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शराब की जगह जहर से मरते लोग!

पिछले हफ्ते उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर और इस मंगलवार को सीमावर्ती मध्यप्रदेश के मुरैना जिले में जहरीली शराब से हुए हादसों ने हिंदी बेल्ट को हिलाकर रख दिया है। यूपी में आधा दर्जन तो एमपी में पूरे दर्जन भर लोग मारे गए हैं।
सत्ता में आने के साथ यूपी में शराब सिंडीकेट को तोड़ने में सफल रही योगी सरकार आखिरकार जहरीली शराब के सौदागरों से हार गयी लगती है। एक के बाद एक जहरीली शराब के सेवन से होने वाली मौतों की घटनाएं आने वाले दिनों में होने वाले पंचायत चुनावों के मद्देनजर और बढ़ती जा रही हैं। कहा जा रहा है कि शराब माफिया पर तो अंकुश जरूर लगा पर उनकी जगह इस धंधे पर काबिज हुए छोटे कारोबारियों को असली की जगह नकली का खेल कुछ ज्यादा ही रास आ रहा है। छोटे व्यवसाइयों को फुटकर में लाइसेंसी दुकानें मिल गर्इं तो उन्होंने सरकारी कोटा उठाना कम कर दिया और नंबर दो की दारू बेचकर ज्यादा मुनाफा उड़ाने लगे।

नतीजतन, जहां बड़े पैमाने पर यूपी में सरकारी लाइसेंसी दुकानों पर हरियाणा से मंगायी गयी नकली शराब धड़ल्ले से बिक रही है, वहीं गांव-गांव में कुटीर उद्योग की तरह भी इसका उत्पादन किया जा रहा है। दरअसल भाजपा सरकार ने सपा और बसपा की सरकारों में अंग्रेजी शराब के कारोबार में एकाधिकार रखने वालों का नेटवर्क तो खत्म किया, लेकिन कच्ची और देशी शराब के स्थानीय माफियाओं का नेटवर्क तोड़ने में यह नाकाम रही है।

नियमित अंतराल के बाद हो रहे हादसों के चलते प्रदेश सरकार की छवि तो खराब हो ही रही है साथ ही शराब सिंडिकेट को तोड़ने के उसके मंसूबों को पलीता लग रहा है। माना जा रहा है कि इन घटनाओं के चलते एक बार फिर से पाराना सिंडिकेट इस कारोबार पर हावी होने की कोशिश कर सकता है।

बीते सप्ताह बुलंदशहर के सिकंदराबाद में जहरीली शराब पीने से छह लोगों की मौत दुखद घटना है। मार्च, २०१७ में प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद जुलाई, २०१७ में आजमगढ़ में जहरीली शराब पीने से १२ लोगों की मौत हो गई थी। बीते साल इसी तरह की घटना राजधानी के पड़ोसी जिले बाराबंकी में हुयी थी, जहां आधा दर्जन लोगों की मौत हुयी थी।
यह किसी से छिपा तथ्य नहीं है कि उत्तर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में कई गांवों में दो-ढाई दशक में शराब कुटीर उद्योग की तरह पनपा है। यह उद्योग कहीं ढके-छिपे स्वरूप में नहीं चल रहा, बल्कि स्थानीय पुलिस व आबकारी अधिकारियों के बाकायदा संरक्षण में चलता है। आबकारी अधिकारियों को इससे हफ्ता मिलता है तो पुलिस के लिए हफ्तावसूली के अलावा गुडवर्क का कोटा पूरा करने का बड़ा माध्यम भी है। साल २०१७ में आजमगढ़ में शराब से मौतों के बाद सरकार ने आबकारी अधिनियम में संशोधन कर सख्त प्रावधान किए थे। नई धारा ६० (क) जोड़ी गई थी। इसके तहत किसी की मौत हो जाने पर जहरीली शराब बनाने और बेचने वाले को उम्र कैद या मृत्युदंड की सजा, दस लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान किया गया था। योगी आदित्यनाथ की सरकार ने अंग्रेजों के जमाने के आबकारी अधिनियम-१९१० में संशोधन का फैसला लिया था। सितंबर, २०१७ में इस अधिनियम में धारा ६० (क) जोड़ते हुए जहरीली शराब से होने वाली मौत पर कड़ी सजा का प्रावधान किया गया। इसी धारा में मृत्यु दंड का भी प्रावधान किया गया। लेकिन कानून को कड़ा करने के बावजूद शराब के अवैध कारोबारियों के हौसले पस्त न हुए और प्रदेश के कई इलाकों में जहरीली शराब से मौतों का सिलसिला जारी रहा।

माना गया था कि आबकारी अधिनियम में सख्त प्रावधान से अवैध शराब का कारोबार करने वाले भयभीत होंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बुलंदशहर में जहरीली शराब से हुई मौतों के बाद एक बार फिर इस नेटवर्क को तोड़ने में सरकारी कमजोरी उजागर हुई है। वर्ष २०१७ में आजमगढ़ में जहरीले शराब से हुई मौतों के बाद डिस्टलरी से फैक्ट्री तक जाने के दौरान मिथाइल एल्कोहल से भरे टैंकर को सील करने और उस पर जीपीआरएस लगाने के निर्देश दिए गए थे, जिससे बीच रास्ते में इस जहरीले द्रव्य को निकाला न जा सके। यह भी निर्णय लिया गया था कि आबकारी विभाग के अधिकारियों की मौजूदगी में ही टैंकर की सील खोली जाए लेकिन इसका पालन तक भी नहीं हो पाया है। मौजूदा नियमों के मुताबिक देसी शराब की दुकानों पर प्रतिदिन का कोटा निर्धारित होता है, जो उसे गोदाम के माध्यम से सरकार से खरीदना होता है और ठेकेदार को शराब का दिन का पूरा कोटा बेचना होता है। अगर वह कोटा नहीं बेच पाता है तो पेनाल्टी और नुकसान झेलना पड़ता है। इसी नुकसान और पेनाल्टी से बचने के लिए ठेकेदार अपने क्षेत्र के गांवों में दुकान की शराब को अवैध रूप से कुछ ग्रामीणों के माध्यम से कम दामों में बेच देता है। इससे उसका नुकसान नहीं होता और इसी शराब में मिलावट कर धंधेबाज मौत को बेचते हैं।

यूपी के गांवों में नकली, मिलावटी या जहरीली शराब के चलन के बीज चुनावी राजनीति ने ज्यादा बोए हैं। खास तौर पर पंचायत चुनाव के समय कई गांवों में प्रत्याशी प्रसाद की तरह शराब परोसते हैं। बड़ी खपत के लिए शराब की भट्ठियां गांवों के छोटे मजरों में कारखाने की तरह सजा दी जाती हैं। इनमें से कुछ चुनाव बाद बंद हो जाती हैं तो कुछ स्थायी हो जाती हैं।

पंचायत-प्रधानी के वोट मैनेज करने में शराब की महिमा ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत में मध्य उत्तर प्रदेश के एक कद्दावर राजनेता ने बखानी थी। अपने कार्यकर्ता को तो थोड़ी- थोड़ी पीने की हिदायत दी जाती है, लेकिन विरोधी के समर्थकों को जमकर छकाई जाती है। अपनों के लिए ब्रांड भी अलग कर लिए जाते हैं। यह वही शराब होती है जिसके बनाने और पिलाने का घातक तरीका ही मौत का कारण बन जाता है।

आबकारी विभाग के अधि‍कारी कानून का असर न दिखने के पीछे पुलिस और अभियोजन प्रक्रिया में गड़बड़ी की बात कहते हैं। हालांकि कमी आबकारी विभाग में भी है। शराब के अवैध कारोबार की सुरागरसी और धरपकड़ के लिए जो महत्वपूर्ण एजेंसियां प्रवर्तन दल और स्पेशल स्ट्राइकिंग फोर्स हैं। इनमें प्रवर्तन दल तो संसाधनों की कमी से जूझ रहा है जबकि स्पेशल स्ट्राइकिंग फोर्स में तैनात अधिकारियों को डिस्टलरियों की २४ घंटे निगरानी के लिए तैनात कर रखा गया है। आबकारी अधिकारी, इंस्पेक्टर की तैनाती डिस्टलरी की निगरानी के लिए करना विभाग की मंशा पर सवाल उठाता है। इससे ही शराब के अवैध कारोबारियों को खुली छूट मिली हुई है। आबकारी अधिकारियों की शिकायत व्यवस्थापन से जुड़े कार्यों को ज्यादा महत्व दिए जाने से भी है। जिले में रोज कितनी शराब आई, कितनी बिकी, ऐसी कई सूचनाएं अब रोज विभाग को भेजनी पड़ती हैं, इससे प्रदेश में निगरानी व्यवस्था कमजोर हुई है। सरकार की भी प्राथमिकता आबकारी विभाग में राजस्व बढ़ाने तक ही सीमित हो चुकी है। वर्ष २०१७-१८ में आबकारी विभाग का अनुमानित राजस्व साढ़े पंद्रह हजार करोड़ रुपए से अधिक था तो वर्ष २०१८-१९ में इसमें साढ़े चार हजार करोड़ की बढ़ोतरी कर दी गई है। वर्ष २०२०-२१ में जब कोरोना महामारी के दौरान सारी दुकानें बंद थीं, उस वक्त शराब की दुकानें खोल कर राजस्व जुटाया गया। पहली अप्रैल से शुरू हुए इस नए वित्तीय वर्ष में राज्य में शराब और बीयर की बिक्री से आबकारी के मद में ३५,५०० करोड़ रुपये का राजस्व जुटाने का लक्ष्य तय हुआ है।

आबकारी अधिनियम में संशोधन कर जो सख्त प्रावधान किए गए हैं, वह अपनी जगह सही हैं। हादसा होने के बाद यह बेहद सख्ती का संदेश देते हैं, लेकिन ऐसे उपाय करने की जरूरत ज्यादा है जो हादसा होने से बचाएं। ज्यादातर अवैध शराब के अड्डे पुलिस और आबकारी अधिकारियों की जानकारी में चल रहे हैं। बुलंदशहर की घटना से सचेत होकर जहरीली और अवैध शराब के धंधेबाजों पर रणनीति बनाकर धावा बोलने से ही दुर्घटनाओं के खतरे को टाला जा सकता है।
(लेखक उत्तर प्रदेश अधिस्वीकृत पत्रकार संघ के अध्यक्ष हैं। उत्तरप्रदेश की राजनीति के जानकार और स्तंभकार हैं।)