" /> यादों के झरोखों से…फिल्म जगत के पंडित जी!

यादों के झरोखों से…फिल्म जगत के पंडित जी!

६० के दशक में ‘प्रकाश पिक्चर्स’ की फिल्म ‘हरियाली और रास्ता’ की आउटडोर शूटिंग दार्जीलिंग के मनोरम लोकेशन पर की जा रही थी। माला सिन्हा तब नामी स्टार बन चुकी थीं और नए उभरते हीरो के साथ बड़ी मुश्किल से फिल्म में काम करने को राजी हुई थीं। सुबह का नाश्ता लोकेशन पर ही सजा हुआ था। उसी समय एक आदमी ने पूछ लिया कि ‘ये अंडे किसके हैं?’ निकट बैठे हीरो ने सादगी से कहा ‘ये अंडे माला जी के हैं’। पास बैठी माला सिन्हा ने सुन लिया और वे हीरो पर बरस पड़ीं, ‘क्या कहा तुमने? मैं तुम्हें अंडे देनेवाली मुर्गी लगती हूं।’ पूरे यूनिट के सामने हीरोइन से इस प्रकार डांट खाते देख बेचारा नया हीरो एकदम सहमकर चुप्पी साधने के सिवाय कुछ न कर सका।
वास्तव में ये नए हीरो मनोज कुमार थे, जो बाद में स्टार बने और फिल्म जगत में पंडित जी के नाम से मशहूर हुए। ‘हरियाली और रास्ता’ से पूर्व मनोज कुमार की तीन फिल्में ‘कांच की गुड़िया’, ‘रेशमी रूमाल’ और ‘बनारसी ठग’ प्रदर्शित हुर्इं, किंतु ये तीनों ही फिल्में साधारण थीं। १९६२ में फिल्म ‘हरियाली और रास्ता’ के हिट होने के साथ ही मनोज कुमार स्टार बन गए। साधना के साथ ‘वो कौन थी’ ने मनोज कुमार को स्टारडम के उस पायदान पर पहुंचा दिया, जहां लोग उन्हें आदर से पंडित जी कहने लगे। १९६४ में प्रदर्शित फिल्म ‘वो कौन थी’ को मनोज कुमार नहीं करना चाहते थे परंतु निर्देशक राज खोसला के आग्रह पर मनोज कुमार ने ये फिल्म स्वीकर कर ली। अभिनेत्री साधना को जब इस फिल्म का प्रस्ताव मिला तो उन्होंने कहा कि मनोज कुमार के साथ उनकी जोड़ी असफल रहती है इसलिए अच्छा होगा कि उनकी जगह किसी और हीरोइन को ले लिया जाए। परंतु राज खोसला के साथ पारिवारिक संबंध होने के कारण वे राज खोसला के आग्रह को टाल न सकीं और फिल्म से जुड़ गर्इं। शिमला में जब फिल्म की लंबी आउटडोर शूटिंग चल रही थी तो मनोज कुमार को लिखे हुए सीन पसंद नहीं आए। राज खोसला से विचार-विमर्श करने के बाद पंडित जी ने एक ही रात में बारह सीन लिख डाले। निर्देशक राज खोसला को वे सीन इतने पसंद आए कि उन्होंने फिल्म की फाइनल स्क्रिप्ट को ‘फायर एस्केप’ की आग में फेंककर जला दिया और घोषणा कर दी कि ‘वो कौन थी’ की पूरी स्क्रिप्ट अब पंडित मनोज कुमार ही लिखेंगे। इस प्रकार ‘वो कौन थी’ से मनोज कुमार अभिनेता के साथ-साथ लेखक भी बन गए।
यहां उल्लेखनीय है कि अभिनय और लेखन कला के साथ ही मनोज कुमार को गीत और संगीत की भी अच्छी समझ थी और वे एक कुशल कवि और शायर थे। फिल्म ‘वो कौन थी’ का एक गीत ‘लग जा गले…’ बहुत ही लोकप्रिय हुआ था। संगीतकार मदन मोहन ने रिकॉर्डिंग से पहले इस कर्णप्रिय गीत को सबसे पहले राज खोसला को सुनाया, तो राज खोसला ने इसे बेकार और बकवास कहकर खारिज कर दिया। किंतु मदन मोहन को इस गीत और अपनी बनाई धुन पर इतना विश्वास था कि पूरी धुन बनाकर सहायक निर्माता एन.एन. सिप्पी को सुनाई। सिप्पी को धुन बेहद पसंद आई और अगले ही दिन सिप्पी मनोज कुमार को लेकर संगीतकार मदन मोहन के घर जा पहुंचे और फिल्म के गीतों की धुनें सुनाने के लिए राज खोसला को भी बुला लिया। मदन मोहन ने एक के बाद एक कर धुनें सुनाना आरंभ किया तो राज खोसला एक धुन सुनकर दीवाने से हो गए और प्रशंसाओं के पुल बांध दिए। तब मदन मोहन ने बताया कि ये वही धुन है, जिसे उन्होंने बेकार और बकवास कहकर खारिज कर दिया था। तब राज खोसला ने तुरंत अपने दाहिने पांव से जूता निकालकर अपने सिर पर दे मारा और मदन मोहन से बार-बार माफी मांगी। ‘वो कौन थी’ के प्रदर्शन के बाद लता मंगेशकर द्वारा गाया गया ये गीत सारे देश में लोकप्रिय हो गया और एक ऐसा अमरगीत बनकर सामने आया, जो छप्पन वर्षों के बाद आज भी उतना ही लोकप्रिय है।
‘वो कौन थी’ की सफलता के बाद मनोज कुमार ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मनोज कुमार सदैव भीड़ से अलग छवि बनाकर चलते रहे और उन्हें सर्वाधिक सफलता उन फिल्मों से मिली, जो उन्होंने खुद लिखीं, बनार्इं और निर्देशित कीं।