" /> काशी जब बन जाती है अयोध्या…

काशी जब बन जाती है अयोध्या…

साधन अत्यल्प और पर्दों या नाट्यपटी तक नहीं। काशी की रामलीलाओं को विलक्षण बनाता है जन से उसका जुड़ाव। काशी की रामलीला में दृश्य और दर्शक के बीच कोई विभाजन रेखा है ही नहीं। साढ़े चार सौ से अधिक वर्षों से (कोरोना काल के अपवाद को छोड़कर) अखंड रूप से चल रही श्री चित्रकूट रामलीला समिति की रामलीला जहां विश्व में किसी भी प्रदर्शन का संभवत: विश्व की‌र्तिमान है, वहीं रामनगर की रामलीला को यूनेस्को ने ‘भारत का हेरिटेज’ घोषित किया है।

रामलीला के राम, लक्ष्मण, सीता, भरत, शत्रुघ्न और हनुमान आदि पात्र लीला उपरांत दर्शन देने के लिए हमारे घर ही पधारने लगे, यह उससे बहुत पहले की बात है। रात गहराते ही बड़े भैया का हाथ पकड़े सीढ़ियां उतर मैं पास के मणिकर्णिका घाट पहुंच चुका होता। जेब में भरी मूंगफलियों से मुंह को चलायमान रख सर्दी को भगाते पन्नी लगे धनुष-बाण, भाले व गदाओं से लैस पौराणिक परिधानों में सजे-धजे पात्रों के जोशीले और भावुक अभिनय को देखते हुए शरीर रोमांच से खुद किसी प्रत्यंचा सा तन जाता। झांझ और मृदंग के साथ गाते व्यासों व रामायणियों के निर्देशन में ‘ए, हा …’ के नाद के बीच ‘धनुष यज्ञ’, ‘लंका दहन’ और ‘रावण वध’ के समय का वह तुमुल कोलाहल कानों में गूंजता है तो आज भी रोमांच हो जाता है। मुंबई आने के बाद कई रामलीलाओं को कवर करने, वहां सम्मानित होने … यहां तक कि रामानंद सागर के ‘रामायण’ सीरियल के सभी प्रमुख पात्रों का एक साथ साक्षात्कार करने का अवसर भी प्राप्त हुआ, पर बचपन में काशी में देखी रामलीलाओं जैसा आत्मिक आनंद फिर नहीं मिला। मैं क्या, जिसने भी एक बार भी काशी की रामलीलाएं देखी हैं वह उनका मुरीद हो जाएगा। पं. रविशंकर के साथ काशी आए विश्व प्रसिद्ध बीटल ग्रुप के सदस्य जॉर्ज हैरिसन- जो मृत्योपरांत उनकी अस्थियां विसर्जन दशाश्वमेध घाट पर ही करने के लिए वसीयत कर गए थे- भी इसके विदेशी दर्शकों में थे। अपने संस्मरणों में उन्होंने इन लीलाओं को ‘…३००-५०० एकड़ वाली जगह पर, एक महीना चलने वाला त्योहार, …चिलम पीते, उलझी जटाओं वाले संन्यासी, धूल के उठते गुबार के बीच बनारस के महाराजा का हाथी के हौदे पर बैठे हजारों श्रद्धालुओं के बीच से हौले-हौले गुजरना और उल्लास का वह शोर…’ के बिंबों से याद किया है। कोरोना की वजह से जब लगातार दूसरे वर्ष भी इन विश्व प्रसिद्ध लीलाओं पर ग्रहण लगा है बचपन में घाटों और मोहल्लों में देखे दृश्य एक -एक कर याद आने लगे हैं।
उफ्फ… वे नजारे…! …विमान से उतरकर प्रभु राम का भरत की ओर अविराम दौड़ना… पुष्पक विमान कंधों पर उठाने के ‌लिए यादव भाइयों में लगी होड़ और लाखों कंठों से एक साथ फूटता ‘जय श्री राम’ का निनाद…। नाटी इमली में महज तीन-चार ‌मिनट चलने वाली ‘भरत मिलाप’ की यह लीला विश्व में सबसे कम समय चलने वाला सबसे बड़ा मेला ऐसे ही नहीं कहलाती… चेतगंज की नक्कटैया का वह दो किलोमीटर लंबा जुलूस… नाग-नथैया, जिसमें काशी नरेश आम दर्शक बनकर शामिल होते हैं। सयानों से सुनीं लीलाओं की वे किंवदंतियां… पादरी के ताने पर रामलीला के हनुमानजी बाढ़ से उफनती ४० हाथ चौड़ी वरुणा को फलांग जाना… ‘भरत मिलाप’ का छायांकन वर्जित स्थल से करने पर बीबीसी टीम के वैâमरे का शटर खुलना ही नहीं… लीला के वृद्ध दर्शक के कुएं में गिरने पर भी उसे खरोंच तक नहीं आना। इन लीलाओं के विचित्र विधान… रामनगर की रामलीला में धनुष यज्ञ, नक्कटैया और लक्ष्मण शक्ति के दिन तोपों से सलामी दिया जाना… राम विवाह में सरकारी बैंड आगे चलना और १,००० छिद्र वाला मालपुआ बनना… रावण वध के समय रामजी के तीर मारने पर रावण का मुखौटा उतारकर राम के पास जाना और प्रणाम करके सीधे अपने गांव प्रस्थान कर जाना… इस लीला में राज्याभिषेक का मंचन रामलीला का वह सोपान है, जब काशिराज अयोध्या नरेश की अधीनता स्वीकार करते हैं और रामजी काशी नरेश बन जाते हैं। समूचे रामचरितमानस को ‘रामायण चालीसा’ के ४० दोहों में समेट देने वाले काशी के युवा उद्यमी सौरभ मिश्र बताते हैं, ‘रामलीलाओं के इस मौसम में काशी, काशी नहीं रहती … अयोध्या बन जाती है।’
दर्शक जब बन जाता है दृश्य
लीला देखने रामायण की पोथी व बैठने का पीढ़ा लेकर नंगे पांव सुबह ही पैदल निकल जाएं, वहीं तालाबों पर नहाएं व तिलक-भस्म लगाकर तैयार हों और अहरा लगाकर बनाएं-खाएं- ऐसे नेमी दर्शक भी आपको काशी के अलावा और कहीं नहीं मिलेंगे। पेट्रोमैक्स लैंप की मंद रोशनी, लाइट व माइक की अनुपस्थिति में भी स्टीरियोफोनिक साउंड और मंच-विधान कुछ भी नहीं। गोस्वामी तुलसीदास जी की रामलीला का काशी के दर्शकों के साथ ऐसा तादात्म्य इसीलिए बन पाया है क्योंकि यहां दृश्य और दर्शक में कोई विभाजन रेखा है ही नहीं। दर्शक ही यहां जन है और दृश्य भी। जिसमें पात्र अपनी भूमिका जीएं और दर्शक लीला के पात्र बन जाएं यह वास्तविक कर्मकांडों वाली वैसी घटित लीला है। लीला और पाठ अक्सर साथ चलता है। संवाद सुनाई नहीं देता, पर दर्शक को जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता … इसलिए क्योंकि उन्हें संवाद कंठस्थ है। रामनगर की रामलीला-जो ओपन थियेटर की तर्ज की लीलाओं में विश्व की विशालतम रामलीला कहलाती है- में तो लीलाओं के अलग-अलग स्थान तय होने से रंगमंच पूरा नगर ही बन जाता है। यूनेस्को ने २००४ ईस्वी में इस रामलीला को ‘भारत का हेरिटेज’ घोषित किया है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने युग की निरक्षर और दीन जनता तक रामकथा का संदेश पहुंचाने के‌ लिए लोकभाषा को रामलीला का मंच बनाया। काशी में श्री चित्रकूट रामलीला समिति की रामलीला और अस्सा- इन दो रामलीलाओं की शुरुआत का श्रेय उन्हें ही हासिल है। ‘श्री चित्रकूट रामलीला समिति’ की रामलीला काशी की सबसे पुरानी रामलीला है। रामनगर की तरह यह भी बहुस्थलीय लीला है, जिसमें मुख्य पात्र अल्पवयस्क बालक और बाकी के काशीवासी होते हैं। झांकी विधा में होने वाली इस लीला में संवाद और अभिनय से ज्यादा बल शृंगार और कर्मकांड पर होता है और पदों का पाठ नारदबानी के रूप में। मौनी बाबा की रामलीला में तो संवाद होते ही नहीं। चित्रकूट रामलीला और लाटभैरव की रामलीला में कौन अधिक प्राचीन है इसे लेकर आज भी विवाद चलते हैं, पर इस बात को लेकर मतैक्य है कि चित्रकूट रामलीला का आरंभ श्री नारायण दास ने किया था, जो तुलसीदास जी के शिष्य बन ‘मेघा भगत’ कहलाए। तुलसीदास जी के कहने पर मेघा भगत ने बाद में कृष्णलीला भी की।
चित्रकूट, अस्सी, रामनगर, लाटभैरव, दारानगर, मौनीजी, अर्दली बाजार, काशीपुरा, दारानगर, औरंगाबाद, गायघाट, लक्सा, नदेसर, चेतगंज, भोजूबीर, वरुणा पुल, शिवपुर, औसानगंज, लहरतारा, खोजवां, जैतपुरा, लल्लापुरा, भदोही, पांडेपुर, लोहता, आशापुर, गोपीगंज- काशी की हर जगह की रामलीला की अलग-अलग विशेषता है।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)