गजल

दिकारा ऐसे जैसे कोई अधिकार नहीं
सूख गया मन का आंगन महकता गुलशन
मन की गली से गुजरना अब आसान नहीं
हर आहट पर आहत होती
होठों पर फीकी सी मुस्कराहट होती
आने-जाने वालों की अब रफ्तार नहीं
खुशी में गम में उमड़ आते
आंसूं की कदर होती
उनको पोंछने की आदत होती
उनके लिए भी अब जज्बात नहीं
आंखों के घर बिठाया
फिर भी उसको समझ नहीं आया
तोड़ दिया मन का दर्पण अब वो हमारे कदरदार नहीं
अब खड़े हैं ऐसे मोड़ पर
अब किसी पर ऐतबार नहीं
– अन्नपूर्णा कौल, नोएडा

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