चिट्ठी

दूर देश से हरखू के दर
बैरंग चिट्ठी आई है…
गए बहुत दिन बीत तुम्हें
वापस जल्दी आ जाओ
प्रथम मिलन का अद्भुत फल
मुन्ने से प्यार जता जाओ
पढ़ते-पढ़ते विचलित मन में
याद सभी हो आई है
दूर देश से हरखू के दर
बैरंग चिट्ठी आई है…
रहा बीत दोपहर है मेरा
इसका तुमको ध्यान नहीं है
आंखों में लज्जा बन्नो के
आई तुमको भान नहीं है
भैय्या-ठैय्या कहती गुड़िया
दौड़ी मन में आई है…
बदल गई सब बात आज है
रही नहीं वह पूर्व कहानी
बड़े शौक से शासन करते
नौटंकी के राजा-रानी
रमुआ के घर आकर देखो
`टाटा सूमो’ आई है…
आंगन पक्षी अब भी आते
आदत तुमने डाली थी
पर बिल्ली वह रही नहीं
जो बहुत झबरिया काली थी
सात समंदर पार हरखुआ
की आंख आज भर आई है…
-राजेश ओझा, गोंडा (उत्तर प्रदेश)

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