मुख्यपृष्ठस्तंभबोरवेल में कब तक दम तोड़ते रहेंगे मासूम?

बोरवेल में कब तक दम तोड़ते रहेंगे मासूम?

राजेश माहेश्वरी / लखनऊ। २१ जुलाई २००६ को हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के हलदेहेड़ी गांव में चार साल का बच्चा प्रिंस घर से कुछ दूर खेलते समय खुले पड़े ६० फीट गहरे बोरवेल में जा गिरा था। उस दिन उसका पांचवां जन्मदिन था।
तीन दिन चले अभियान में सेना ने बोरवेल के साथ सुरंग बनाकर २३ जुलाई को उसे निकाल लिया था। बचाव अभियान के दृश्य टीवी चैनलों पर दिखाए जाने के चलते पहली बार पूरी दुनिया का ध्यान ऐसे हादसों की ओर गया था और उम्मीद जताई गई थी कि अब फिर ऐसे हादसे सामने नहीं आएंगे। अफसोस की बात यह है कि ड़ेढ दशक के बाद भी हालात कुछ ज्यादा बदले नहीं हैं। ज्यादातर मामलों में सामने आया है कि बच्चों के बोरवेल में गिरने की घटनाएं उन जगहों पर ज्यादा होती हैं, जहां बोरिंग के बाद पानी न आने पर बोरवेल को बिना ढके खुला छोड़ दिया जाता है। ऐसे में छोटे बच्चे अचानक खेलते-खेलते बोरवेल में जा गिरते हैं। यह सिलसिला प्रिंस के बाद नहीं रुका और मासूमों के बोरवेल में गिरने की घटनाएं देश के हर हिस्सों में आम हो गर्इं। पिछले दिनों एक सप्ताह में तीन हादसों में दो में मासूम बच्चों की जान जाना बहुत ही दुखदायी है। आंकड़ों के मुताबिक साल भर में औसतन पचास बच्चे इन बेकार पड़े नलकूपों का शिकार बन जाते हैं।
पंजाब के संगरूर जिले में ६ जून २०१९ की शाम करीब चार बजे खेत में खेलते समय दो वर्षीय मासूम फतेहवीर सिंह १५० फीट गहरे बोरवेल में गिर गया था और पूरे पांच दिनों तक बोरवेल में फंसे रहे फतेहवीर को सेना-एनडीआरएफ की टीमों द्वारा एड़ी-चोटी का जोर लगाने के बावजूद बचाया नहीं जा सका। वर्ष २०१८ में मुंगेर में २२५ फीट गहरे बोरवेल में गिरी मासूम सना को लंबे जद्दोजहद के बाद आखिरकार रेस्क्यू टीम सुरक्षित बाहर निकालने में कामयाब रही थी।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) २००६ से २०१३ तक गड्ढ़ों और मेनहोल में गिरकर मरनेवालों का रिकॉर्ड दर्ज करता था। २०१४ से उसने इस सूची में बोरवेल में गिरकर मरनेवालों को भी शामिल किया। हालांकि २०१४ से २०१५ तक बोरवेल में गिरकर मरनेवालों की संख्या में कमी आई है। बोरवेल में मासूमों के गिरने की घटनाओं में आई वृद्धि का नतीजा था कि वर्ष २०१३ में सुप्रीम कोर्ट ने बोरवेल से जुड़े कई दिशा-निर्देशों में सुधार करते हुए उसकी खुदाई से पूर्व सावधानी की कई नई बातों को जोड़ा, लेकिन सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं अथवा समूहों द्वारा गड्ढों को खोदना और खुदाई के बाद गड्ढों को खुला छोड़ने की लापरवाही आज भी जारी है। यही कारण है कि ऐसे गड्ढों में मासूमों के गिरने की घटनाओं की पुनरावृत्ति होने लगी हैं।
नियमों के अनुसार ग्रामीण इलाकों में बोरवेल की खुदाई सरपंच और कृषि विभाग के अफसरों की निगरानी में जरूरी है, जबकि शहरों में यह काम ग्राउंड वाटर डिपार्टमेंट, स्वास्थ्य विभाग और नगर निगम इंजीनियर की देखरेख में करना अनिवार्य है। बोरवेल खुदवाने के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि बोरवेल की खुदाई करनेवाली एजेंसी रजिस्टर्ड है अथवा नहीं।
बोरवेल की खुदाई से पूर्व सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बोरवेल की खुदाई वाली जगह पर चेतावनी बोर्ड लगाए जाएं, जिसमें उसके खतरे के बारे में बाकायदा लोगों का आगाह किया जाए। यही नहीं, बोरवेल की खुदाईवाली जगह को कंटीले तारों से घेरने और उसके आस-पास कांक्रीट की दीवार खड़ी करने के अलावा गड्डों के मुंह को लोहे के ढक्कन से ढकना भी बेहद जरूरी है।
अक्äसर कोई बड़ा हादसा होने पर प्रशासन द्वारा नलकूप खुला छोड़नेवालों के खिलाफ सख्ती का नाटक किया जाता है, पर फिर भी ऐसे हादसों पर रोक नहीं लगती। निरंतर सामने आते ऐसे हादसे यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि सख्ती की ये बातें महज बयानों तक सीमित रहती हैं। इसलिए प्रशासन को चाहिए कि ऐसे हादसों को रोकने के लिए कठोर से कठोर कदम उठाए। इसके बाद भी फिर अगर कोई घटना घट जाती है तो नलकूप में गिरे बच्चों को बाहर निकालने की कार्रवाई तुरंत की जाए तथा बच्चों को निकालने के लिए काम में आनेवाले आधुनिक यंत्रों का इस्तेमाल किया जाए ताकि बच्चा शीघ्र नलकूप से बाहर निकाला जा सके। केवल सरकार ही नहीं बल्कि समाज को भी ऐसी लापरवाहियों को लेकर चेतना होगा ताकि भविष्य में फिर ऐसे दर्दनाक हादसों की पुनरावृत्ति न हो।

(लेखक उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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