" /> उपचुनाव : २०२२ का वॉर्मअप… यूपी का मूड क्या है?

उपचुनाव : २०२२ का वॉर्मअप… यूपी का मूड क्या है?

उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी की सक्रियता ने कांग्रेस में खासी जान फूंकी है। कांग्रेस ने उपचुनावों के लिए प्रत्याशियों का चयन काफी पहले कर अपनी तैयारी शुरू कर दी थी। कांग्रेस के रणनीतिकारों के मुताबिक सभी सीटों के बजाय उसने चार सीटों पर खास जोर लगाने का फैसला किया है। उन्नाव रेपकांड के विधायक अभियुक्त कुलदीप सेंगर को सजा होने के बाद ली हुई बांगरमउ सीट पर कांग्रेस पार्टी मजबूती के साथ लड़ रही है तो घाटमपुर में पिछला चुनाव बामुश्किल से जीत सकी भाजपा को वह टक्कर देने की तैयारी कर रही है। टूंडला विधानसभा के उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी का पर्चा ही खारिज हो चुका है, सो वहां केवल छह सीटों पर ही मैदान में है। कांग्रेस के जानकारों का कहना है कि पार्टी की खास उम्मीदें बांगरमऊ, घाटमपुर और बुलंदशहर सीटों पर ही है। बुलंदशहर की सीट पर सपा ने अपना प्रत्याशी न उतार कर यह सीट रालोद को सौंप दी है। पार्टी का मानना है कि हाथरस कांड में रालोद नेता व चौधरी चरण सिंह के वारिस जयंत चौधरी पर पुलिस के लाठीचर्ज के बाद जाटों का गुस्सा व मुस्लिम वोटों की गोलबंदी के चलते यह सीट आसानी से भाजपा से छीनी जा सकती है।

बीते कुछ समय से कानून व्यवस्था, प्रशासनिक नाकामी और कई अन्य आरोपों से जूझ रहे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए अगले महीने हो रहे सात सीटों के उपचुनाव किसी बड़ी अग्निपरीक्षा से कम नहीं हैं। उपचुनावों की सफलता ही यह साबित करेगी कि तमाम आरोपों व शंकाओं के बाद भी यूपी में उनका जलवा कायम है और अगले विधानसभा में एक बार फिर से भाजपा की जीत का परचम वो ही लहरा सकेंगे।
योगी ने उपचुनावों के लिए जिस कदर से मश्क्कत शुरू की है वो किसी आम चुनाव से कम नहीं है। हालांकि एंटी इन्कम्बैंसी के रथ पर सवार समाजवादी पार्टी और प्रियंका के ग्लैमर से जोश में भरी कांग्रेस के साथ ही पहली बार उपचुनाव लड़ने उतरी बहुजन समाज पार्टी से उन्हें कड़ा मुकाबला मिल रहा है। दरअसल इन सात विधानसभा सीटों के उपचुनाव योगी के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि इनमें से छह सीटों पर पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा ने शानदार जीत दर्ज की थी। उपचुनावों की जीत न केवल योगी को अजेय योद्धा के रुप में स्थापित करेगी बल्कि भाजपा में उनके नेतृत्व का वर्चस्व भी स्थापित करेगी।
उपचुनावों का महत्व समझते हुए योगी इस बार कोई कोर-कसर भी नहीं छोड़ रहे हैं। किसी भी अन्य राजनैतिक दल के मुकाबले कहीं पहले उन्होंने इसकी तैयारी शुरू कर दी थी और प्रत्याशियों के चयन से लेकर चुनाव प्रचार की रणनीति पर उनकी छाप साफ नजर आती है। उपचुनाव के काफी पहले से योगी ने इन सातों सीटों पर वर्चुअल कार्यकर्त्ता सम्मेलन, लोकार्पण, उद्घाटन कार्यक्रम की शुरुआत की थी और अब तक सभी निर्वाचन क्षेत्रों का दौरा भी पूरा कर चुके हैं। उपचुनावों की अधिसूचना जारी होने के एक महीने पहले ही भाजपा ने इन सातों सीटों के लिए प्रभारी मंत्री तय कर दिए थे और चुनाव का बिगुल बजते ही उन सभी को संबंधित क्षेत्रों में रुक जाने का निर्देश दे दिया गया है।
उपचुनावों को लेकर योगी व भाजपा की गंभीरता का पता इस बात से चलता है कि आम चलन से परे हट कर इस बार सात विधानसभ सीटों में महज दो पर ही दिवंगत विधायकों के परिजनों को मैदान पर उतारा गया है। उत्तर प्रदेश में नंवबर के पहले हफ्ते में नौगावां सादात, देवरिया सदर, मल्हनी जौनपुर, बांगरमऊ, टूंडला, घाटमपुर और बुलंदशहर में उपचुनाव होने हैं। इनमें से नौगावां सादात सीट योगी सरकार में वैâबिनेट मंत्री चेतन चौहान की मृत्यु तो घाटमपुर सीट मंत्री कमलरानी वरुण और बुलंद शहर व देवरिया सदर सीट विधायकों के दिवंगत होने के चलते खाली हुई है। समाजवादी पार्टी के विधायक पारसनाथ यादव की मृत्यु के चलते जौनपुर जिले की मल्हनी सीट पर उपचुनाव हो रहे हैं। अयोग्य साबित होने के नाते बांगरमऊ में उपचुनाव हो रहे हैं तो अदालती विवाद में फंसी टूंडला सीट पर भी उपचुनाव हो रहे हैं। इनमें से बुलंदशहर, नौगावां सादात पर ही भाजपा ने दिवंगत विधायकों के परिजनों को टिकट दिया है जबकि बाकी की सीटों पर पुराने कार्यकर्ता या जिताऊ प्रत्याशी को उतारा है।
दूसरी ओर उपचुनावों में फेरबदल कर योगी सरकार को कमजोर करने की तैयारी में विपक्ष भी पीछे नहीं हैं। समाजवादी पार्टी के पास इन सात सीटों में से पूर्व में केवल एक मल्हनी सीट रही है। पार्टी की पूरी कोशिश न केवल अपनी सीट को बचाने की है बल्कि कम से कम तीन-चार सीटों पर जीत का परचम लहराने की है। उत्तर प्रदेश में चौथे नंबर की पार्टी कही जाने वाली कांग्रेस में प्रियंका गांधी की सक्रियता ने खासी जान फूंकी है। कांग्रेस ने उपचुनावों के लिए प्रत्याशियों के चयन काफी पहले कर अपनी तैयारी शुरू कर दी थी।
कांग्रेस के रणनीतिकारों के मुताबिक सभी सीटों के बजाय उसने चार सीटों पर खास जोर लगाने का पैâसला किया है। उन्नाव रेपकांड के विधायक अभियुक्त कुलदीप सेंगर को सजा होने के बाद ली हुई बांगरमउ सीट पर कांग्रेस पार्टी मजबूती के साथ लड़ रही है तो घाटमपुर में पिछला चुनाव बामुश्किल से जीत सकी भाजपा को वह टक्कर देने की तैयारी कर रही है। टूंडला विधानसभा के उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी का पर्चा ही खारिज हो चुका है, सो वहां केवल छह सीटों पर ही मैदान में है। कांग्रेस के जानकारों का कहना है कि पार्टी की खास उम्मीदें बांगरमऊ, घाटमपुर और बुलंदशहर सीटों पर ही है। बुलंदशहर की सीट पर सपा ने अपना प्रत्याशी न उतार कर यह सीट रालोद को सौंप दी है। पार्टी का मानना है कि हाथरस कांड में रालोद नेता व चौधरी चरण सिंह के वारिस जयंत चौधरी पर पुलिस के लाठीचार्ज के बाद जाटों का गुस्सा व मुस्लिम वोटों की गोलबंदी के चलते यह सीट आसानी से भाजपा से छीनी जा सकती है। अमरोहा जिले की नौगावां सादात पर वैâबिनेट मंत्री चेतन चौहान की मृत्यु के बाद भाजपा प्रत्याशी उनकी पत्नी को मजबूत दावेदार माना जा रहा है। विपक्ष का मानना है कि लोकप्रिय चेतन चौहान को लेकर जनता की सहानुभूति को देखते हुए यहां उनकी पत्नी के सामने दिक्कत खड़ी करना आसान न होगा। घाटमपुर की सीट पर वैâबिनेट मंत्री कमलरानी वरुण की बेटी भाजपा से टिकट की दावेदार थीं पर पार्टी ने उनकी जगह अपने पुराने कार्यकर्ता को उतारा है। इससे दिवंगत मंत्री के समर्थकों में नाराजगी है। इस सीट पर कांग्रेस के दो कद्दावर नेता राजाराम पाल व राकेश सचान परिणाम बदलने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। टूंडला में सीधा मुकाबला भाजपा व सपा के बीच है। वहीं जौनपुर में मल्हनी सीट पर सपा विधायक पारसनाथ यादव के बेटे सहानुभूति की लहर पर सवार हैं तो दबंग पूर्व सांसद धनंजय सिंह निर्दलीय के तौर पर ताल ठोंकते हुए भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी कर रहे हैं। बांगरमऊ में रेपकांड में सजायाफ्ता विधायक कुलदीप सेंगर के परिजनों को टिकट न देते हुए भाजपा ने अपने पुराने कार्यकर्ता को मैदान में उतारा है। यहां कांग्रेस ने प्रतिष्ठित राजनेता स्वर्गीय गोपीनाथ दीक्षित की बेटी आरती बाजपेयी को उतार कर समीकरण बिगाड़ दिए हैं। कांग्रेस नेत्री ने रेपकांड लेकर हुए आंदोलन में बढ़चढ़ कर भागीदारी की थी और उन्हें प्रियंका गांधी ने सबसे पहले इस सीट पर प्रत्याशी घोषित कर दिया था। बांगरमऊ में कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन कर यह साबित करना चाहती है कि प्रियंका की सक्रियता के बाद प्रदेश में उसकी स्वीकार्यता बढ़ रही है।
सबसे दिलचस्प चुनाव देवरिया सदर में हो रहा है जहां सभी प्रमुख दलों ने ब्राह्मण प्रत्याशी और वो भी त्रिपाठी बिरादरी को मैदान में उतारा है। सपा ने पुराने नेता ब्रह्माशंकर त्रिपाठी तो भाजपा ने सत्यप्रकाश त्रिपाठी और कांग्रेस ने मुकुंद भास्कर त्रिपाठी को उतारा है। देवरिया सदर सीट भाजपा के विधायक जनमेजय सिंह के निधन से खाली हुयी थी। यहां भाजपा ने दिवंगत विधायक पुत्र को टिकट नहीं दिया तो उन्होंने निर्दलीय मैदान में उतरने का एलान कर दिया था। हालांकि बाद में उन्हें मना लिया गया पर नाराजगी दूर नहीं हुई है। इस सीट पर भाजपा कड़ी मशक्कत कर सीट बचाने में लगी है।
राजनैतिक जानकारों का कहना है कि वैसे तो इन उपचुनावों से विधानसभा में दलीय स्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है पर इसके परिणाम दूरगामी हो सकते हैं। उपचुनाव प्रदेश में पश्चिम, रुहेलखंड, ब्रज, अवध से लेकर पूर्वांचल तक की सीटों पर हो रहा है और ये प्रदेश में बन रहे राजनैतिक माहौल की बानगी साबित होने जा रहे हैं। शायद यही कारण है कि न केवल भाजपा बल्कि उससे भी ज्यादा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन उपचुनावों को `करो या मरो’ का प्रश्न बना लिया है। अब यह १० नवंबर को आने वाले नतीजे ही बताएंगे कि यूपी का मूड क्या है?
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक व वरिष्ठ पत्रकार हैं)