मुख्यपृष्ठनमस्ते सामनाकर्मफल ही सर्वश्रेष्ठ है

कर्मफल ही सर्वश्रेष्ठ है

किस्सों का सबक/ दीनदयाल मुरारका। एक बार की बात है, किसी देश में वसु सेन नाम के एक राजा रहते थे। वो एक पुरुषार्थी और वीर सम्राट थे। राजा सदैव प्रजा की भलाई के बारे में सोचते और भला करने की हर संभव कोशिश करते थे लेकिन उस राजा में एक कमी थी। वो कभी-कभी कुछ ऐसा कर बैठते, जो प्रजा के साथ-साथ खुद राजा के परिवार के लिए मुसीबत का सबब बन जाता था।
राजा वसु सेन को ज्योतिषी विद्या पर अटूट विश्वास था। उस राज्य के राज ज्योतिषी ने उनका ध्यान ज्योतिष की ओर लगा रखा था। राजा पर ज्योतिष का ऐसा प्रभाव पड़ा कि वो बिना राज ज्योतिषी के परामर्श के बिना कोई काम नहीं करते थे। उनका अटूट विश्वास था कि राज ज्योतिषी द्वारा दी गई सलाह हमेशा सही निकलती है। धीरे-धीरे हर काम में राज ज्योतिषी पर राजा की निर्भरता बढ़ती जा रही थी। राजा वसु सेन बिना मुहूर्त देखे कोई भी काम नहीं करते थे।
एक दिन राजा, राज ज्योतिषी के साथ अपने देश के दौरे पर निकले। रास्ते में उन्हें एक किसान मिला, जो हल, बैल लेकर खेत जोतने जा रहा था। राज ज्योतिषी ने किसान को रोककर कहा कि तुम जिस दिशा की तरफ जा रहे हो, उसमें तुम्हें हानि होगी। राज ज्योतिषी ने ऐसा इसलिए कहा, क्योंकि वह राजा के सामने अपना ज्ञान बताना चाह रहा था लेकिन किसान पर उसका उल्टा असर हुआ। उस किसान ने राज ज्योतिषी को जवाब दिया कि मैं बिल्कुल इसी तरह खेत पर रोज जाता हूं। यदि ऐसा होता तो मुझे रोज हानि होती। राज ज्योतिषी ने कहा कि तुम अपना हाथ दिखाओ। किसान नाराज हो गया और बोला कि मैं अपना हाथ किसी के सामने क्यों पैâलाऊं? मेहनत-मजदूरी करता हूं। मेरा ज्योतिषी में बिल्कुल विश्वास नहीं है। मुहूर्त और हस्तरेखा तो वो देखते हैं, जो कर्महीन और निठल्ले होते हैं। मुझे अपने कर्म एवं प्रयत्नों में अटूट विश्वास है। मुझे तो अपने कर्म और कर्मफल पर जरा भी शंका नहीं। अब ज्योतिष के पास कोई जवाब नहीं था। राजा वसु सेन की भी आंखें खुल गर्इं। वे समझ गए कि कर्मफल से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं। वह जान गए कि दुनिया में सबसे बड़ा कर्म फल है। अत: हमें जीवन में आगे बढ़ने के लिए किसी भी प्रकार के अंधविश्वासों से दूर रहना चाहिए।

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