" /> विजय दिवस का संदेश!

विजय दिवस का संदेश!

कारगिल विजय दिवस का ऐतिहासिक महत्व है। यह जीत मिले २१ साल हो गए। यह दिवस सदैव प्रेरणादायी होता है। इस पर प्रधानमंत्री मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपना मनोगत व्यक्त किया है। कारगिल का युद्ध सबसे ऊंचाई पर लड़ा गया एकमात्र युद्ध था। पाकिस्तान ने हमारी सीमा में सीधे घुसपैठ की। (जैसे अभी चीन ने की है।) लगभग १०,७६० फुट ऊंची बर्फीली पहाड़ी पर पाकिस्तान ने घुसपैठ करके चौकियां बना लीं। हमारे सैनिकों को युद्ध करके उसे उद्ध्वस्त करना पड़ा। कारगिल युद्ध में ४९० हिंदुस्थानी जवान और अधिकारी शहीद हुए। कारगिल युद्ध में विजय तो मिली लेकिन उसके लिए हमारे सैनिकों को बड़ा बलिदान देना पड़ा, इस पर प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ‘मन की बात’ में कहा कि पाकिस्तान ने हिंदुस्थान की पीठ में खंजर भोंकने का प्रयास किया। पाकिस्तान ने हिंदुस्थान की पीठ में खंजर घोंपा, यह सही है। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने उसी खंजर से पाकिस्तानियों की आंतें बाहर निकाल ली थीं। इसलिए हम यह कारगिल दिवस मनाते हैं। यह युद्ध हिंदुस्थान की भूमि पर लड़ा गया। पाकिस्तान ने सीधे-सीधे घुसपैठ की थी और हम अपनी ही भूमि पर महीने भर लड़ते रहे। पाकिस्तान ने क्या गवांया, इसका हिसाब उन्हें ही पता होगा। हिंदुस्थानी जवानों ने अपने जान की बाजी लगाई, अपना खून बहाया और शहीद हुए, तब कहीं जाकर विजय का शंखनाद हुआ। कल रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि कारगिल दिन हिंदुस्थान की सेना के शौर्य और पराक्रम का विजयोत्सव है। रक्षा मंत्री आगे कहते हैं कि हमारी ओर टेढ़ी नजर से जो भी देखेगा, उसे माकूल जवाब दिया जाएगा। रक्षा मंत्री का भाषण जितना जोरदार था, उतना ही जोश भरनेवाला था। लेकिन फिलहाल हमारे देश की ओर टेढ़ी नजर से कौन देख रहा है? टेढ़ी नजर से देखने वाले को आप कब उत्तर देंगे? प्रधानमंत्री मोदी ने तो अपने ‘मन की बात’ में चीन का नाम ही नहीं लिया। देश की जनता भोली है। इसलिए लोग खुद ही जो समझना है समझ लें, ऐसा प्रधानमंत्री निश्चित कर चुके हैं। पाकिस्तान से कारगिल युद्ध हुआ और हमारे जवानों ने एक बड़ी कीमत चुका कर उसे जीत लिया। हालांकि पाकिस्तान का संकट समाप्त नहीं हुआ है। लेकिन अब गलवान घाटी में १४,००० फुट की ऊंचाई पर चीन घुसा आ रहा है और वहां की स्थिति तनावपूर्ण है। हमारे २० जवान शहीद हो गए। उनकी शहादत का आपने बदला नहीं लिया। पेंगांग और डेपचांग से चीन अभी भी पीछे नहीं हटा है। लेकिन उस बारे में चर्चा जारी है। चीनी सेना पहले हिंदुस्थान की सीमा में घुस आई। १० किलोमीटर घुसने के बाद चर्चा करके दो किलोमीटर पीछे चली गई। मतलब ८ किलोमीटर जमीन उसने अपने कब्जे में ले ली लेकिन दो किलोमीटर जमीन छुड़वाने का राजनीतिक आनंदोत्सव मनाया जा रहा है। चीन हिंदुस्थान की सीमा में घुस गया है और पीछे हटने का नाम नहीं ले रहा। मतलब यह एक प्रकार से हमारी ओर टेढ़ी नजर से देखना ही है। चीनियों की आंखें बंदरों की तरह छोटी हैं इसलिए चीनी हमारी ओर टेढ़ी नजर से देख रहे होंगे तो भी किसी को दिख नहीं रहा होगा, मामला खत्म। सवाल सिर्फ इतना है कि पाकिस्तान ने हिंदुस्थान की पीठ में खंजर घोंपा। इस बात को २१ साल हो गए। यह पाकिस्तानियों का स्वभाव ही है। इतिहास में अफजल खान द्वारा छत्रपति शिवराय की पीठ में खंजर घोंपने का प्रयास करते ही छत्रपति ने अफजल खान की अंतड़ियां बाहर निकाल ली थीं और प्रतापगढ़ के मुहाने पर सरकारी इंतजामात में उसका मकबरा बनवाया। चीन के बारे में वैसा कुछ दिखने में नहीं आ रहा। पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक करने के बावजूद उसकी पूंछ टेढ़ी की टेढ़ी ही है। इस पर प्रधानमंत्री मोदी ने लॉजिक रखा, ‘पाकिस्तान दुष्ट है। दुष्टों का स्वभाव कुछ भी करने के बावजूद बदला नहीं जा सकता। दुष्ट स्वभाव के लोग बिना कारण भी किसी से भी दुश्मनी मोल ले लेते हैं। दुश्मनी मोल लेना उनका स्वभाव होता है। हिंदुस्थान ने पाकिस्तान के आगे हमेशा दोस्ती का हाथ बढ़ाया है। लेकिन पाकिस्तान ने हिंदुस्थान की पीठ में खंजर घोंपने का ही प्रयास किया।’ प्रधानमंत्री मोदी ने यह सच ही कहा है लेकिन यही ‘दोस्ती का हाथ’ का मामला चीन के बारे में भी लागू न पड़ जाए। उसकी टेढ़ी नजर में दुष्टता साफ नजर आती है। लेकिन अब उसकी टेढ़ी नजरें निकालकर उसके हाथ में देने का शौर्य दिखाना चाहिए। बीमारी बढ़ रही है। इसके पहले कि ये बीमारी बढ़ जाए प्रधानमंत्री को चाहिए कि उसका ऑपरेशन कर दें। कारगिल विजय दिवस के साथ ‘गलवान’ और ‘पेंगांग’ विजय दिवस भी मना लेने दो! कारगिल विजय दिवस का यही संदेश है।