकट अभी भी बरकरार है। यह संकट पूरी तरह टलना चाहिए और यदि मैं अभी किसी की ज्यादा सराहना करता हूं तो असावधानी बढ़ने का खतरा है। वह असावधानी मुझे नहीं चाहिए। अति आत्मविश्वास नहीं चाहिए। लापरवाही नहीं चाहिए।

मुंबई भी धीरे-धीरे स्थिर स्तर पर आ रही है लेकिन मुंबई की सड़कों पर वड़ापाव कब मिलेगा?
– इसके लिए तैयारी चल रही है। धीरे-धीरे कदम उस दिशा में बढ़ रहे हैं एक दिन अवश्य मिलेगा।

मुंबई की सड़कों पर जब तक वड़ापाव नहीं मिलता तब तक मुंबई सुरक्षित हो गई है ऐसा इस देश में कोई नहीं मानेगा…
– वड़ापाव मिलना चाहिए इसके अलावा बहुत-सी दूसरी चीजें हैं, वो भी मिलनी चाहिए। हम धीरे-धीरे उस दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।

इस ४ महीने की कालावधि में आपने मंदिरों को भी लॉकडाउन किया है। ईश्वर भी कैद में हैं…
– अभी मेरे कहे अनुसार ईश्वर हमारे अंदर हैं।

मंदिरों के ताले कब खुलेंगे?
– ईश्वर कहते हैं कि मैं तुम्हारे अंदर हूं और इसलिए तुम मंदिर में मत आओ। पहले इस कोरोना नामक संकट को संभालो। गाडगे बाबा की कथा मुझे मेरे दादाजी ने बताई थी। वह याद आती है। वह जीवनी में भी लिखी है। गाडगे बाबा पंढरपुर जाते थे। यात्रा होती थी। जिसे वारी कहते हैं। इस बार वह वारी नहीं हो सकी। कोई बात नहीं। लेकिन उस दौर में गाडगे बाबा पंढरपुर जाते थे। वे मंदिर में जाकर विट्ठल का दर्शन करने से पहले या बजाय सुबह में खराटा झाडू लेकर चंद्रभागा नदी के तटों की सफाई करने लगते थे। और यदि उन्हें कोई पूछता था कि क्या बाबा दर्शन कर लिए क्या? इस पर वे कहते थे ये देखो, ये मेरे तमाम दीन-दुखी मां-बहन, माता-पिता आए हैं, यही मेरे विट्ठल हैं। इन्हीं में मुझे विठोबा नजर आते हैं। यहां सब गंदगी होगी तो बीमारी पैâलेगी। फिर उसका क्या होगा? इसलिए वो खुद खराटा लेकर पूरा परिसर साफ करते थे। अब हम उनके नाम से अभियान चलाते हैं परंतु खुद क्या करते हैं? साफ किए गए कोनों में झाडू मारकर फोटो खिंचाते हैं।

गाडगे महाराज की परंपरा जैसे महाराष्ट्र को मिली, उसी तरह ठाकरे परिवार को भी मिली…
– हां, है न। प्रबोधनकार ठाकरे एक बड़ा उदाहरण हैं। कुछ बातें मेरे दादाजी से यादों के रूप में सुनी हुई हैं।

अब महाराष्ट्र में ‘अनलॉक टू’ शुरू है…
– अनलॉक शब्द छोड़ो। अनलॉक… लॉक… आदि।

जिसे आप पुनश्च हरिओम कहते हैं…
– पुनश्च हरिओम या मिशन बिगेन अगेन। यह करते समय ठीक से विषय को समझ लेना चाहिए कि लॉकडाउन किया है ही। लॉकडाउन है ही लेकिन हम एक-एक समस्या हल करते हुए चल रहे हैं। धीरे-धीरे एक-एक चीजें बाहर निकाल रहे हैं। अन्यथा क्या होगा लॉकडाउन वन, लॉकडाउन टू और अनलॉक टू इन बातों में उलझे रह जाएंगे। आपने जल्दबाजी में लॉकडाउन किया तो वह गलती है। जल्दी-जल्दी लॉकडाउन उठाए तो वह भी गलत है।

लोग अब ऊब गए हैं…
– हां, सही है। परंतु ऊब मिटाने के लिए लॉकडाउन नहीं किया है अथवा खोलना है ऐसा भी नहीं है।

लोगों के रोजी-रोटी की समस्या है…
– उसके लिए यदि एकदम जल्दबाजी में खोल दिया और महामारी प्रचंड रूप से बढ़ गई तथा जान चली गई तो रोजी-रोटी क्या करेंगे? कारखानों में भी महामारी घुस गई तो क्या होगा? इसलिए एक बात स्वीकार करनी चाहिए कि कोरोना का जो होना होगा वह होगा कितने लोग मौत के मुंह में समाएंगे, उन्हें समाने दो लेकिन हमें लॉकडाउन नहीं चाहिए। तैयार हो क्या?

अमेरिका ने जैसा किया…
– तैयार हो क्या लेकिन? मैं तैयार नहीं हूं, मैं स्पष्ट कहता हूं।

न्यूयॉर्क का उदाहरण है…
होगा। लेकिन मेरी तैयारी नहीं है। मैं मतलब ट्रंप नहीं हूं। मैं मेरी आंखों के सामने मेरे लोगों को ऐसे तड़पते हुए नहीं देख सकता हूं। बिल्कुल नहीं। इसलिए एक बात तय करो। लॉकडाउन गया खड्ढे में। जान गई तो भी बढ़िया लेकिन हमें लॉकडाउन नहीं चाहिए। तय करते हो क्या बोलो!

अभी तक रेलवे शुरू नहीं हो रही है। लोग सफर कैसे करें?
– इसलिए मैं कहता हूं न, एक ही बार जो करना है तय कर लो। इस पार या उस पार। और दोनों संभालना होगा तो रेलवे पटरी पर चलनी चाहिए। इसलिए यह असमंजस है।

आप रेलवे शुरू करेंगे कि नहीं यह सवाल है। रेलवे मुंबई की लाइफ लाइन है…
– रेलवे शुरू करेंगे। वड़ापाव शुरू करेंगे लेकिन एक बार क्या है वह एक छोर स्वीकार कर लो। जल्दबाजी में, गड़बड़ी में तुम्हें निर्णय लेना है? लेकिन याद रखो परिवार के परिवार बीमार पड़ रहे हैं और मौत के मुंह में समा रहे हैं। फिर परिवार के मौत के मुंह में समाने के बाद घरों में जो ताले लगेंगे उस लॉकडाउन को कौन खोलेगा? घरों में जो लॉकडाउन होगा उसका क्या? पूरा परिवार यदि चला गया तो उस घर का ताला कौन खोलेगा? इसलिए वह ताला नहीं चाहिए होगा तो इन बातों को टालो।

शिक्षा का पूरा बंटाधार हो गया है…
– पूरी दुनिया में हुआ है।

हां, दुनियाभर में हुआ है। परंतु महाराष्ट्र में जिस बात की चर्चा की जा रही है, वह मतलब अंतिम वर्ष की परीक्षा का क्या किया जाए?
– हमने निर्णय ले लिया है!

इसमें राज्यपाल का मत अलग है…
– अब आप ही देखो। आप मुझे सवाल पूछते समय दोनों तरफ से पूछते हो। मतलब एक तरफ से कहते हो, यह खुलेगा कब और दूसरी तरफ से कहते हो अन्य राज्यों में पुन: लॉकडाउन हो रहा है। यही मेरे लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है। कुछ जगह स्कूल शुरू किया लेकिन वहां के बच्चे बाधित हो गए। कोई ऐसा न समझे की बच्चों को कोरोना नहीं होता है। ६ महीने के बच्चे को भी कोरोना हुआ है। सौभाग्य से वह ठीक हो गया।

दक्षिण कोरिया में स्कूल शुरू किया था लेकिन उसके बाद उसे बंद करना पड़ा कई देशों में बंद करना पड़ा है…
– फिर मुझे यह बताओ कि यह शिक्षा का खिलवाड़ अथवा बंटाधार है कि नहीं?

महाराष्ट्र में शिक्षण की आदर्श परंपरा रही है…
– पूरी दुनिया में रही है।

मुंबई, महाराष्ट्र को…
– है ही न। शिक्षा जीवनावश्यक जरूरतों में एक है।

कोरोना के कठिन काल में युवकों को, बच्चों को शिक्षा का क्या करना चाहिए…
– यह महत्वपूर्ण मुद्दा है। इसलिए हम भी इस पर खूब सोच-विचारकर काम कर रहे हैं। अब देखो, जुलाई लगभग खत्म होने को है। जून में दरअसल स्कूल शुरू हो जाते हैं। अब स्कूल कब शुरू होंगे? इस मुद्दे पर मैंने मेरी संकल्पना व्यक्त की, जो कि यही थी कि अब स्कूल के अस्तित्व वाले कॉन्सेप्ट को फिलहाल एक तरफ रखें। पढ़ाई कब शुरू होगी इस पर मेरा जोर है। हमने इसके लिए यह भी सोचा कि ग्रामीण भागों में जहां-जहां स्कूल होगी क्या वहां स्कूल शुरू की जाए? और जहां-जहां संभव है, सुविधा है, क्या वहां ऑनलाइन पढ़ाई शुरू की जाए? ऑनलाइन शिक्षा का फायदा हमारे यहां खूब हुआ है। इसके लिए हम केंद्र सरकार से भी बात कर रहे हैं। अब सच कहे तो पढ़ाई एक तरफा ही होगी। जैसा मेरा फेसबुक लाइव था। ऐसा ही यह होगा। टीवी चैनल पर पढ़ाया जा सकता है क्या? इस पर भी हम काम कर रहे हैं। इसके अलावा मुंबई महानगरपालिका की स्कूलों में हमने एसडी कार्ड लोड करके टैब दिए थे, वैसा भी प्रयास चल रहा है। उसमें ई-लर्निंग है, उसमें किताबें हैं। ऐसी कोशिशें चल रही हैं।

मतलब, अब आपका जोर ई-लर्निंग की ओर है…
– इसके अलावा फिलहाल विकल्प नहीं है। इसके लिए हम हर तरफ से राय-मश्विरा ले रहे हैं। लेकिन अब आप पूछते हैं, उसी तरह से कुछ कहते हैं कि लॉकडाउन किया जाए, कुछ लोग कहते हैं कि न करें। लॉकडाउन के बारे में जैसे मतभेद हैं, ठीक ऐसा ही शिक्षा के बारे में भी हो रहा है। हर मामले में दो मत, चार मत आते हैं। मतभेदों का यह जो कुछ मसला है उसके कारण हमें समस्या हो रही है। लेकिन अब निर्णय लेना पड़ेगा। सरकार की हैसियत से हम वो लेकर उस पर तुरंत काम भी करेंगे। कोई बात मुझे जंच गई तो मैं आलोचना की परवाह कभी भी नहीं करता हूं। मुख्यमंत्री नहीं था तब भी नहीं की और अब भी नहीं करूंगा। जो बात मुझे जंच गई और मुझे ऐसा लगता है कि इसमें जनता का हित है, वहां मैं आलोचना की परवाह नहीं करता।

राज्यपाल की अलग भूमिका है। इसके अलावा यूजीसी की भूमिका भी ऐसी है कि परीक्षा ली जाए…
– हमारे यहां भी कुलगुरु की एक भूमिका है।

इसमें से मार्ग कैसे निकालेंगे?
– हमने मार्ग निकाल लिया है। परीक्षा न हो ऐसा किसी का मत नहीं है। मेरा भी ऐसा मत नहीं है। मेरी भी इच्छा है कि परीक्षा होनी चाहिए। लेकिन मैं क्या कहता हूं उस पर गंभीरता से ध्यान दें। हम अंतिम वर्ष के बच्चों को जो कुछ भी अभी सेमेस्टर हुए हैं उसके एग्रीगेट करके अंक देकर उनके जीवन की अड़चनों को दूर किया जाए। उन्हें पास किया जाए। औसत मार्क देकर उन्हें रिजल्ट दिया जाए, जिस किसी को लगता होगा कि मैं उससे अच्छा कार्य कर सकता हूं, जब हमारे लिए संभव होगा तब परीक्षा घोषित करके उनके लिए परीक्षा लेंगे। जिन्हें ऐसा लगता है कि परीक्षा में बैठना है, तब वे बैठें और सिर्फ तभी उन्हें जो अंतिम निर्णय है, वह लेना होगा। या तो एग्रिगेट किए गए मार्क वाला रिजल्ट लो अथवा परीक्षा का।

नोटबंदी एक बड़ा संकट था। उसमें हजारों-लाखों लोग बेरोजगार हो गए। उसका परिणाम देश आज भी भुगत रहा है। विशेषत: इसका सबसे ज्यादा खामियाजा औद्योगिक राज्य कहलानेवाले महाराष्ट्र को हुआ है। मुंबई को हुआ है…
– हां, लेकिन इस पर कोई ज्यादा नहीं बोलता है।

अब औद्योगिक राज्य की दृष्टि से एक बार फिर हमारे ही राज्य को कोरोना का फटका लग रहा है…
– देखिए, अंतत: संकटों में भी कुछ प्रकार हैं। इंसानी एवं गैर इंसानी। इंसानी हों या गैर इंसानी, ये किसी के बस में नहीं होते। इसलिए संकट तो संकट ही होता है। आप कहते हो उसी तरह या कोरोना संकट अमानवीय है। यह हमारे हाथ में नहीं है। यह जो वायरस आया है, यह मूलरूप से बाहर से आया है।

यह तो ठीक है लेकिन इसमें से रास्ता वैâसे निकालेंगे? हजारों-लाखों लोगों का रोजगार छिन गया है…
– मुझे ऐसा लगता है कि इसमें से रास्ता निकालने के लिए पूरी दुनिया हाथ-पांव मार रही है। अभी भी प्रसार माध्यमों में जो खबरें सामने आ रही हैं, वह आशाजनक है। इन खबरों से एक बात सामने आती है कि वैक्सीन के हम करीब हैं। पहुंच गए हैं। कल भी मेरी कुछ लोगों से चर्चा हुई। उसमें जानकारी मिली है कि कुछ महीनों में यह वैक्सीन आ रही है। फिलहाल उसका ट्रायल शुरू हो चुका है। प्राणियों पर हुआ है। अब इंसानों पर हो रहा है। कुछ तय समूहों पर हो रहा है। उसके बाद यह बड़े स्तर पर होगा ऐसा करने के बाद में यह वैक्सीन आएगी। ऐसी खबरें हैं कि वह अगस्त में आएगी। अगस्त में आई तो खुशी की बात है लेकिन साधारणत: वर्ष के आखिर तक हमारे देश में वैक्सीन तैयार हो सकती है। ऐसे संकेत हैं।

किसानों की समस्या नए रूप में उफान मार रही है…
– समस्या सबकी है।

दुग्ध उत्पादक किसानों का आंदोलन शुरू हो गया है उन्हें दूध की कीमतें बढ़ाकर चाहिए…
– श्रीमान, किसे सही कीमत मिल रही है? किसी को भाव नहीं मिल रहा है। कोरोना का यह संकट सर्वव्यापी है। इसलिए किसी भी एक वर्ग को अथवा क्षेत्र को समस्या है, ऐसा मानना भूल है। और अंतत: सभी लोग अन्याय हो रहा है ऐसा कहकर बाहर निकले तो क्या होगा? मेरा यही कहना है कि एक तो आप कुछ तो स्वीकार करो कि जो कुछ होगा वह हो जाए, लॉकडाउन हटाओ। अथवा हम सुरक्षित रहकर सही ढंग से शांतिपूर्वक विचार करके इस संकट को लौटाएंगे, यह एक मार्ग है। अन्यथा तो जो कुछ भी होना होगा, वह होगा। हम कूदते हैं, ऐसा तो कहो।

निजी कंपनियों ने, निजी उद्योगों ने तो बड़ी संख्या में कर्मचारियों की छंटाई की है। लेकिन सरकार में भी एसटी से ४००० लोग कमी किए गए। रेलवे के लोग भी कमी किए जा रहे हैं। विमान कंपनी की स्थिति अलग नहीं है। इन सभी क्षेत्रों से कर्मचारियों की छंटनी शुरू रहेगी तो बहुत बड़ी सामाजिक समस्या खड़ी हो सकती है…
– सही है। बहुत बड़ी सामाजिक समस्या खड़ी हो सकती है। और इसके लिए केवल हठधर्मिता के साथ अलग-अलग मत व्यक्त करने की बजाए सभी लोग यदि एक मन से एकत्र होते हैं तो इसमें से कुछ मार्ग मिल सकता है। ऐसा मार्ग निकालने का मेरा प्रयास चल रहा है। परंतु आप यह कर रहे हैं इसलिए मेरा इसको विरोध है यह भूमिका लेकर कोई आनेवाला होगा तो इससे मार्ग नहीं निकल सकता है। यह परिस्थिति सभी के लिए समान है। फटका थोड़ा अथवा ज्यादा मात्रा में सभी को लगा है। लगनेवाला है। और तुम्हें और बताता हूं कि आनेवाले काल में इससे भी एक ज्यादा बड़ा संकट आ सकता है, ‘आर्थिक’ लेकिन सबको मिलकर एक मन से उस संकट का सामना करना है। इसलिए एकत्र आएं और मार्ग निकालना है, कहेंगे तो मार्ग निकल सकता है।

इसमें केंद्र राज्य की क्या मदद कर सकती है?
– केंद्र और राज्य को एक होकर काम करना होगा। प्रधानमंत्री मोदी बीच-बीच में वीडियो कॉन्प्रâेंसिंग के माध्यम से बैठक करते हैं और कोरोना के बारे में जो कुछ भी बातें हम उनके सामने रखते हैं उस बारे में उनकी मदद मिलती है।

आपको जो ३८ हजार करोड़ की मदद देने का इकरार केंद्र सरकार ने किया था, वह पैसा राज्य को मिल गया क्या?
– आ रहा है… आ रहा है…

धीरे-धीरे आ रहा है। लॉकडाउन जैसे धीरे-धीरे उठ रहा है, वैसे ही पैसा भी धीरे-धीरे आ रहा है…
– सभी की आमदनी घट गई है। दूध उत्पादकों की घटी है। किसानों की घटी है। मतलब सरकार की भी घट गई है।

फिर राजस्व बढ़ाने के लिए महाराष्ट्र सरकार क्या प्रयास कर रही है? क्योंकि उसके बगैर राज्य वैâसे चलाया जाएगा?
– किससे वसूल करेंगे?

कर्मचारियों की तनख्वाह देने के लिए आपके पास पैसे नहीं हैं, ऐसा आपके मंत्री कहते हैं…
– मैं मानता हूं लेकिन अंतत: राजस्व बढ़ाने के लिए किसकी जेब काटी जाए?

मेरा सवाल यही है। इसके लिए आप क्या उपाय एवं योजना बना रहे हैं?
– उपाय योजना चल रही है। अंतत: जल्दी से हल्दी पियो और गोरा हो जाओ ऐसा उपाय किसी के भी पास नहीं है। ऐसा उपाय होता तो इस परिस्थिति को संकट भी वैâसे कहा जा सकेगा? संकट अथवा आपत्ति ऐसा जब हम कहते हैं तो वह परिस्थिति गंभीर है, यह हमें स्वीकार करना चाहिए। हमारे देश में और हमारे राज्य में एपिडीपिक एक्ट सौ साल पहले वाला था। अंग्रेजों के काल का। वह अब १०० साल बाद पुनर्जीवित किया गया। वह क्यों किया? क्योंकि फिर एक बार वैसी ही परिस्थिति निर्माण हुई है। केंद्र ने उससे भी आगे और एक कदम बढ़ाया। थोड़ा-सा और कड़क डिजास्टर एक्ट बनाया है। वह क्यों करना पड़ा? इसका कारण, संकट वैसा ही गंभीर है।
क्रमश: