चलता चल

ऊपर ऊंचा आसमां नीचे गहरा समुंदर
बीच में ख्वाहिशों में मचा बवंडर
आरजू उड़ेंगी या पानी में बह जाएंगी
रोजमर्रा की जद्दोजहद में
न किसी की परवा न खबर में
करते रहे जंग अपने संघ में
भूल गए दुनियादारी को
न ढले किसी के रंग में
छूट गया सबका साथ
अब नहीं अपने ऊपर किसी का हाथ
चल पड़े जिस भी राह पर
ठोकर मारी उसी ने हर चाह पर
पेड़ पे पत्ता जड़ा पड़ा था
फूल भी अधमरा पड़ा था
हवा शूल बन के चल पड़ी थी
जैसे त्रिशूल की लड़ी थी
टेढ़े-मेढ़े रस्ते पर रखा कदम
किसी को भी न आई रहम
धुंधली आंखों का धुंधला सपना
धुए के धुंध में खो गया
– अन्नपूर्णा कौल, नोएडा

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