" /> वैक्सीन के फॉर्मूला चोर!

वैक्सीन के फॉर्मूला चोर!

यूके, यूएस और कनाडा की सुरक्षा एजेंसियों ने चेतावनी दी है और बताया है कि रूसी हैकर्स कोरोना वायरस वैक्सीन से जुड़ा रिसर्च डेटा चुराने की कोशिश कर रहे हैं। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, इंटेलिजेंस सर्विसेज की ओर से सामने आया है कि डेटा हैक करने की कोशिश करनेवाल ऐक्टर्स ‘रशियन इंटेलिजेंस सर्विसेज’ से जुड़े हैं।

डेटा हैकिंग से जुड़ा मामला रूस की एक यूनिवर्सिटी की ओर से दुनिया की पहली कोरोना वैक्सीन के ट्रायल पूरे करने के चंद दिन बाद सामने आया है। हाल ही में यूके नेशनल साइबर सिक्यॉरिटी सेंटर, कनाडा के कम्युनिकेशन सिक्यॉरिटी इस्टेबलिशमेंट, अमेरिका के एनएसए और साइबर सिक्यॉरिटी इन्प्रâास्ट्रक्चर सिक्यॉरिटी एजेंसी की ओर से कहा गया है कि रूस के हैकर्स कोरोना वैक्सीन से जुड़ा डेटा चुराने की कोशिश कर रहे हैं।

सिक्यॉरिटी एजेंसियों की ओर से कहा गया है कि ये हैकर्स उन संगठन को निशाना बना रहे हैं, जो कोरोना वैक्सीन पर काम कर रहे हैं। आरोप लगाए गए हैं कि इस हैकिंग की मदद से कोरोना वैक्सीन का फॉर्म्यूला चुराने की कोशिश की गई। रिपोर्ट्स में कहा गया है कि हैकर्स की ओर से कोरोना वायरस वैक्सीन से जुड़ी इन्फॉर्मेशन और और इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी चुराने के लिए अटैक किए गए। भले ही एजेंसियों की ओर से किसी हैकर्स ग्रुप का नाम नहीं शेयर किया गया है लेकिन सामने आया है कि यह अटैक एपीटी-२९ नाम के हैकर ग्रुप की ओर से किया गया। हैकर्स का यह ग्रुप संगठन के सर्वर ऐक्सेस करने की कोशिश कर रहा था। हैकस वेलमेस और वेलमेल मैलवेयर की मदद से सीक्रेट इन्फॉर्मेशन अपलोड और डाउनलोड कर रहे थे। हालांकि रूस ने ऐसे किसी भी आरोप को सिरे से खारिज किया है।

वायरस से डबल सुरक्षा, ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन का शानदार रिजल्ट

इंसानों पर किए गए पहले ट्रायल में सफल रही ब्रिटेन की ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्सीन के दूसरों से आगे निकलने का एक बड़ा कारण सामने आया है। दरअसल, यह वैक्सीन घातक कोरोना वायरस से ‘डबल सुरक्षा’ देती है। आमतौर पर वैक्सीन दिए जाने पर इंसान के शरीर में एंटीबॉडी बनने को सफलता माना जाता है। हालांकि ऑक्सफर्ड की वैक्सीन में सिर्फ एंटीबॉडी नहीं वाइट ब्लड सेल किलर टी-सेल भी पाए गए हैं जिसकी वजह से यह ज्यादा खास है।
ऑक्सफर्ड की यह स्टडी ‘द लैंसेट’ जर्नल में सोमवार को प्रकाशित होगी लेकिन इसके नतीजों पर अभी से चर्चा शुरू हो चुकी है। यूनिवर्सिटी एस्ट्राजेनेका के साथ मिलकर यह वैक्सीन तैयार कर रही है। इंसानों पर पहले ट्रायल में पाया गया है कि वॉलेंटियर्स में इसने न सिर्फ एंटीबॉडी बल्कि इन्फेक्शन से लड़नेवाले खास वाइट ब्लड सेल्स भी विकसित किए जिन्हें टी-सेल्स कहा जाता है। ये दोनों साथ मिलकर शरीर को सुरक्षा देते हैं। दरअसल, पहले की स्टडीज में यह बात सामने आई है कि एंटीबॉडी कुछ महीनों में खत्म भी हो सकती है लेकिन टी-सेल्स सालों तक शरीर में रहते हैं।
ऑक्सफर्ड के रिसर्चर्स इन नतीजों से उत्साहित तो हैं लेकिन माना जा रहा है कि जब तक यह साफ नहीं हो जाता कि वैक्सीन लंबे समय तक कोरोना वायरस के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता बना पाती है या नहीं, तब तक इसे लेकर इंतजार करना होगा। वैक्सीन कब तक उपलब्ध हो पाएगी, इसे लेकर द डेली टेलिग्राफ ने ट्रायल के डेटा पर मुहर लगाने वाले बर्कशायर रिसर्च एथिक्स कमिटी के चेयरमैन डेविड कार्पेंटर के हवाले से कहा है, ‘किसी एक तारीख का दावा नहीं किया जा सकता, कुछ भी गलत हो सकता है लेकिन असलियत ये है कि एक बड़ी फार्मा कंपनी के साथ काम करते हुए वैक्सीन सितंबर तक बड़े स्तर पर मुहैया की जा सकती है और इसी लक्ष्य पर वे काम कर रहे हैं।