मुख्यपृष्ठस्तंभएक आग का दरिया है और डूब के जाना है!

एक आग का दरिया है और डूब के जाना है!

प्रणव पारे
भोपाल

मध्य प्रदेश में चुनावी सरगर्मी अपने उफान पे है और हाल ही में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने अपने ताबड़तोड़ दौरों से अपनी उपस्थिति से ये अहसास भी करा दिया है। अमित शाह किसी भी तरह से भाजपा को फिर से सत्तासीन कराने में कोई भी कसर नही छो़ड़ना चाहते हैं। दूसरी तरफ २०१८ के बाद कांग्रेस के पंद्रह महीनों के कार्यकाल को छोड़ दें तो लगभग २० वर्षों की एंटीइनकंबेंसी भाजपा के गले की हड्डी साबित हो सकती है।
इन सभी के बीच लगभग बीते दो वर्षों में भोपाल की सत्ता के गलियारों में कमोबेश हर महीने मुख्यमंत्री शिवराज के हटने और किसी अन्य चेहरे को सामने लाने की सुगबुगाहट सुनाई पड़ी और पूरे प्रदेश में कई बार अफवाहों का बाजार गर्म होता रहा है। इन बातों को बल मिलने के पीछे कई ठोस वजह भी दिखाई पड़ी, मसलन केंद्रीय संगठन से मध्य प्रदेश के चुनावों को लेकर लगातार फीडबैक लिए जाने की प्रक्रिया खुलेआम दिखाई दी और किसी भी वरिष्ठ नेता ने इस प्रक्रिया पर खुलेआम बात करने से परहेज भी नहीं किया।
कुछ दिनों पहले की ही बात है, जब मध्य प्रदेश में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा को हटाने और केंद्रीय राज्य मंत्री और दमोह लोकसभा से सांसद कद्दावर ओबीसी नेता प्रह्लाद सिंह पटेल, लगभग मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष बन ही गए थे और हद ये थी कि सोशल मीडिया पर उन्हें बधाई देनेवालों का तांता लग गया था।
हालांकि, बाद में प्रदेश भाजपा पार्टी कार्यालय ने इसका खंडन भी कर दिया था लेकिन इस घटना ने पार्टी संगठन की क्षमता की पोल खोल दी और प्रदेश प्रभारी अजय जामवाल की ऊपर से जमकर खिंचाई हुई तथा उनके मातहत काम करनेवाले हितानंद शर्मा को भी जम कर इस बात के लिए लताड़ा गया। असल मुद्दा भाजपा में हो रहे घनघोर अंतर्कलह के बीच आसन्न विधानसभा के होनेवाले चुनाव और उसे जीतने का है, ये भी उतना ही सच है कि प्रदेश भाजपा साफ तौर पर खेमेबाजी का शिकार दिख रही है।
एक तरफ ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने समर्थकों के टिकट और चंबल, ग्वालियर में अपनी प्रतिष्ठा बचाने के संकट से गुजर रहे हैं, वहीं मालवा में प्रभाव रखने वाले वैâलाश विजयवर्गीय अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने के मूड में हैं। अब बचता है विंध्य, महाकौशल और निमाड़, जिसे साधने के लिए शिवराज खुद मैदान में हैं।
वैसे देखा जाए तो मुख्यमंत्री शिवराज की पूरी रणनीति अपनी खुद की बनाई ज्यादा दिखाई पड़ रही है बनिस्बत के संगठन की या दूसरे शब्दों में मामा (मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज का लोकप्रिय नाम) अपने दम-खम पर ज्यादा यकीन करते नजर आ रहे हैं। इसकी बानगी देखने को तब मिली, जब उन्होंने एक योजना ‘लाडली बहना’ जिसमें प्रतिमाह एक हजार रुपए और इसे आगे तीन हजार रुपए तक करने का प्रावधान है, ताबड़तोड़ जारी की और उसके क्रियान्वयन को प्रदेश का सबसे बेहतर क्रियान्वयन भी माना जा रहा है। छिंदवाड़ा, जो कि कमलनाथ का गढ़ है, उसे तोड़कर पांढुर्ना, नंदनवाड़ी और सौंसर को मिलाकर नया जिला बनाए जाने की घोषणा ने सभी को चौंका दिया है और इसे कमलनाथ के गढ़ में गहरी सियासी चाल के तौर पर देखा जा रहा है। इसके साथ ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जिस तरह से स्कूली बच्चों को लैपटॉप, साइकिल और लाडली बहनों को चप्पल, छाते बांट रहे हैं, वो इस बात की ओर इशारा है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह किसी के भरोसे नहीं, बल्कि खुद पर ज्यादा यकीन कर रहे हैं और यही वो तथ्य है, जो भाजपा में बाकी खेमो को बेचैन कर रहा है।
इस उहापोह के बीच पार्टी संगठन ने ३९ विधानसभाओं के टिकट की घोषणा कर दी है, जिससे चुनाव के पहले की ‘रणनीति’ का हिस्सा बताया जा रहा है। पहली सूची में अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित १३ और अनुसूचित जाति की आठ सीटें हैं। पार्टी ने सी और डी वैâटेगरी में सीटों को बांटा है। सी वैâटेगरी में वे सीटें हैं, जहां पार्टी दो या ज्यादा बार हारी है। कभी जीते भी हैं तो काफी कम अंतर से। डी वैâटेगरी में वो सीटें हैं जो कभी नहीं जीत सके।
दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी का मनोबल काफी ऊंचा दिख रहा है। पार्टी के प्रदेश कार्यालय में हो रही हलचल से ही इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि, कांग्रेस पार्टी की अंदरूनी हलचल से बने बनाए काम बिगड़ने की संभावना से भी इंकार नही किया जा सकता है। हालांकि सिंधिया और उनके समर्थकों के जाने के बाद से आपस मे लड़ने के लिए कुछ खास बचा नहीं है। फिलहाल तो कमलनाथ ही सर्वेसर्वा दिखाई पड़ रहे हैं और दिग्विजय सिंह ने भी कोई बड़ा बखेड़ा खड़ा नहीं किया है लेकिन सज्जन सिंह वर्मा की बयानबाजी और उनके तथाकथित वाइरल हो रहे ऑडियो से गुटबाजी के संकेत साफ नजर आ रहे हैं।
कांग्रेस पार्टी को इस बार चंबल, विंध्य और निमाड़ से जबरदस्त उम्मीदें हैं। विंध्य को संभालने के लिए ही विंध्याचल से आनेवाले राजेंद्र शुक्ल को आखिरी बचे हुए समय में मंत्री बनाया जाना लगभग तय माना जा रहा है। इसी के साथ अन्य दो नेताओं को भी मंत्री बनाकर चुनावी समीकरण साधने की तैयारी इस बात को पुरजोर तरीके से बताती है कि ‘इस बार भाजपा की राह आसान नहीं है।’ कांग्रेस पार्टी ने बीते कुछ समय से पार्टी संगठन पर अच्छा खासा ध्यान दिया है और कमलनाथ आक्रामक मुद्रा में नजर आ रहे हैं।
ऐतिहासिक तौर पर पिछली कई विधानसभाओं के परिणामों पर नजर डालें तो मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में कांग्रेस पार्टी परंपरागत रूप से मजबूत है, जिसमें चंबल, ग्वालियर का क्षेत्र आता है, जो ज्योतिरादित्य सिंधिया का गढ़ माना जाता है लेकिन इस इलाके पर अपना दबदबा बनाए रखने में सिंधिया को खासी मशक्कत करनी पड़ रही है, जिससे कांग्रेस में खासा उत्साह है। यही हाल कमोबेश विंध्यांचल और निमाड़ का भी है। देखने वाली बात ये होगी कि कांग्रेस पार्टी अपनी गुटबाजी और अंतर्कलह से ऊपर उठकर हालात का फायदा अपने पाले में डालने में कामयाब होती है या फिर हाथ आई बाजी उसके हाथ से फिसल जाएगी।
हालात दोनों तरफ ठीक नहीं है लेकिन सबसे ज्यादा दिक्कत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की है। ऐसे में सवाल यह है कि उनके लगातार हटाए जाने की अफवाहों के बीच क्या वे अपना और पार्टी का चुनावी संतुलन साध पाएंगे? और क्या भाजपा का संगठन पार्टी की अंदरूनी कलह और जातिगत समीकरणों के बीच अपने मतदाताओं को घरों से निकाल पाएगा?
कुल मिलाकर भाजपा और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह विधानसभा चुनावों में मोदी के नाम के सहारे भी नैया पार लगाने का प्रयास कर रहे हैं। इसके अलावा शिवराज सिंह खुद के प्रयासों में भी कोई कोर कसर छोड़ते नजर नहीं आ रहे लेकिन दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी अपनी जीत के लिए आश्वस्त नजर आ रही है और सरकार बनानेवाले उसके तेवरों को देखकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के लिए इतना ही कहा जा सकता है कि ‘ये इश्क नहीं आसां, इतना समझ लीजे, एक आग का दरिया है और डूब के जाना है।’
(लेखक मध्यप्रदेश की राजनीतिक पत्रकारिता में गहरी पकड़ रखते हैं, प्रदेश के सामाजिक-आर्थिक विषयों पर लगातार काम करने के साथ कई पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेखन भी करते हैं।)

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