" /> शिवनी का शैतान,सियासत की सर्जिकल स्ट्राइक कब?

शिवनी का शैतान,सियासत की सर्जिकल स्ट्राइक कब?

यूपी के मोस्ट वांटेड आरोपी विकास दुबे की इनामी राशि १ लाख से बढ़कर २.५ लाख हो गई है। यह राशि गत ३ दिनों में ३ बार बढ़ी है। इतने दुर्दांत अपराधी के लिए मामूली-सी इनामी राशि वाला यह मुद्दा कल इस कॉलम में भी उठा था। अब बात आगे की। बिकरू कांड में ताजा कार्यवाही के तौर पर दुबे के लिए काम करने के आरोप में एक दरोगा सहित तीन सिपाहियों को निलंबित कर दिया गया है। चौबेपुर थाने का एसओ विनय तिवारी पहले ही मुखबिरी के आरोप में निलंबित है। इस बीच विकास और उसके भाई दीप प्रकाश दुबे पर लखनऊ में रंगदारी, वसूली और धमकी का भी एक मुकदमा दर्ज हुआ है। यह मामला उन सवालों का जवाब भी है जो दीप प्रकाश दुबे के घर से बरामद हुई एंबेसडर पर उठे थे। जिस पर फरियादी विनीत पांडे से पता चला कि सरकार से नीलामी में खरीदी उसकी कार को विकास दुबे धमकाते हुए जबरन उठा ले गया था। विकास के एक साथी को भी पुलिस हिरासत में ले चुकी है। उसके आवास से भी ऑडी और फॉर्च्यूनर जैसी तीन बिना नंबर की लक्जरी गाड़ियां बरामद की गई हैं, जिन्हें भय्याजी यानी विकास दुबे इस्तेमाल करता था। कुल मिलाकर, पुलिस अब पूरी ताकत से विकास दुबे नेटवर्क पर सर्जिकल स्ट्राइक कर रही है, ताकि उस पर शिकंजा कसा जा सके।
एक तो कोरोना उस पर फूटी किस्मत का रोना। उत्तर प्रदेश के पुलिस महकमे का इन दिनों यही हाल है। वह एक ऐसे पीपे को भरने की कोशिश कर रहा है, जिसमें चारों ओर से छेद हैं। कोई छेद मुखबिरी का है तो कोई अपराधियों से सांठ-गांठ का, कोई सियासी सिफारिशों का है, तो कोई जातिगत जहर व दबंगई का, इन सबमें जो सबसे बड़ा छेद है वह अपराध और अपराधियों का है। ताज्जुब की बात तो यह कि इस बड़े वाले छेद को बनाने में भी बड़ी भूमिका इसी महकमे की है, उत्तर प्रदेश पुलिस-प्रशासन की है। उस पर कभी वो इस छेद को भरने का प्रयास भी करे तो सूबे की सियासत उसमें बाधा बन जाती है। खैर, दुबे मामले में यूपी पुलिस अब दुरुस्त राह पर है। काश! यह दुरूस्ती आला महकमे ने समय रहते कर ली होती। शहीद सीओ व एसओ की उस संस्तुति पर गौर कर लिया होता, जिसमें उन्होंने दुर्दांत दुबे को लेकर आगाह किया था, मुखबिर विनय तिवारी की दुबे से सांठ-गांठ का संकेत दिया था, तो शायद आज प्रदेश के टोल नाकों पर फरार दुबे के पोस्टर चिपकाने की नौबत पुलिस पर न आई होती।
…तो आम कहां से पाएं!
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समय-समय पर कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर उच्चस्तरीय बैठकें करते रहते हैं, आला अधिकारियों पर शिकंजा कसते रहते हैं, बड़े पैमाने पर प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के तबादले भी होते हैं, परंतु हर बार नतीजा सिफर रहता है। हर दिन की शुरुआत के साथ सूबे में कोई दिल दहलाने वाली वारदात हो ही जाती है। किसी मासूम की नृशंस हत्या, किसी महिला से गैंगरेप, किसी किशोरी से दुष्कर्म फिर हत्या, कोई अपहरण या लूट, कहीं पुलिस वाले पर हमला तो कहीं दिनदहाड़े डवैâती और खून जैसे तमाम संगीन अपराध राज्य की कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े कर ही देते हैं। गृह मंत्रालय के अधीनस्थ नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो देशभर में अपराध के आंकड़ों का ब्यौरा रखता है। उसकी हर एक सालाना रिपोर्ट उठाकर देख लीजिए, उत्तर प्रदेश को लेकर नतीजे चौंकाने वाले ही मिलेंगे। अभी २०१९ में ही आई रिपोर्ट को आधार मानें तो यूपी हर तरह के अपराध में अव्वल था। अपराध पूरे देश में है, हर राज्य में है, कहीं कम तो कहीं ज्यादा है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। परंतु जिस तरह अपराध को उत्तर प्रदेश में राजनीतिक व प्रशासनिक संरक्षण मिलता है, ऐसा शायद ही देश के किसी प्रांत में कभी मिला होगा। विकास दुबे को भी इस संरक्षण की बजाए समय पर कत्ल के मामलों में सबक मिल गया होता तो आज न तो वो यह कांड करने के लिए आजाद होता, न ही उसकी हिम्मत होती। विकास गैंग के दबोचे गए सदस्य दयाशंकर अग्निहोत्री ने एक तरह से इसी संरक्षण का खुलासा किया है, जिसमें वो बताता है कि दबिश से पहले विकास को किस तरह थाने से आगाह किया गया था। उसी के बाद उसने अपने बदमाशों को जमा किया और बंदूकें उठाकर पुलिसवालों का नरसंहार कर दिया। अर्थात ‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से पाएं’ यह कहावत यूपी में लंबे वक्त से शत-प्रतिशत चरितार्थ होती आ रही है। दशकों से देश के इस सबसे बड़े सूबे की सबसे बड़ी समस्या अपराध ही है। सरकार चाहे किसी पार्टी की आए, अपराधियों को थोड़ा कम या थोड़ा ज्यादा संरक्षण मिलना यहां आम बात हो गई है। यही कारण है कि तमाम संसाधनों की संपन्नता के बावजूद प्रदेश की गिनती देश के कमजोर राज्यों में ही होती है।
क्यों बनते हैं विकास और श्रीप्रकाश?
यूपी की सियासत ने कई छोटे-मोटे दबंगों को प्रशासनिक सह देकर नेता बनाया है, तो उन नेताओं ने अपना दमनचक्र चलाकर कइयों को अपराधी। दबंगों के दमनचक्र से प्रदेश के कई युवकों में आपराधिक मानसिकता का ‘विकास’ हुआ और वे अपराधी बन गए। जब इन दबंगों का निरंकुश दमनचक्र चलता है तब कोई अपराध की दुनिया में रंजिश का नया मुकाम खोज ही लेता है। और इसी ‘खोज’ को शिद्दत से खोज रहा होता है सूबे की सियासत का कोई नया सियासी गॉडफादर। लिहाजा, वहां के सियासी-तंत्र में सह और शोध का यह कुचक्र चलता ही रहता है और फिर उससे निकलता है कोई डॉन विकास दुबे। विकास दुबे ने कभी अपने पिता के अपमान का बदला लेने के लिए गांव के रसूखदारों को पीटा था, तो श्रीप्रकाश शुक्ला ने अपनी बहन को छेड़नेवाले मनचलों को। दोनों दुर्दांत अपराधियों के अपराध की दुनिया में कूदने का कारण कहीं-न-कहीं प्रांत में गहराई से पैंठ जमा चुकी अपराध की जड़ें ही हैं। जिन्हें सियासत की खाद ने दशकों से पोसा है। उन्हें किसी-न-किसी दल का सियासी संरक्षण दिया है। नतीजतन, वे बेखौफ होकर धड़ल्ले से आपराधिक घटनाओं को अंजाम देते रहे हैं। कोरोना के इस आपदाकाल में भी आज जो अपराध अखबारों की सुर्खियों में है, तो वो है यूपी के मोस्ट वांटेड अपराधी विकास दुबे का वीभत्स कारनामा। यह वही विकास दुबे है जो अपराधी बनने के बाद से सोते-जागते, उठते-बैठते एक ही सपना देखता था। सपना एक जनप्रतिनिधि के तौर पर इस प्रजातंत्र का हिस्सा बनने का। अपनी पत्नी को वो पहले ही जीता चुका था और अबकी बार वो खुद चुनाव लड़कर मंत्री बनने की बड़ी-बड़ी हसरतें पाले हुआ था। पुलिसवालों के नरसंहार से पहले तक वो इसी रणनीति पर काम कर रहा था। मौजूदा दौर में देश की सबसे रसूखदार पार्टी के टिकट पर २०२२ का विधानसभा चुनाव लड़ने की पृष्ठभूमि तैयार कर चुका था। हालांकि चुनाव लड़ने के दावे तो वो पहले भी करता था पर इस बार वो इसे लेकर संजिदा था। लिहाजा, उसने दूसरी पार्टी का विकल्प भी खुला रखा था। वैसे भी उसके बुरे वक्त में इन्हीं दोनों पाटिर्‍यों की गठबंधन सरकार का उस पर वरदहस्त था। तब अक्सर एक मंत्री का उस पर वरदहस्त होने का कयास लगता रहता था। खैर, अब कम-से-कम इतना तो तय है कि दुबे फिलहाल २०२२ के चुनाव में तो किसी पार्टी का ‘विकास’ नहीं ही बन पाएगा।
विकास की रंजिश व्यक्तिगत!
यूपी में दुर्दांत अपराधियों का राजनीति में आना आम बात है। ८० के दशक में फूलनदेवी ने ३ दर्जन दबंगों को गोलियों से भून दिया था। फिर फूलनदेवी को राजनीतिक संरक्षण मिला और वो सांसद बन गई। यूपी की राजनीति में अपराधियों के जातिगत समीकरणों के आधार पर प्रवेश के ऐसे कई उदाहरण हैं, परंतु विकास दुबे का मामला अलग है। कहा भले ही जाता हो कि वो ब्राह्मणों के वोट आकर्षित कर सकता था, पर ऐसा था नहीं। फूलनदेवी की रंजिश जातिगत थी, तो विकास की व्यक्तिगत। पूर्व विधायक नेकचंद पांडे ने ब्राह्मण बहुल इलाके में अन्य जातियों पर दबदबे के लिए विकास को मोहरा जरूर बनाया हो सकता है, परंतु विकास के आपराधिक रिकॉर्ड को देखकर ऐसा प्रतीत नहीं होता कि पांडे उसके मकसद में कामयाब हो पाया हो। विकास जिस कॉलेज में पढ़ा, वहां के पूर्व प्रिंसिपल सिधेश्वर पांडे की उसने हत्या की, जो कि ब्राह्मण ही थे। फिर राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त ब्राह्मण नेता संतोष शुक्ला को उसने मौत के घाट उतारा। इस बीच उसने केबल ऑपरेटर दिनेश दुबे की हत्या की। अपने ही क्षेत्र के ब्राह्मण नेता लल्लन बाजपेई से उसने गहरी रंजिश पाली। इतनी कि कई बार उनकी हत्या की कोशिश की। विकास ने लल्लन बाजपेई पर जेल में रहते हुए हमला करवाया, जिसमें उनके एक ब्राह्मण रिश्तेदार समेत तीन लोगों की मौत हो गई। इतना ही नहीं, जिस राहुल तिवारी की हत्या के प्रयास की शिकायत पर उस दिन पुलिस उसके घर दबिश देने पहुंची थी, वो भी ब्राह्मण ही है। ये सभी उसके सजातीय बंधू थे पर उसने किसी को नहीं बख्शा। विकास दुबे पर हत्या के ७ मामले और हत्या के प्रयास के १२ मुकद्दमें हैं, जिनमें ज्यादातर सवर्णों के खिलाफ ही बताए जाते हैं। ये दर्शाता है कि अपराधी की कोई जाति नहीं होती।
भ्रम से निकलना होगा
योगी आदित्यनाथ की सरकार ने गत ३ वर्षों के शासनकाल में प्रदेश में निवेश आकर्षित करने के कई प्रयास किए, समीट रखीं, मेले लगाए, एक्सपो किए पर उनके सकारात्मक परिणाम जमीनी स्तर पर कम ही नजर आए। क्यों? तो इसका एकमात्र कारण यूपी में बढ़ती अपराध की फसल है। इसके लिए यूपी की जमीन कितनी उर्वरक है, इसका प्रमाण है साल-दर-साल अपराधों पर आनेवाली विभिन्न रिपोर्टस। इसलिए अब प्रदेश सरकार और सत्ताधारी नेताओं को इस भ्रम से निकलना होगा कि सूबे की कानून-व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त है। अपराध पर पूरा नियंत्रण है। उन्हें यह फॉर्मूला बताना भी छोड़ना होगा कि व्यक्तिगत रंजिश व विकृत मानसिकता के कारण कभी-कभी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं घट जाती हैं। अब पानी सिर से ऊपर निकल चुका है। कानपुर कांड के सरगना विकास दुबे से पुलिस वालों की कोई व्यक्तिगत रंजिश नहीं थी। हां, यह सच है कि उसकी मानसिकता विकृत जरूर होगी पर इस विकृत मानसिकता के लिए आखिर जिम्मेदार कौन-सी सियासत है, उसका भी समूल नाश करने का संकल्प सत्ता पक्ष को निष्पक्ष होकर लेना होगा। १८६१ में बने पुलिस कानूनों को अब दुरुस्त करना होगा। साथ ही सियासत की समझ को भी बदलना होगा। अपराधियों के मन-मस्तिष्क में पुलिस का खौफ पैदा करना होगा। दबिश की सूचना पाकर भी यदि बदमाश वहीं डटे रहते हैं, तो यह साफ दर्शाता है कि उनके मन में पुलिस का कितना खौफ है और एनकाउंटर मुहिम का कितना डर। यूपी में पुलिसवालों पर हमले पहले भी हुए हैं, पर ऐसा दुस्साहस किसी दुर्दांत ने कभी नहीं किया। मामला डाकू छविराम का हो या डकैत ददुआ की मौत के बदले का। मामला प्रतापगढ़ में सीओ जिया उल हक को घेरकर मारने का हो या मथुरा में अपर पुलिस अधीक्षक मुकुल द्विवेदी की मौत का। मामला चाहे बुलंदशहर में इंस्पेक्टर सुबोध सिंह को भीड़ द्वारा घेरकर मार देने का ही क्यों न हो, ये सभी दर्शाते हैं कि यूपी के अपराधियों में पुलिस को लेकर डर न पहले था न आज है, बल्कि ये कहा जाए कि आज के अपराधी पहले से कहीं ज्यादा निडर हैं तो गलत नहीं होगा।
जहनियत समझनी होगी…
आप तमाम एनकाउंटर कर लीजिए पर जब तक आप राजनीति की जहनियत नहीं बदलेंगे, यूपी की असल तस्वीर नहीं बदल सकती। तब ऐसे विकास दुबे पैदा होते ही रहेंगे, कभी श्रीप्रकाश शुक्ला की शक्ल में तो कभी किसी और रूप में। ऐसे आत्ममुग्ध अपराधियों पर नकेल कसनी है तो पहले हर दल को अपने घर से शुरुआत करनी होगी। प्रदेश की सत्ताधारी भाजपा हो या विपक्ष में बैठी सपा-बसपा। सभी को पहले अपनी पार्टी के अपराधियों को बाहर का रास्ता दिखाना होगा, जरूरत पड़े तो सलाखों के पीछे भी भेजना होगा। साफ छवि और सामाजिक रूचि वाले नेताओं को हर हाल में प्राथमिकता देनी होगी। तभी जाकर भविष्य का रास्ता साफ होगा और यूपी की तस्वीर बदलेगी। तब यूपी में निवेश भी आएगा और खुशहाली भी। तब सही मायने में यूपी में बुराइयों का एनकाउंटर सफल माना जाएगा। कुल मिलाकर, ये शीशे की तरह साफ है कि जब तक यूपी में अपराध का अंत नहीं होगा, तब तक यहां पर निवेश की जमीन बन ही नहीं पाएगी, उद्योग-धंधे स्थापित ही नहीं हो पाएंगे। तब मजबूरी में प्रदेश के बाशिंदों को काम की तलाश में दूसरे राज्यों में भटकना ही पड़ेगा। कहीं उन्हें सम्मान मिलेगा, तो कहीं जलालत भी। आपदाकाल में पलायन भी करना पड़ेगा। अगर प्रदेश की सियासत में आत्मसम्मान के लिए कोई जगह है या वाकई वो अपने प्रदेश के इन मजदूरों को लेकर संजीदा हैं, तो डींगें हांकने की बजाए उन्हें अपने प्रदेश में अपराध के समूल नाश पर गंभीरता से काम करना होगा। ताकि वहां का हर मजदूर अपने राज्य में सिर ऊंचा करके ससम्मान जी सके और अपना घर छोड़ने को मजबूर न हो। आज भी सूबे की सियासत का अपराधीकरण कभी किसी चुनाव का मुद्दा नहीं होता। हां, यहां हर पार्टी चुनाव से पहले अपराध नियंत्रण के दावे जरूर करती है, घोषणा पत्र में उसे प्रमुखता से शामिल भी करती है, परंतु उसी दरम्यान वह अपनी पार्टी से चुनाव लड़नेवाले टिकटाथिर्‍यों में भी राज्य के दुर्दांत अपराधियों को शामिल करने से नहीं चूकती। क्या ऐसे होगा यूपी में अपराधियों का खात्मा? इतिहास के पन्ने पलटकर देख लीजिए या वर्तमान की मंत्रिमंडलीय प्रोफाइल जांच लीजिए, आपको मंत्री परिषद के तमाम सदस्यों की आपराधिक उपलब्धियों का ज्ञान हो जाएगा।
आज इस राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के दौरान भी उत्तर प्रदेश, प्रांत में बढ़ते अपराधों को लेकर चिंतित है। ऐसे वक्त में जब पूरे देश में अपराधों की संख्या पर अंकुश लगा हुआ है, उसे अपराधियों का खौफ सता रहा है। इसलिए सरकार ने अपराध और अपराधियों की मानसिकता को समझने के लिए अपराध कार्यप्रणाली ब्यूरो का गठन किया है। अपराधियों की जहनियत किसी ब्यूरो के गठन से नहीं समझी जा सकती। इसे समझने के लिए पहले सूबे की सियासत को गहराई से समझना होगा। मुख्यमंत्री जी आपने तमाम मौकों पर प्रशासनिक पेंच कसकर देख लिए, एक बार सियासत का स्क्रू कसकर भी देखें। सियासत को समीकरण बदलने के लिए मजबूर करके भी देखें। यकीन मानिए, सूबे की सियासत में अपराध का ‘लॉकडाउन’ करनेवाला एक कारनामा सारी तस्वीर ही बदलकर रख सकता है। आपकी एक सियासी सर्जिकल स्ट्राइक से यूपी अपराधमुक्त बन सकता है। (समाप्त)