" /> परहित सरिस

परहित सरिस

धरम नहीं भाई!
हम महान है हमारे संस्कार महान हैं
वसुधैव कुटुंबकम के पुजारी हैं।
अब अगर हम महामारी की कुछ दवाइयां
विदेशवालों को देते हैं तो ठीक ही हैं न
शरण में आए लोगों की रक्षा तो
हमारा धर्म ही है न घरवालों को महामारी की
दवाइयां बाद में भी दे सकते हैं।
अपनी पीड़ा को भूलकर पर पीड़ा को हम
अपनी पीड़ा माननेवाले हैं।
घरवाले बेकार में ही हो-हल्ला मचा रहे हैं।
अरे भैय्या धीरज भी कोई चीज है।
अब घर का बड़ा शतरंज के खेल में लगा है।
तो क्या हुआ? हार-जीत का भी तो नशा होता है कि नहीं?
आप समझते क्यों नहीं? दवाइयों का टोटा है तो है।
महान कवि तुलसीदास जी ने लिखा है परहित सरिस धरम नहीं भाई।
– गीतेश गीत (व्यंग्यकार)