अब मुझे कोफ्त नहीं होती…! विद्या बालन

टैलेंट से भरपूर खूबसूरत अभिनेत्री विद्या बालन का करियर अचंभित कर देता है। टीवी से लेकर फिल्मों तक का सफर विद्या बालन ने जिस खूबसूरती से तय किया वो काबिले-तारीफ है। फिल्म ‘मिशन मंगल’ में मराठी साइंटिस्ट का किरदार निभाने के बाद अब वे मैथमेटिशियन शंकुतला देवी का किरदार निभाएंगी। विद्या ने कई मुद्दों पर दिल खोलकर बातचीत की पूजा सामंत से-
हाल ही में रिलीज हुई आपकी फिल्म ‘मिशन मंगल’ में आपने अन्य चार अभिनेत्रियों के साथ फिल्म कैसे स्वीकार कर ली, जबकि आप सशक्त और सोलो नायिकावाली फिल्मों को तवज्जों देती हैं?
फिल्म ‘मिशन मंगल’ को मिले रिस्पॉन्स से मैं संतुष्ट हूं। मुझे नहीं लगता कि मैंने मल्टी स्टारर फिल्म कर कोई गलती की है। मेरा कन्सर्न मेरे किरदार से अधिक था, जो कि मिशन मंगल के प्रोजेक्ट डायरेक्टर का था और दिलचस्प भी था। फिल्म के लीड कलाकारों में अक्षय कुमार थे, जिनके साथ मैंने ‘भूल-भुलैया’ और ‘हे बेबी’ जैसी सफल फिल्में की हैं। साऊथ के कामयाब निर्देशक हैं जगन शक्ति, जिनके साथ काम करना उपलब्धि है और एक खास वजह है जिसके कारण मैंने यह फिल्म की।  फिल्म में सोनाक्षी सिन्हा, तापसी पन्नू और कीर्ति कुल्हारी के भी मेजर रोल हैं। यह सभी बेहतरीन अदाकारा हैं इनके साथ मैं काम करना चाहती थी।
एक तरफ हम ये कहते हैं कि ‘लाइफ बिगिंस ऐट फोर्टी’ लेकिन महिलाएं ४० की दहलीज पार करते ही मिडलाइफ क्राइसिस से गुजरने लगती हैं। आप भी ४० की हो चुकी हैं। इस पर आप क्या कहना चाहेंगी?
मेरी बढ़ती उम्र ने मुझे एक ठहराव, संयम और परिपक्वता दी। मैं बेहद खुश हूं उम्र के इस पड़ाव पर। बढ़ती उम्र आपको जिंदगी का जो तजुर्बा देती है, उसे कोई भी यूनिवर्सिटी नहीं दे सकती। जीवन का सुख छोटी-मोटी खुशियों से ही मिलता है। ये सुखद अहसास अब मुझे हो रहा है। छोटी-मोटी बातों से अब मुझे कोफ्त नहीं होती।
क्या मिडलाइफ क्राइसेस की परेशानी से आप गुजरी नहीं?
देखिए, मिड लाइफ क्राइसेस से सिर्फ महिला ही नहीं पुरुष भी गुजरते हैं। महिला की मेनोपॉज समस्या बहुत तकलीफदेह होती है। पुरुषों को माहवारी नहीं होती इसीलिए इस समस्या से उन्हें गुजरना नहीं पड़ता। मेनोपॉज के दौरान हार्मोनल इम्बैलेंस के कारण बेचैनी और उदासी होती है। यह दौर खत्म होता है कायम नहीं रहता। अब तक मुझे नहीं गुजरना पड़ा इन सभी से। मेरी बुआ-मौसी को भी इनसे तकलीफ हुई। लेकिन उस समय इतनी जागरूकता नहीं थी। पुरुषों की बात करूं तो मेरा एक दोस्त है जो ३५ की उम्र पार कर चुका है। वो शादी के बंधन में बंधना नहीं चाहता और उसके रिलेशंस कई महिलाओं से हैं। उसका कहना है ३५ क्रॉस की महिलाएं दिलचस्प एक्साइटिंग होती हैं।
पहले मुमताज, आशा पारेख भी बहुत छरहरी नहीं थीं। इसके बावजूद वे सफल थीं। अब साइज जीरो का बुखार अभिनेत्रियों पर क्यों चढ़ा हुआ है?
मुझे लगता है पुरुषों की मानसिकता ऐसी रही है कि उन्हें स्त्री खूबसूरत और जवान चाहिए। अगर महिला की उम्र बढ़ी तो पुरुष उस स्त्री से अपना ध्यान हटा देते थे। पहले राजा कई रानियों से ब्याह करते थे। अब दौर बदल चुका है। स्त्री अपने पैरों पर खड़ी है और पोस्ट ग्रेजुएशन और करियर बनाते-बनाते वो २५-२६ की हो जाती है। पुराने जमाने में इस उम्र में एक स्त्री को ३-४ बच्चे हो जाते थे। अब २५-३० की उम्र में शादी होती है। अब स्त्री ये खुद तय करने लगी है कि उसे कब और किससे शादी करनी है। मैंने तो यह सोचना कब का छोड़ दिया है कि लोग मेरे शरीर के बारे में क्या सोचते हैं। मैं जैसी भी हूं खुद को सेक्सी महसूस करती हूं।
आपने रोल सिलेक्ट करते समय मेकअप या ग्लैमर पर कभी ध्यान नहीं दिया? क्या ये बातें आपके लिए मायने नहीं रखतीं?
मेकअप और ग्लैमर ये किरदारों पर निर्भर करता है। कहानी-१ और कहानी-२ जैसी फिल्मों में किरदार कुछ ऐसे थे कि मेकअप का कोई काम नहीं था। मैंने एक अमेरिकन फिल्म देखी थी ‘ब्यूटी इज व्हॉट ब्यूटी डज’। यानी आप जैसा खुद के बारे में सोचेंगे वैसा ही खुद को पाओगे। मेरे परिवार ने मुझे हमेशा खूबसूरत माना और जब तक मैं होश संभालू मैंने खुद को सुंदर ही माना। जब स्कूल-कॉलेज गई तो अन्य लड़कियों को देखकर लगा कि मेरी हाईट कम है, बाल घुंघराले और छोटे हैं, थोड़ी फैट भी हूं। शुरू में बच्चे खुद को पैरेंट्स की निगाहों से देखते हैं। जब अभिनय में आई तो वैâमरे के सामने मैं सिर्फ किरदार हूं, विद्या बालन नहीं। ‘डर्टी पिक्चर’ में मैंने जो किरदार निभाया उसे करते समय थोड़ी तकलीफ हुई। मैंने अपने आपको समझाया कि वो विद्या नहीं किरदार है। मेरे लिए ग्लैमर या मेकअप मायने नहीं रखता।
जन्मस्थान – पलकक्ड़-केरला 
कद – ५ फुट, ३ इंच
वजन – नहीं बताऊंगी 
प्रिय परिधान – साड़ी 
मनपसंद पर्यटन स्थल – अब नासा जाने का मन है। वैसे वेनिस स्विट्जरलैंड जाना अच्छा लगता है।
हॉबी – फिल्में देखना… खासकर अमिताभ बच्चन की।