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जी हां हुजूर मैं बीज हूं

जी हां हुजूर मैं बीज हूं
दिखने में मैं छोटा रहता, बीज पुकारा जाता हूं
मुट्ठीभर होकर के भी मैं, लाख दिए जाता हूं
जाने कितना दर्द सहनकार, मिट्टी में मिल जाता हूं
कुछ दे पाने के खातिर मैं, खुद को हर बार मिटाता हूं
छोटे अंकुर से कुछ दिन में, बड़ा पेड़ बन जाता हूं
फल से लेकर तना तलक मैं, न्यौछावर कर जाता हूं
हे सखे तुम बात समझ लो, देने के लिए मिटना होगा, दबना होगा, जलना होगा, बार बार गिर उठना होगा
कितना पाया यह न जानें, कितना दिया समझना होगा
जीवन जीने के मकसद को, हमको सफल बनाना होगा
मैं तो स्वयं बीज हूं भाई, संघर्षों से न डरा करता
जिससे जन्मा उसी में मिलकर, धरती मां को नमन करता।
जी हां हुजूर मैं बीज हूं।
-शिवम तिवारी,
विशाखापट्टनम